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‘पत्रिका’ और ‘भास्कर’ ने ‘नईदुनिया’ को मीलों पीछे छोड़ा

: सिमट रहा पत्रकारिता की पाठशाला रहा 'नईदुनिया' : अड़ियल संपादक और नौसिखिए स्टाफ का कारनामा : पाठक सर्वे की ताजा रिपोर्ट ने हिंदी अखबारों की दुनिया के एक पुराने अखबार 'नईदुनिया' की बदतर होती हालत बयां कर दी। मध्यप्रदेश में आज ये अखबार सिकुड़कर ख़त्म होने की कगार पर खड़ा दिखाई देता है! हिंदी अख़बारों की दुनिया में 'नईदुनिया' बरसों तक एक सुसंस्कृत समाज का सभ्य भाषा वाला सामाजिक अखबार माना जाता था!

: सिमट रहा पत्रकारिता की पाठशाला रहा 'नईदुनिया' : अड़ियल संपादक और नौसिखिए स्टाफ का कारनामा : पाठक सर्वे की ताजा रिपोर्ट ने हिंदी अखबारों की दुनिया के एक पुराने अखबार 'नईदुनिया' की बदतर होती हालत बयां कर दी। मध्यप्रदेश में आज ये अखबार सिकुड़कर ख़त्म होने की कगार पर खड़ा दिखाई देता है! हिंदी अख़बारों की दुनिया में 'नईदुनिया' बरसों तक एक सुसंस्कृत समाज का सभ्य भाषा वाला सामाजिक अखबार माना जाता था!

इस अखबार ने खबरों की विश्वसनीयता का ऐसा शिखर खड़ा किया था, जिसे कई बरसों तक कोई हिला तक नहीं सका! 'नईदुनिया' के आधार स्तम्भ रहे राजेंद्र माथुर ने एक कार्यक्रम में कहा था कि इंदौर में घटनाएं घटती ही इसलिए हैं, कि वो 'नईदुनिया' में खबर बनें! किसी अखबार के लिए ये सम्मान वाली बात होगी कि उससे राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, शरद जोशी जैसे नाम जुड़े थे, जिनकी हिंदी पत्रकारिता में एक साख रही है। लेकिन, दुःखद बात ये है कि इंदौर को हिंदी पत्रकारिता का तीर्थ बनाने वाला ये अखबार आज सिमट गया है।

इस अखबार के बनने और बर्बाद होने की दास्ताँ भी अजीब है, जिसकी शुरुआत हुई २००६ से! सन २००६ के बाद एक ऐसा दौर आया कि 'नईदुनिया' ध्वस्त हो गया था! अभय छजलानी और महेंद्र सेठिया के हाथ से विनय छजलानी के हाथ में 'नईदुनिया' की बागडोर आते ही 'नईदुनिया' की विश्वसनीयता की धज्जियाँ उड़ गई! बाद में ये इसलिए संभला की २००९ तक इसकी कमान तत्कालीन ग्रुप-एडीटर उमेश त्रिवेदी के हाथ में आ गई थी! अखबार कि जबरदस्त समझवाले इस पत्रकार ने अपनी लीडरशिप के जरिए 'नईदुनिया' की साख को काफी हदतक संभाला। लेकिन, २००९ में जब विनय छजलानी ने 'नईदुनिया' के इंदौर संस्करण का स्थानीय संपादक जयदीप कर्णिक को बनाया तो इस अखबार का पूरा बंटाढार हो गया! ख़बरों के नाम पर ऐसा प्रयोग हुआ कि सारी विश्वसनीयता धराशायी हो गई। हालात ये हो गए कि 'नईदुनिया' के घाटे को सँभालने के लिए इसे 'जागरण समूह' को बेचने का फैसला करना पड़ा! मार्च २०१२ से 'नईदुनिया' का मालिकी हक 'जागरण समूह' का हो गया!

जागरण प्रबंधन ने 'नईदुनिया' की कमान भास्कर से रिटायर हुए अड़ियल और मुँहजोर संपादक श्रवण गर्ग को सौंप दी। मुद्दे की बात ये रही कि श्रवण गर्ग को प्रधान संपादक बनाने की सलाह भी विनय छजलानी की थी। दो साल बाद आज 'नईदुनिया' का दायरा इतना सिमट गया कि जिस इंदौर में इस अखबार का तूती बोलती थी, वहाँ ये दैनिक भास्कर और पत्रिका से सर्कुलेशन में बहुत पीछे रह गया! ताजा पाठक के मुताबिक जहाँ पत्रिका की पाठक संख्या ३ लाख ३२ हज़ार बढ़कर ४३ लाख २६ हज़ार हो गई और दैनिक भास्कर की पाठक संख्या ३९ लाख ९४ हज़ार पर पहुँच गई, वहीँ 'नईदुनिया' की पाठक संख्या सिमटकर ७ लाख १७ हज़ार रह गई! इसपर  भी इस अखबार को सँभालने की कोई कोशिश नहीं हो रहे है। श्रवण गर्ग के साथ कभी काम करने वाले लोग धीरे-धीरे 'नईदुनिया' के शीर्ष पदों पर बैठ गए और आज ये अखबार इंदौर जैसे बड़े शहर के कोने में रह गया है। 'जागरण समूह' की नईदुनिया को लेकर क्या नीति है, इस पर तो कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती, पर यदि किसी अखबार में अच्छी ख़बरें नहीं है, छपाई ख़राब है, ख़बरों की विश्वसनीयता संदिग्ध है और पाठकों के प्रति उसकी कोई जवाबदेही नहीं है तो कोई उसे क्यों खरीदेगा और पढ़ेगा?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. भड़ास तक अपनी बात [email protected] के जरिए पहुंचा सकते हैं.

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