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‘पाखी’ में ‘दारोगा कुलपति’ का यह कैसा पीआर है प्रेम बाबू!

पूरे तीन साल बाद 'पाखी' के जुलाई अंक के कवर पेज पर दारोगा कुलपति, कोतवाल साहित्यकार श्री विभूति नारायण राय और कथाकार मैत्रयी पुष्पा का सहज फोटोग्राफ लगाकर अन्दर के तेरह पन्नों में ‘टाक ऑन टेबल’ की प्रस्तुति की गई है. यह ‘टाक ऑन टेबल’ इसलिए भी ऐतिहासिक है कि इसमें सुनियोजित तरीके से हिंदी साहित्य की एक ऐसी लम्पटता को सम्मानित करने का प्रयास है, जिसने हिंदी साहित्य और स्फीअर में तीन साल पहले ख़ास हलचल पैदा की थी.

पूरे तीन साल बाद 'पाखी' के जुलाई अंक के कवर पेज पर दारोगा कुलपति, कोतवाल साहित्यकार श्री विभूति नारायण राय और कथाकार मैत्रयी पुष्पा का सहज फोटोग्राफ लगाकर अन्दर के तेरह पन्नों में ‘टाक ऑन टेबल’ की प्रस्तुति की गई है. यह ‘टाक ऑन टेबल’ इसलिए भी ऐतिहासिक है कि इसमें सुनियोजित तरीके से हिंदी साहित्य की एक ऐसी लम्पटता को सम्मानित करने का प्रयास है, जिसने हिंदी साहित्य और स्फीअर में तीन साल पहले ख़ास हलचल पैदा की थी.

लम्पट और सुनियोजित साक्षात्कार में महिला लेखन के बहाने स्त्री के अस्तित्व और उसकी गत्यात्मकता पर प्रहार किया गया था. ‘छिनाल’ प्रकरण के नाम से विवादित इस पूरे वाकये में एक और शब्द, जो लेखिकाओं के लिए इस्तेमाल हुआ था, 'निम्फोमैनिक कुतिया', कम चर्चा में रहा, लेकिन कहने वाले की आक्रामक और अश्लील मानसिकता को यह शब्द ज्यादा स्पष्ट करता है. खैर 'पाखी' के ताजा अंक के १३ पन्नों में फैले इस पीआर की कुछ खासियतें समझ ली जानी चाहिए, इसके पहले की इस बातचीत के विशेष तफसील में जाया जाय.

1- आधा से अधिक बातचीत विभूति नारायण राय जैसे औसत साहित्यकार को महान रचनाकार और साम्प्रदायिकता विरोधी मुहिम के अप्रतिम योद्धा सिद्ध करने का प्रयास है. शुरूआत के चार –पांच पेज में राय की ‘महान रचनाधर्मिता’ और साम्प्रदायिकता विरोधी मुहिम में ‘महान योगदान’ की  एक –एक डिटेल के साथ प्रेम भरद्वाज और उनकी टीम ने एक पृष्ठभूमि बनाई है. यह डीटेल इस बातचीत के पहले राय पर पीएचडी नुमा किये गए शोध का परिणाम सा है, जो पाखी की टीम ने या तो खुद किया है या राय के ‘व्यक्तित्व कृतित्व’ पर शोधकर्ता एक महिला के सहयोग से किया है, जिसके आलोचक पति को स्त्री अध्ययन विभाग में पहले से आरक्षित कोटे में विज्ञापित पद को सामन्य कोटे में विज्ञापित करके अवैध रूप से नियुक्त किया गया है, शोधों का पुरस्कार विभूति राय बखूबी देते हैं!

2-राय के व्यक्तित्व का महिमामंडन कुछ उसी अंदाज में किया गया है, जैसा होशियार वकील अपने अपराधी मुवक्कील के मुक़दमे को न्यायाधीश के सामने रखने के पहले करता है, ताकि इस महिमामंडन के प्रभाव में न्यायाधीश उसके अपराध के प्रति सहानुभूति के भाव में आ जाए. और उसके खिलाफ गवाही के लिए आये गवाह या आरोपकर्ता हतोत्साहित हों या अपने मामले की पैरवी के लिए आवश्यक आत्मविश्वास को ही खो दें.

3- पूरे विवाद को विभूति नारायण राय और मैत्रयी के बीच का मामला भर बना कर पेश किया गया है, जबकि यह लेखिकाओं और स्त्रियों के सामजिक अस्तित्व पर मर्दाना हमला था , जिसके खिलाफ व्यापक असहमतियां दर्ज की गई थीं, आक्रोश सामने आया था .

4- जिस आक्रामकता के साथ इस बातचीत की बुनावट हुई है , उसमें मैत्रयी जैसी कद्दावर महिला भी लाचार प्रतिरोध भर कर पाती हैं, दारोगा साहित्यकार कभी उनसे अपने पारिवारिक रिश्तों की दुहाई देता  है तो कभी पुलिसिया घुडकी और मैत्रयी उस पारिवारिक जाल में एक भली महिला की तरह कैद होकर विभूति की पत्नी और भाई से अपने संबंधों की स्मृतियों में उलझ जाती हैं.

