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पत्रकार वह है जो आठ सौ शब्दों में…

Purushottam Agrawal :  कृतज्ञ स्मरण करता हूँ राजेन्द्र माथुर का जिनसे बहुत कुछ सीखा, एक यह कि "पत्रकार वह है जो आठ सौ शब्दों में अमिताभ-रेखा रोमांस की स्टोरी लिखने में भी समर्थ हो, और प्रधानमंत्री की राजनैतिक असफलता का विश्लेषण भी और गोडोल थ्योरम का महत्व भी…." और एक यह भी कि "पुरुषोत्तमजी हम अखबार निकालते हैं इतिहास का जर्नल नहीं, लेख आप कल दे देते तो अखबार के काम का था, अब इसका ऐतिहासिक महत्व ही रह गया है.."

Purushottam Agrawal :  कृतज्ञ स्मरण करता हूँ राजेन्द्र माथुर का जिनसे बहुत कुछ सीखा, एक यह कि "पत्रकार वह है जो आठ सौ शब्दों में अमिताभ-रेखा रोमांस की स्टोरी लिखने में भी समर्थ हो, और प्रधानमंत्री की राजनैतिक असफलता का विश्लेषण भी और गोडोल थ्योरम का महत्व भी…." और एक यह भी कि "पुरुषोत्तमजी हम अखबार निकालते हैं इतिहास का जर्नल नहीं, लेख आप कल दे देते तो अखबार के काम का था, अब इसका ऐतिहासिक महत्व ही रह गया है.."

"शेर की सवारी के खतरे" उन्हीं का लिखा मुखपृ़ष्ठ संपादकीय था… याद आते हैं डॉ. कमल वशिष्ठ जिन्होंने थियेटर की दीक्षा दी। जिन दिनों ग्वालियर में थियेटर उन्नीसवीं सदी के अंदाज में चल रहा था, वशिष्ठजी ने हम कुछ नौजवानों को साथ लेकर समकालीन थियेटर की शुरुआत की थी। पहला नाटक था ललित सहगल का ‘हत्या एक आकार की’ मैंने ‘आकार’ के हत्यारे की भूमिका निभाई थी… उसके बाद ‘पगला घोड़ा’ और कई और नाटक..

जेएनयू आने पर बंसी कौल के निर्देशन में मणि मधुकर के रस-गंधर्व में काम किया था, उसके बाद से अब तक तो बस दर्शक का ही संबंध रहग गया है थियेटर से…लेकिन आगे की कौन जाने… हो सकता है कि….

पुरुषोत्तम अग्रवाल के फेसबुक वॉल से.

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