: महुआ समूह-जहाज में बेहिसाब बिल खोदे हैं तोपची-चूहों ने : नोएडा : किसी ऐसे कथित विनय आर्यदेव नामक शख्स ने मेरी निष्पक्षता और निजी आग्रह-पूर्वाग्रह आदि पर टिप्पणी की है। अनर्गल प्रलाप। मेरी आपत्ति है कि ऐसे शख्स सीधे मेरे सामने क्यों नहीं आते हैं। बहरहाल, ऐसे नाम पर कोई टिप्पणी करने के बजाय मैं अब सीधे मुद्दे पर आना चाहता हूं। हां, यह तो सब को पता है कि महुआ समूह के मुखिया पीके तिवारी को उनके बेटे आनंद तिवारी के साथ सीबीआई ने गिरफ्तार किया है।
हां, खबर की आपाधापी में अभिषेक तिवारी का नाम कैसे शामिल हो गया, मैं समझ नहीं पा रहा हूं। जाहिर है कि मैं अपनी गलती मानता हूं। बिना शर्त। लेकिन मैंने कभी महुआ समूह पर किसी संकट को झूठ की चाशनी के साथ चटखारे लेने लेने की कोशिश नहीं की। खबरों के प्रति हमेशा तथ्यों पर ही आधारित पत्रकारिता का हाथ थामा। ऐसे में किसी व्यक्तिगत पूर्वाग्रह की बात सोच से परे है। जानने वाले लोग मुझे एक बेबाक शख्स मानते हैं जिस पर कभी कोई आक्षेप नहीं पड़ा। मैं नैतिकता के सांचे में पत्रकारिता करता हूं, दलाली और धोखेबाजी की शर्त पर नहीं।
तो कथित आर्यदेव जी, आनंद तिवारी जी के मामले में आप किन लोगों के नाम से आक्षेप लगा रहे हैं कि मैं किसी बड़ी मुसीबत में फंस सकता हूं, मैं साफ कर दूं कि मैं आपकी तरह डरपोक नहीं। जब मैं अपने वरिष्ठों को जेल जाने से बचाने का हौसला रखता हूं तो खुद जेल जाने को तैयारी रखने का हौसला भी रखता हूं। मैं चाहता तो रामपुर में ही अपने वरिष्ठों को जेल भिजवा सकता था, लेकिन मैंने खुद को अदालत में पेश कर वरिष्ठों को बचाया था। लेकिन आप जैसे लोगों ने तो अपने ही शीर्षस्थ को सपरिवार जेल भिजवाने का ताना-बाना बुन डाला। महुआ में कौन नहीं जानता कि इन्हीं तोपची टाइप लोगों ने महुआ मामले में फंसाने से बचाने के लिए मोटी-मोटी रकमें वसूलीं थीं। और जब उन्हीं तोपचियों की करतूत खुलने पर उनके नाड़े खुलने लगे तो पीके तिवारी के पेंच कसने की साजिशें की गयीं। इन्हीं तोपचियों का लक्ष्य था कि पहले माल खींचो, फिर डूबते जहाज से भाग कर सबसे पहले बिल खोजो और उसके बाद जहाज में इतने सूराख बना दो कि जहाज डूब जाए।
महुआ की हालत आप खूब जानते हैं। मैं भी यहां के कण-कण की पीड़ा को जानता हूं। चूंकि यह मेरे पुराने के संस्थान का मामला है, मैं चुप ही रहना पसंद करूंगा। लेकिन आप, यानी कथित देवआर्य जी। आप जैसे तोपचीनुमा चूहों ने महुआ-जहाज में कितने सूराख खोदे हैं, आपसे बेहतर कौन जानता है। कौन नहीं जानता कि देहरादून में पत्रकारिता संस्थान खोलकर आपने महुआ के सभी चैनलों का कैसा इस्तेमाल किया। महज मूर्खतापूर्ण इंटरव्यू पर इंटरव्यू किये और उनके बल पर अपने इस संस्थान के लिए हर चीज उगा लिया। आपके ही चेले-चूहे ने पटना में आपके ही बल पर एक अलग पत्रकारिता संस्थान खोल दिया। यह दोनों ही संस्थान छह महीने के भीतर ही खोले गये। इसके लिए आपने और आपके चेला-चपाटी ने महुआ की ओबी जैसे सारे संसाधनों को चूस डाला। जेल जाने से तिवारी को बचाने के नाम पर कितनी रकम उगाही, आप ही बताएं। और जब आपकी हालत पतली हो गयी, तो तिवारी को जबरिया भिजवाने के लिए जुगत भिड़ायीं आपने। जिस थाली में खाया, उसी में तमाम छेद कर डाले।