5- बातचीत से सायास उन किरदारों को दूर रखा गया है, जो एक स्त्रीवादी समझ और राजनीति के साथ विभूति की लम्पटता के खिलाफ खड़े हुए थे. शायद वे होते तो मैत्रयी अपने खिलाफ बने वातावरण में अकेले न फंसती और शायद विभूति के लिए सबकुछ उतना आसान नहीं होता . निस्संदेह दारोगा अपनी कुर्सी छोड़कर भाग खड़े होते .

साहित्यकार की खाल में असली दारोगा, लम्पट पुलिसिया

दारोगा ने एक प्रश्न के जवाब में कहा है, ‘मेरे इस पेशे में, जिन लोगों से मुलाकात होती थी, उनमें चोर थे, रंडियां थीं, स्मगलर थे. यह जवाब थानों के उन दारोगाओं से बहुत अलग नहीं हैं, जो आपसे थोडा भी बेतकल्लुफ होंगे तो रात के अपने दौरों में अश्लील काल्पनिक / सत्य कथाओं से आपको समृद्ध करने की कोशिश करेंगे. यह दारोगा ‘रंडी’ जैसे शब्द २०१३ में निर्लज्जता से अपनी भाषा में सहज बना चुका है, जबकि १९०९ में भी, तब जब दुनिया भर में स्त्रीवादी आन्दोलन और संवेदना ने आज की तरह जगह नहीं बनाई थी, ऐसे शब्द संवेदनशील लोगों को स्वीकार नहीं थे. गांधी जी को हिन्द स्वराज से अपने ऐसे शब्द वापस लेने पड़े थे. दारोगा की यही भाषा और मानसिकता 'छिनाल' और ‘निम्फोमानियक कुतिया’ जैसी अभिव्यक्तियों के साथ भी सहज होती जाती है.

दारोगा की हिम्मत भी काबिले गौर है. वह मैत्रयी जी को ऐसे घेर रहा है, ऐसे धृष्ट अंदाज में उन्हें ही सफाई देने के मोड़ में ला दे रहा है, मानो उन्होंने उसके खिलाफ ही कोई अपराध किया हो. वह मैत्रयी से सहानुभूति भी जताता है, उन्हें दूसरों के हाथ की कठपुतली बताता है, ‘उनके तन मन धन’ खर्च होने पर आहत भी है. और फिर जिरह शुरू करता है, दामिनी फिल्म के वकील की तरह. अनायास ही वह ज्योति कुमारी की चर्चा छेड़ देता है, जिसका कोई प्रसंग छपी बातचीत में कम से कम नहीं उपस्थित होता है. हंसते हुए वह ज्योति कुमारी को जिस अंदाज में मैत्रयी पुष्पा बता रहा है, उसका ध्वन्यार्थ ‘नया ज्ञानोदय’ के अगस्त २०१० अंक से जा जुड़ता है.

दारोगा कुलपति पूरे दंभ के साथ पहले तो बयां करता है,  ‘आपने तो फिर भी सालों लगा दिए. जिन लोगों ने बयान दिए थे, वे तो दो महीने में ही यूनिवर्सिटी में टहलते दिखाई पड़े.’ आगे चलकर मैत्रयी जब इसी बात को दुहराती हैं तो दारोगा उन्हें दुत्कार देता है, ‘आप साहित्यकारों का अपमान कर रही हैं.’

विभूति अपने को निर्दोष बताते हुए उनके खिलाफ अगस्त २०१० में उठी आवाजों को तीन युवाओं के सञ्चालन में अपने खिलाफ साजिश बता रहे हैं और उन युवाओं को से अशोक वाजपयी और विष्णु खरे के चेले बता रहे हैं, जिन्हें हिंदी का एक अख़बार (शायद जनसत्ता) हवा दे रहा था.प्रेम भरद्वाज विभूति के इस धृष्ट दावे को कोई चुनौती भी नहीं देते, जबकि वे युवा उनके मित्र रहे हैं / हैं , क्यों उमा भाई सच कह रहा हूँ न . और मैं जानता हूँ कि वे युवा उस लड़ाई में अशोक वाजपई से कोई भी सहयोग लेने से इसलिए इनकार कर रहे थे कि वे उन्हें भी हिंदी वि वि की दुर्दशा का जिम्मेवार मानते थे. विभूति इस प्रकरण में वर्धा के जिस ऍफ़ आई आर से सबसे अधिक परेशान  हुए थे उन्हें दर्ज कराने वाले युवाओं से इस प्रकरण के दौरान और बाद में अशोक वाजपई का कोई संवाद तक नहीं है , ऐसा मैं इसलिए भी दावा कर सकता हूँ , क्योंकि एफ आई आर दर्ज करने वालों में से  एक मैं खुद हूँ.

