पत्रकार और पत्रकारिता की वर्तमान हालत पर चुटकुले, कविताएं, शेर-ओ-शायरियां आदि उसी तरह तैयार होने लगी हैं जैसे कभी एक नेताओं और राजनीति पर लिखा-पढ़ा-कहा जाता था. जिस भी क्षेत्र में धंधेबाजों की भारी संख्या हो जाती है, और जेनुइन लोगों की कम, तो उस क्षेत्र के कामकाज की मूल भावना ही खत्म हो चुकी होती है. नेताओं ने राजनीति की और अफसरों ने प्रशासन की जिस तरह से माकानाकासाकानाका कर रखा है, उसी तर्ज पर पत्रकारों ने पत्रकारिता की कर दिया है.
अच्छे, ईमानदार, सरोकारी, जुझारू, रीढ़ वाले और हिम्मती पत्रकारों की संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है. अब तो ईमानदार पत्रकार भी सिस्टम व गिरोह के आगे नतमस्तक होकर चुपचाप कारपोरेट जर्नलिज्म के फ्लाईओवर पर फर्राटा भरते हुए अपने लिए भौतिक सुख सुविधाओं को बटोरने के काम में लग जाते हैं. उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब उनकी संवेदना, सरोकार, सोच, आजादखयाली आदि का कत्ल हो गया और वे कब खुद की नौकरी बचाने, नौकरी के बारे में सोचते रहने वाले रोबोट में तब्दील हो गए. एक कविता पत्रकार राहुल पांडेय ने भेजी है, पत्रकारों के उपर, बहुत ही सटीक है. आप भी पढ़ें और हंसें फिर सोचें. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया
पत्रकार नहीं बनिया हैं
चार आने की धनिया हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्यार से
लौंडा नाच नचनिया हैं
पत्रकार नहीं, ये बनिया हैं।
चार आने की धनिया हैं।
करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनिया हैं,
पत्रकार नहीं ये बनिया हैं,
चार आने की धनिया हैं।
कापी राइट : राहुल पांडेय, अयोध्या-फैजाबाद वाले