आप मुझ पर आक्षेप लगा रहे हैं, लेकिन अपने गिरहबान में झांकिये। रामपुर अदालत से जारी गैर जमानती वारंट का नाम सुन कर ही सबकी पैंट गीली हो गयी थी। आप जैसे लोग आंर्तनाद कर रहे थे। यह वारंट संपादक और प्रसारण प्रमुख के नाम था। मुझसे कहा गया कि मैं जाकर इस मामले को सुलटा दूं। मैं तो पूरा मामला भी समझ नहीं पाया था। आखिर मैं ब्यूरो चीफ था, संपादक या प्रसारण प्रमुख नहीं। मेरी समझ भी नहीं आया। लेकिन यह बाद की बात है कि कैसे मैं सीधे रामपुर पहुंचा और खुद को अदालत में हाजिर करा गया। जमानतदारों का इंतजाम भी मैंने अपने दम पर ही किया। लेकिन अचानक एक दिन आपने मुझसे इस्तीफा मांग लिया। मैंने इस्तीफा देते समय जब पूछा कि रामपुर वाले मेरे मामले में क्या किया जाएगा और उस मामले की पैरवी में क्या संस्थान करेगा, आपने बात तक करने से इनकार कर दिया था। केवल यह कहा कि आप अपना मामला खुद देख लें, संस्थान का उससे कोई लेनादेना नहीं। हैरत की बात रही कि इसके बाद पीके तिवारी जी ने मेरे किसी भी फोन या मैसेज का जवाब भी नहीं दिया।
तो, किस्साकोताह, आप वाकई बेशर्म हैं। आप जैसे स्त्रैण-व्यवहारी पुरूष को क्या कोसा जाए, जो महुआ में कोई काम के बजाय केवल सभी लोगों को अपनी मूर्खतापूर्ण कविताओं को सुनाकर खुद अपनी पीठ ठोंकता घूमता रहता है। आपने लिखा है कि महुआ न्यूजलाइन की खबर के बाद उत्तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा सफाई देने के लिए भी इसी चैनल को चुनते हैं और बाबा रामदेव खुद से जुड़े मुद्दों पर फोन करके आधे घंटे तक अपनी बात रखते हैं। जरा कथित आर्यदेव जी, आखिर उत्तराखंड के प्रति इतना प्रेम करते हैं। क्यों विजय बहुगुणा को सफाई देने के लिए इस्तेमाल करते हैं। क्यों रामदेव का आधा-आधा घंटों तक बतियाते हैं। केवल इसीलिए ना कि आपको अपने नवजात पत्रकारिता संस्थान के प्रति स्नेह है, महुआ से हर्गिज नहीं। क्योंकि महुआ के बाद आपका एकमात्र भविष्य केवल इसी में है और आपको ज्यादा से ज्यादा रकम अपने और अपने चिंटू-पिंटुओं के खाते में खींचना है।
आपका आरोप है कि महुआ का मौजूदा संकट कुछ राजनेता, कुछ बड़े पत्रकारों और कुछ व्यवसायियों की साजिश की वजह से खड़ा हुआ। जिन्होंने पहले तिवारी से दोस्ती गांठकर ढेरों लाभ हासिल किए, खुद को मजबूत किया और फिर पीठ में खंजर भोंक दिया। इन्होंने महुआ समूह पर संगीन आरोप लगाकर इतनी जगह, इतनी शिकायतें की कि समूह पर दबाव बढ़ गया।— पहली बार आपने सच बोला है कथित आर्यदेव जी। सच बोला क्या है, खुद के सारे घटिया चरित्रों को एकसाथ समेटा है आपने। आप ही राजनीतिज्ञ हैं, व्यवसाई हैं, और बड़े पत्रकार भी आप ही खुद हैं, जिसने पहले तिवारी जी से दोस्ती गांठी और ढेरों लाभ हासिल किये, केवल खुद को मजबूत किया और जब पीके तिवारी के सामने आपकी कलई खुलते दिखी और आपका पत्ता जब महुआ से कटने लगा तो सरकारी महकमों में महुआ समूह की इतनी शिकायतें कर डालीं कि समूह पर दबाव बढ़ गया। और नतीजा सामने है। महुआ के प्रति आपका परिश्रम श्रमसाध्य है, यकीनन आप अपने लक्ष्य में सफल रहे।
जैसा कि आपने खुद कुबूला है कि समूह की हैसियत दो हजार करोड़ से ज्यादा की है। और शायद इसीलिए आप जैसे लोग
येन-केन-प्रकारेण इस बड़े समंदर का ज्यादा से ज्यादा पानी अपने खाते में उलीच रहने की साजिशें रच रहे हैं। आपके बारे में मैं यह सब सच ही कह रहा हूं ना। क्यों बोलो ना तोपची-चूहे ?
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. इनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.





