गौरव शर्मा नयी दिल्ली के रहने वाले हैं. फेसबुक पर उनके प्रोफाइल के अनुसार वे वर्तमान में क्राइम रिपोर्टर हैं और इससे पूर्व स्वतंत्र पत्रकारिता के अलावा साधना टीवी में काम कर चुके हैं. मैंने जब फेसबुक पर एक छोटी सी टिप्पणी कर मित्रों से पूछा कि “मैं एक हिंदी मासिक पत्रिका निकालना चाह रही हूँ. आपकी राय चाहती हूँ?” तो गौरव जी की एक बड़ी बेबाक, मजेदार और तीखी टिप्पणी आई जिसकी हम सभी पत्रकार साथियों को जानकारी होना जरूरी प्रतीत होता है.
वे कहते हैं- "मैं आपके इस साहस की सराहना करता हूँ, लेकिन ऐसा करने के लिए मना भी करता हूँ. ऐसा नहीं ये मुश्किल काम है, लेकिन आप जैसी महिला के लिए नहीं है. इस काम के लिए जो गुण चाहिए वो आप में नहीं है–
1. आपको मानव रक्त पीना आना चाहिए.
2. बेशर्मी की चमड़ी इतनी मोटी होनी चाहिए कि गैंडा भी आपको सलाम करे.
3. गिरगिट को रंग बदलने का हुनर आपसे सीखना पड़े इतनी जल्दी चेहरे के भाव बदल जाने चाहिए.
4. बैगन की तरह थाली जिधर जाए उधर लुढकने में आप को कोई परहेज़ नहीं होना चाहिए.
5. अहसानफरामोशी आप ऐसे करें कि जैसे ये आप का जन्मसिद्ध अधिकार हो.
6. झपट लेने की क्षमता हो, किसी के घर चाहे रोटी ना हो आप को छप्पनभोग मिलने चाहिए.
आगे आपकी मर्ज़ी, आप जो भी करना चाहें वो कीजिये. अपनी बेबाकी के लिए बदनाम हूँ. माफ़ी चाहता हूँ." क्या अब भी नुझे मासिक पत्रिका निकालने की सोचनी चाहिए?
डॉ. नूतन ठाकुर
स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्री






