गोरखपुर से खबर है कि मशहूर व्यवसायी ओपी जालन ने दैनिक लोकपाल नाम से दैनिक अखबार लांच करने का निर्णय लिया है. पहले दैनिक जागरण से अपने लाव लश्कर के साथ बाहर हुए शैलेन्द्र मणि ने कुछ महीने पहले ही जन्संदेश का दामन थाम कर जागरण को गोरखपुर में डुबोने का एक प्रयास किया लेकिन औंधे मुंह गिरे और गिरे तो कुछ यूँ गिरे कि उनके अपने भी बेगाने होते गए. आज जनसंदेश टाइम्स की हालत किसी से छुपी नहीं है. अपने शैशव काल में ही अखबार ने वो दुर्दिन देखे, जिसका अनुमान अगर शैलेन्द्र मणि को पहले होता तो कभी वो जनसंदेश टाइम्स के साथ नहीं जाते.
आज हालत यह है कि जिन लोगों ने उनके भरोसे जागरण या दूसरा अखबार छोड़ कर जनसंदेश टाइम्स का दामन थामा था, उनमें से ज्यादातर लोगों की छंटनी की जा चुकी है. स्थिति ये हो गई है कि एक अदना पत्रकार भी अब सीधे शैलेन्द्र मणि के खिलाफ आवाज़ उठाने में ज़रा भी संकोच नहीं करता, जबकि जागरण के दौर में शैलेन्द्र मणि का अच्छा सम्मान पत्रकार तबके में रहता था. जाहिर है कि उसकी याद में शैलेन्द्र मणि भी आहें भरते होंगे और कहते होंगे कि "कहाँ गए वो दिन". मगर क्या करें मणि जी "सब दिन होत न एक समाना". कभी नाव गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर.
कई तो यहां तक बताते हैं कि शैलेन्द्र मणि डिप्रेशन में आते दिखने लगे हैं. वह खुद को अपने लोगों के दबाव में महसूस कर रहे हैं. न ठीक से वेतन, न खर्चा, न नियुक्ति पत्र, न वेतन खाता, आखिर किस आधार पर जन्संदेश टाइम्स के पहरुए खड़े रहे दिन-रात एक कर के, इस सवाल का जवाब अभी तक शैलेंद्र मणि ढूंढ नहीं पाए हैं. रही बात अनुज पौद्दार की तो ये बात सही है कि शायद इन सब में उन की भूमिका भी अहम होगी, लेकिन जहां-तहां से जागरण, उजाला छोड़ कर शैन्द्र मणि के कहने पर जनसंदेश टाइम्स में आये पत्रकारों का पौद्दार से क्या मतलब उनसे तो सारे आसमानी वायदे शैलेन्द्र मणि द्वारा किये गए, सो उनका शैलेन्द्र जी पर आरोप मढ़ना जायज ही है.
ये बात शैलेन्द्र मणि को शुरू में सोचनी चाहिए थी कि वो अनुज पौद्दार से कितनी अपेक्षा रखते हैं और पौद्दार कितना देने को तैयार हैं? जनसंदेश टाइम्स के ही एक मित्र ने शैलेन्द्र मणि एवं पौद्दार पर तमाम आरोप मढ़ते हुए कहा कि जल्द ही गोरखपुर के मुख्य कार्यालय पर एक मीटिंग में यह फैसला कर लिया जाएगा कि इस अखबार को चलाना है कि नहीं? कुछ सूत्रों की माने तो वादाखिलाफी के लिए अपनों के बीच कुख्यात हो चुके शैलेन्द्र मणि समय रहते ही पौद्दार का साथ भी छोड़ सकते हैं, क्योंकि शैलेन्द्र मणि की आदत है लक्ष्मी का दोहन करने की और वो इस कला में माहिर हैं. पहले जागरण में रहकर गोरखपुर की मीडिया पर एकक्षत्र राज कर जागरण के माध्यम से अपने कर्मियों तथा लक्ष्मी का दोहन किया. उसके बाद जागरण के खिलाफ हो गए. इसके बाद फिर पौद्दार का जितना हुआ दोहन किये, जिसमें सैकड़ों लोगों का भविष्य दाँव पर लग गया है.
खैर, अब सुनने में यही आ रहा है कि शैलेन्द्र मणि एक और अंधा धन कुबेर खोजने में लगे हैं, जिसको मीडिया की गाय बना कर दोहन कर सकें. मुझे इस बात का बिल्कुल आश्चर्य नहीं होगा जब सभी क्षेत्रीय जनसंदेश टाइम्स के ब्यूरो कार्यालय पर "दैनिक लोकपाल" का बैनर टंगा मिले, जिसमें आदमी कंप्यूटर वही हो सिर्फ ब्रांड बदल जाए. गोरखपुर के व्यवसायी जालान द्वारा संभत: मई महीने से दैनिक लोकपाल लांच किए जाने की संभावना जताई जा रही है. और शैलेन्द्र मणि का नाम उस अखबार के संपादक के रूप में लाए जाने की संभावना भी जताई जा रही है. साथ ही उम्मीद जताई जा रही है कि अपने साथियों को फिर इस नए मोर्चे पर खड़ा करें. अगर इतिहास को अगर वर्तमान का गवाह माना जाए तो भूतकाल में जालान को अखबार की लांचिंग कहीं महंगी न पड़ जाए.
शिवानंद द्विवेदी 'सहर'






