कामरान ने जैसे ही शेविंग के लिए रेज़र निकाला तो पिछले इंटरव्यू के वक्त बनाई गई शेव के कुछ बाल उसमें असहाय से फंसे हुए थे। दो सेकेंड रूकने के बाद जल्दी से उन यादों को रेजर में से साफ किया और नये मौके को भुनाने के लिये गालों को फटाफट खुरच कर एचटी इमारत की तरफ कदम बढ़ा दिये। इंटरव्यू स्थल पर पहुंचते ही देखा कि 8 बाई 6 के एक आधुनिक केबिन में 15 से 20 दोस्त पहले से ही बैठे हुए थे। कंजस्टिड होने के बाद भी वो सब खुश थे लगभग आधे लोगों को आज पत्रकारीय स्किल की कीमत मिलने वाली थी। कामरान सभी दोस्तों की फोटो खींचने में बिज़ी था। चूंकि अरसे बाद वो सभी लड़के जो बेसुध होकर कैम्पस के कॉरीडोर में एनएसपी (नयन सुख प्राप्ति) लेते थे, आज खुद को पूरी तरह व्यवस्थित किये हुए थे। हेयर स्टाईल से लेकर जूतों तक पूर्ण रूप से फॉर्मलटी टपक रही थी।
एक मित्र सरन यादव जो उपभोक्तावाद की मुखालफत करते हैं, उनके कान के नीचे लगी फेयरनेस क्रीम, जो अभी सूखी नहीं थी इस बात की तस्दीक कर रही थी कि उनकी वामपंथी तिजोरी में कितना उदारीकरण कैद है। इसी बीच इंटरव्यू कक्ष से लौटी सुरभि को हमारे जिज्ञासु सवालों ने घेर लिया……क्या हुआ? क्या पूछा? क्या पूछा?…..सुरभि ने नजरे घुमाई औऱ चिल करते हुए कहा… अर रे कुछ नहीं…इट वाज़ वेरी गुड…. कूल होके आनसर देना…..सब मस्त होगा…. इतना कहते ही वो हम सब को पीठ दिखा कर चलती बनी…. क्योंकि साक्षात्कार के 2 मिनट के भीतर बिल्डिंग छोड़ने का फरमान था। इसी तरह एक-एक कर सब निकलते गए। कामरान साहब के साक्षात्कार कक्ष में पंहुचते ही तनु जोशी और हिमांशु रंजन को जैसे किसी ने ऊर्दू का इंजेक्शन लगा दिया हो, दरअसल वो कामरान को उसकी पहचान याद दिला रहे थे।…. और मुगालते से वो भारत में ऊर्दू की दुर्दशा के बारे में पूछ बैठे… फिर क्या… कामरान साहब ने एक ही सांस में हाशिए पर पड़ी इस भाषा का दुखड़ा सुना डाला। इसी तरह कुछ और सवाल पूछकर कामरान को छोड़ दिया गया। जैसे-तैसे कई घंटों में जाकर साक्षात्कार की ये प्रक्रिया पूरी हुई।
एक घंटे इंतजार के बाद चुने गए उम्मीदवारों की सूची चस्पा कर दी गयी। सरोज कुमार चंचल, अवस्थी, आकिब खान, मिश्रा जी, नेहा झा, नीतू राय, सुरभि औऱ पांडे जी वगैरह सब खुशी से झूम उठे और कॉल कर-करके परिजनों से खुशी साझा करने में व्यस्त हो गए। ज्यादातर लोग ऐसे थे जिनके फोन पर इनकमिंग कॉल आ रही थी चूंकि ये लोग अपने घर वालों को स्वंय कुछ बताने की हालत में नहीं थे। इसी बीच अग्रवाल जी के लैंडलाइन से कामरान के मोबाइल की घंटी बजी। अग्रवाल जी के कारखाने में ही तो कामरान के वालिद साहब लोहा कूटते हैं। दुआ सलाम हुई बाबू जी ने बिना किसी देरी के लड़खड़ाती आवाज में पूछ लिया… बेटा क्या रहा इंटरव्यू का? दरअसल बाबू जी जानना चाह रहे थे कि बेरोजगारी शब्द से ‘बे’ हटा कि नहीं लेकिन कामरान की कुछ सेकेंड की खामोशी से बाबू जी समझ गए और उन्होंने दिलासा देना शुरू कर दिया। कहने लगे कि खुदा और मौके देगा, घबराओ मत, खाना खाया तुमने, खाने-पीने का ध्यान रखना, कमरे पर कब जाओगे इन सब सवालों के साथ ही बातचीत को उन्होंने निष्कर्ष तक पहुंचाया। ये दिलासे भरे अल्फाज़ कामरान को ताने की तरह लगने लगे थे चूंकि कई बार कामरान के अब्बू इन्हें दोहरा चुके थे। किसी तरह कामरान इस अल्पावधि सदमे से इस आशा के साथ बाहर निकला कि अगले प्रयास में ज़रूर बेरोजगारी से ‘बे’ लफ्ज को हटा लेगा।
लेखक मोहम्मद जावेद मंसूरी आईआईएमसी में आरटीवी के छात्र हैं.






