Nadim S. Akhter : पत्रकार मतलब कोई बुद्धिजीवी. जिसे सब कुछ पता हो, जो अलग सोचता हो, लीक से हटकर, आम आदमी के चश्मे से चीजों को ना देखता हो. जिसके पास ज्ञान का भंडार हो, जो खूब किताबें पढ़ता हो. जिसने कोई किताब भी लिख ही डाली हो. जिसके घर में किताबों का कलेक्शन हो. जो सामाजिक प्राणी हो. प्रेस क्लब और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर पाया जाता हो. नेटवर्किंग करता हो. -इस हाथ ले और उस हाथ दे- पर दिल से यकीन करता हो. फिर वह चाहे खबर हो या कुछ और. जो दुनिया में घटित होने वाली हर चीज पर कमेंट करने का माद्दा रखता हो.
जो सामान्य ज्ञान का विकीपीडिया हो. उसे हर चीज-हर घटना तारीख के साथ पता हो. जो रोजाना कम से कम 3-4 अखबार तो पढ़ ही लेता हो. जो दारू-सिगरेट-तंबाकू खाता हो या इसका शौकीन हो. या फिर कोई ना कोई नशा जरूर उसे हो, चाहे वह पढ़ने का ही क्यों ना हो. जो इसके बिना एक भी खबर ना सोच पाए और ना लिख पाए. जिसका एक आभामंडल हो, जिसने अपने कैरियर में चेले-चपाटे बना लिए हों. जो तथाकथित बुद्धिजीवियों के गैंग में शामिल हो या फिर खुद गैंग का मुखिया हो. जो कुछ भी कूड़ा-कचरा लिखे, इतने सम्पर्क और गुरू-चेले हों मार्केट में कि वह जो लिखे, छप जाए.
जिसकी नेताओं-सेलिब्रिटीज से दोस्ती हो. जो सरकारी खर्चों पर विदेश दौरों के लिए चयनित होता हो. जिसे कई सारे सरकारी और गैर सरकारी सम्मान यदा-कदा मिलते रहते हों. जो इस दुनिया मे भगवान द्वारा फुर्सत से भेजा गया हो, ये बताकर कि बेटा, तुम सबसे अलग हो. तुम पत्रकार बनोगे, सबकी खबर लोगे, नाम-यश कमाओगे. तुम सबके बारे में सवाल पूछोगे, कोई तुम्हारे बारे में बोलने से भी डरेगा-कतराएगा. थोड़ी बुद्धि लगा लोगे तो भगवान का अवतार कहलवा के पूजे भी जाओगे. तुम्हें दुनिया के हर दर्शन का पता होगा और लोग तुम्हारे दर्शन करके तर जाएंगे, तुम ऐसी बला हो. जाओ पृथ्वीलोक और अपने धर्म का पालन करके धरा को कृतार्थ करो.
मुझे भी लोग पत्रकार कहते रहते हैं लेकिन पत्रकार होने की उपर्युक्त परिभाषा (हालांकि यह कोई स्वीकार्य परिभाषा नहीं है, इसमें मतभेद है) के खांचे में मैं किसी भी तरह फिट नहीं बैठता. मेरे जैसे और भी कई लोग होंगे, जो इस परिभाषा के सांचे में खुद को असहज महसूस करेंगे. उनकी तो मैं नहीं जानता, अपने बारे में कह सकता हूं कि इन सारे गुण-दोषों का मुझमें आभाव है.
मुझे तो ये भी नहीं मालूम कि हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री का जन्म किस तारीख को, किस वर्ष और कहां हुआ था!!! हां, मुझे खबर लिखनी-दिखानी और छापनी आती है, वह भी ईमानदारी से. अगर ये काफी है और अगर पत्रकार कहलाने की मूलभूत आवश्यकताओं में शुमार किया जाता है तो आप मुझे भी पत्रकार कह सकते हैं.
वैसे खबर लेने-देने का काम नारद मुनि ने भी किया था. कितनी ईमानदारी से, ये आप तय कीजिए.
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.






