Mukund Hari Shukla : भड़ास के संस्थापक और पत्रकार यशवंत सिंह की लिखी इस किताब को उपन्यास समझने की भूल न करें. यह तो एक संस्मरण है जिसमें उन्होंने न केवल अपनी जेलयात्रा का रोचक तथा जीवंत वर्णन किया है बल्कि जेल के जीवन को भी छोटी-छोटी चीजों से प्रेरणा लेकर अधिक सुखदायी रूप से जिया है. ये पुस्तक एक विचारधारा को दर्शाती है कि किस प्रकार सीमित संसाधनों के साथ भी असीमित शक्ति और संसाधनों वाले बड़े-बड़े नामों और संस्थानों के विरुद्ध सफल रूप से लड़ा जा सकता है. ज़रूरत है तो सिर्फ सच्चाई और ईमानदारी के साथ सच बात को कहने की और अपना खूंटा गाड़कर उस पर अडिग रहने की.
कई बार ऐसा लगा कि यह पुस्तक व्यवस्थित रूप से नहीं लिखी गई है और इसमें अभी और भी बहुत कुछ छूट गया है लेकिन जब लिखने को इतना कुछ हो और आपके पास पन्नों की सीमा का बंधन हो तो ऐसा होता है. कभी ऐसा लगा कि यशवंत कहीं-कहीं पर अति आत्म-विश्वासी और स्वयम्भू होकर आत्म-प्रशंसा कर रहे हैं लेकिन लेखक ने बार-बार खुद को इस समाज में एक छोटा और सड़क छाप आदमी बोलकर मेरी इस सोच को आगे नहीं बढ़ने दिया.
एक बात है जिसे मैं ज़रूर कहूँगा कि जागरण और इंडिया टी.वी. की जिस साजिश की बात यशवंत जी ने इस किताब में कही है उसे पृष्ठभूमि में एक अलग अध्याय के रूप में जरूर देना चाहिए था ताकि जो नये लोग इसे पढेंगे, उन्हें पूरी बात समझने का मौका मिल सके. कुल मिलकर ये किताब तथाकथित निष्पक्ष और निष्कलंक पत्रकारिता का डंका पीट रहे स्व-नामधन्य बड़े नामों और संस्थाओं के खिलाफ यशवंत जी और भड़ास की तरफ से किये जा रहे संघर्ष की व्याख्या है. एक ऐसा संघर्ष जो आगे भी चलता रहेगा क्योंकि ये किसी एक व्यक्ति या समूह के विरुद्ध नहीं है बल्कि ये उस पूरी व्यवस्था के विरुद्ध है जिसने पत्रकारिता के पेशे को दागदार और कलंकित किया हुआ है. खुद के ही समाज के खिलाफ खड़े होना बहुत ही जीवट का कार्य होता है. आपके खिलाफ़ सारा सिस्टम खड़ा हो जाता है और हर तरह से आपको तबाह और परेशान करने का कुचक्र आपके ही हमपेशा साथियों की तरफ से रचा जाने लगता है.
जो भी हो ‘जानेमन जेल’ के लिए यशवंत जी बधाई और प्रशंसा के पात्र हैं. पूरी पुस्तक में लिखी गई बातें वास्तव में उनके दिल की भड़ास और गुबार के तौर पर सामने आई हैं जिसने हम सबको भी इस भ्रष्ट-तंत्र के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने का साहस दिया है.
जय हो!
मुकुंद हरि शुक्ला की टिप्पणी.
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