विभूति घमंड और चालाकी के साथ लोगों को समझा रहे हैं कि ‘केन्द्रीय विवि के कुलपतियों को हटाने की प्रक्रिया बड़ी जटिल है, उन्हें महिलाओं को अपमानित करने के लिए नहीं हटाया जा सकता था.’  विभूति को भी खूब पता है कि वे क्यों सर के बल कपिल सिब्बल के आगे नतमस्तक हो गए. किसी भी विश्वविद्यालय का कुलपति महिला मुद्दों पर आसानी से चलता किया जा सकता है, यह उन्हें पता था, पता है. और सिब्बल ने उनसे इस्तीफ़ा माँगा था, हटाने की कारवाई की जरूरत नहीं थी. इस्तीफ़ा मांगना ही काफी था विभूति बाबू !

समझदारी का भ्रम 

विभूति पूरी बातचीत में समझदारी का भ्रम भी पैदा करते हैं. वे स्टेट के चरित्र पर बोलते हैं, विरोधी विश्वविद्यालय प्रशासनों के खिलाफ बोलते हैं और इस दौर के राजनीतिज्ञों को पिछली पीढ़ी से ज्यादा सहिष्णु बताते हैं. अब इस समझदारी पर आप खीझने से अधिक क्या कर सकते हैं! फर्जी एनकाउंटरों, फेसबुक पर टिप्पणियों के लिए गिरफ्तारियों, विरोधियों को करीने से ठिकाने लगाने के इस दौर में विभूति को सहिष्णुता की बाढ़ दिखाई दे रही है. हे सहिष्णु विभूति बाबू आपने अपने विरोधियों (मुझे, राजीव और अनीस, आजाद, अनिल चमडिया आदि) को ठिकाने लगाने के लिए कैसी कैसी सहिष्णुतायें दिखाई है, फर्जी कागजात बनवाना, अपनी बिरादरी के पुलिसवाले से ठिकाने लगाने के पूरे प्रयास करना, धमकियाँ भिजवाना सहिष्णुता ही तो है न विभूति बाबू! प्रेम भाई भी बतायेंगे कि आपके विरोधियों के घोषित आलेख आपके या आपके शागिर्दों के किस और कैसे दवाब में पाखी से बाहर हो जाते हैं, यह कैसी और किस प्रकार की सहिष्णुता है …!!

हाशिमपूरा के सवाल

विभूति को पुलिस सेवा में रहते हुए खूब अनुभव होगा कि एक मजबूत एफआईआर पर ही सुनिश्चित होता है अपराधियों को सजा मिलना. हाशिमपुरा काण्ड के मामले में ऐसा कौन सा एफआईआर करवाया था आपने कि एक भी आरोपी को सजा नहीं मिली. बाद के दिनों में सरकार भी आपके उन आकाओं की रही, जिनके वरदहस्त से आप अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि खड़ी कर पाए. उन सरकारों के रहते आपने हाशिमपुरा के लोगों को न्याय दिलाने के लिए क्या क्या विभागीय भूमिकाएं निभाई दारोगा साहब! आप ‘कमंडल आन्दोलन’ के दौरान अपने लिए विशेषणों की चर्चा तो खूब करते हैं, लेकिन प्रदेश और देश में भाजपा की सरकार जम जाने के बाद आपने अपनी कलाबाजियों की जिक्र तो नहीं किया. आप राजभवन में हिंदूवादी राज्यपाल के लिए अपने द्वारा काढ़े गए कसीदों की बानगी तो दे जाते! और हाँ विभूति बाबू आप आप तीन भूमिहारों की नियुक्ति की बात तो करते हैं, लगे हाथ अल्पसंख्यकों की संख्या भी गिना जाते, तीन भी हैं क्या!

जातिवाद, भ्रष्टाचार और अपराध

विभूति इस बातचीत में मैत्रयी से एक सुविधाजनक सवाल पाते हैं, भूमिहारों की नियुक्ति का सवाल. ऐसा इसलिए कि शायद विभूति के जातिवाद, भ्रष्टाचार और अपराध के ठोस सबूतों से मैत्रयी वाकिफ नहीं हैं. उन्हें नहीं पता है कि विभूति ने कैसे अवैध नियुक्तियों के जरिये अपने लिए पुरस्कार (रेणु के नाम), एक बदनाम भूमिहार संस्था के द्वारा राष्ट्रपति के हाथों (दिनकर के नाम), पद (ज्ञानपीठ के निर्णायक मंडल में ), सम्मान और स्वीकृति हासिल की है.

पाखी और प्रेम भरद्वाज को इस ऐतिहासिक भूमिका के लिए साधुवाद! जब जब यह याद किया जायेगा कि एक ऐसा दौर था जब एक कोतवाल साहित्यकार और दारोगा कुलपति हिंदी की चेतना पर काबिज हो गया था, तब तब इस ‘ टाक ऑन टेबल’ को जरूर याद किया जायेगा …!!!

संजीव चंदन का विश्लेषण.

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