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पत्रकार यूनियन ने कहा – बिहार में पत्रकारों का उत्‍पीड़न तेज, घायल उपेंद्र का इलाज कराए सरकार

बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव (बीडब्ल्यूजेयू), प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के सदस्य एवं पीयूसीएल बिहार के पूर्व उपाध्यक्ष अरुण कुमार, इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन की राष्ट्रीय सचिवमंडल के सदस्य अमरमोहन प्रसाद तथा आईजेयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य शिवेन्द्र नारायण सिंह ने एक संयुक्त बयान जारी कर औरंगाबाद के देव में प्रभात खबर के सम्वाददाता, उपेन्द्र चौरसिया की भाकपा (माओवादी) पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा बेरहमी से की गई पिटाई की तीव्र निंदा करते हुए बिहार सरकार से इस मुफस्सिल पत्रकार के मुफ्त और बेहतर इलाज़ करवाए जाने की व्यवस्था करने की मांग की है.

बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव (बीडब्ल्यूजेयू), प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के सदस्य एवं पीयूसीएल बिहार के पूर्व उपाध्यक्ष अरुण कुमार, इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन की राष्ट्रीय सचिवमंडल के सदस्य अमरमोहन प्रसाद तथा आईजेयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य शिवेन्द्र नारायण सिंह ने एक संयुक्त बयान जारी कर औरंगाबाद के देव में प्रभात खबर के सम्वाददाता, उपेन्द्र चौरसिया की भाकपा (माओवादी) पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा बेरहमी से की गई पिटाई की तीव्र निंदा करते हुए बिहार सरकार से इस मुफस्सिल पत्रकार के मुफ्त और बेहतर इलाज़ करवाए जाने की व्यवस्था करने की मांग की है.

ज्ञातव्य हो कि गंभीर रूप से घायल यह मुफस्सिल पत्रकार पटना मेडिकल कालेज में इलाज के लिए भरती किया गया है. इन नेताओं ने मांग की है कि इस पत्रकार के मुफ्त इलाज़ और देखभाल की पूरी व्यवस्था सरकार द्वारा किया जाना चाहिए। पत्रकार यूनियन के इन नेताओं ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि बिहार में आज कल पत्रकारों को और ख़ास कर मुफस्सिल पत्रकारों को जो वस्तुतः पत्रकारिता के फुट-सोल्जर हैं उनकी स्थिति बहुत चिंताजनक चल रही है। बिहार के विभिन्न हिस्सों से बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव के पास आ रही ख़बरों के अनुसार ये मुफस्सिल पत्रकार न सिर्फ उग्रवादियों की हिंसा और अराजकता के शिकार हो रहे हैं वरन पुलिस, प्रशासन और माफियाओं के दमन के भी शिकार हो रहे हैं।

अभी अभी अपने जमुई दौरे के क्रम में बीडब्ल्यूजेयू टीम के द्वारा यह पाया गया कि वहां पत्रकारिता में माओवादियों की खबर लिखने की वजह से कुछ पत्रकारों को पुलिस द्वारा प्रताडित किया जा रहा है। यही नहीं झाझा के आधा दर्जन पत्रकारों को रेल डकैती के मामलों में फंसाया गया है। इस मामले को विधान मंडल में उठाये जाने के बावजूद आज तक उनको इस झूठे मुक़दमे से मुक्ति नहीं मिल सकी है और विधान मंडल के अंदर दिया गया सरकार का आश्वासन कोरा आश्वासन बनकर रह गया। उसी तरह औरंगाबाद में ही एक पत्रकार के खिलाफ पुलिस द्वारा उसे माओवादी बताकर उसके खिलाफ खिलाफ किये गए देशद्रोह के झूठे मुक़दमे का भी वही हश्र हुआ है। सरकार ने इस मामले की भी जांच का आश्वासन विधान मंडल में दिया था और उक्त पत्रकार को न्याय दिलाने की बात भी आज तक पूरी नहीं की जा सकी है।

बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव श्री कुमार की हाल की खगडिया यात्रा के क्रम में तो यहाँ तक पता चला कि एक हिंदी दैनिक के ब्यूरो चीफ की पुलिस के एक आला अफसर के नेतृत्व में जमकर पिटाई की गयी। उस ब्यूरो चीफ का कसूर सिर्फ यह था कि वह हाल के मुख्यमंत्री के दौरे के दरम्यान हो रही उपद्रव की घटनाओं की तस्वीरें खींच रहा था। वस्तुतः उस ब्यूरो चीफ का यह पत्रकारीय दायित्व था जिसके पालन नहीं किये जाने के लिए उसकी पुलिस द्वारा बेरहमी से पिटाई की गयी। उसी तरह वहां के एक प्रशासनिक पदाधिकारी ने एक भ्रष्टाचार की खबर लिखने के बाद उससे एक प्रशासनिक आदेश जारी कर उस पत्रकार को अपने खबर का श्रोत बताने का आदेश जारी किया। जबकि यह आम जानकारी है कि पत्रकारों की ख़बरों का खंडन तथ्यों के आधार पर किया जा सकता है किन्तु किसी भी खबरनवीस को उसके स्रोत का खुलासा करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक कि न्यायालय भी उन मामलों को छोड़ कर जिनका सम्बन्ध देश की सुरक्षा से है और किसी भी मामले में खबरनवीस से अपने स्रोत को डिस्क्लोज करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव श्री कुमार को मिल रही सूचनाओं के अनुसार पुलिस और प्रशासन द्वारा लखीसराय जिले में भी इस तरह के हाई-हेंडेडनेस की भी शिकायतें आ रही हैं। श्री कुमार इस मामले की जानकारी हासिल करने के लिए जल्द ही लखीसराय जाने वाले हैं।

बीडब्ल्यूजेयू के इन नेताओं ने अपने संयुक्त बयान में भाकपा (माओवादी) के केंद्रीय नेतृत्व से भी यह बताने की अपील की है कि आखिर पत्रकार उत्पीड़न की इस घटना से भाकपा माओवादी क्या साबित करना चाहते हैं? क्या भाकपा माओवादी का नेतृत्व यह बता सकता है कि माओ-त्से-तुंग ने अपनी किस किताब में ऐसे पत्रकार उत्पीड़न की शिक्षा दी है? क्या यदि भविष्य में कभी भाकपा माओवादियों का शासन होता है तो क्या उनके निजाम में इसी किस्म की पत्रकारिता चलेगी? इन नेताओं ने भाकपा माओवादी के केंद्रीय नेतृत्व से अपील की है कि वे इस पत्रकार उत्पीड़न के मामले को गंभीरता से लेना चाहिए और यदि वे ऐसा महसूस करते हैं कि उन्हें इस घटना पर जनता के सामने अपनी स्थिति स्पष्‍ट करनी चहिये।

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