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सुख-दुख...

पीछे छूटता गांव और चकाचौंध में भटकते युवा

बड़े-बड़े तुर्रम खां गांवों में ही पैदा हुए। बहुत ऊँचे तक उड़े। आखिर दम गाँव में ही आकर लेना पड़ा। आज भी कई महाशय दिल्ली-मुम्‍बई में भले ही अटके हों, उनकी लेखनी में गाँव सांस नहीं ले तो उन्हें कोई सूंघे भी नहीं. समझदारी भी इसी में ही है कि हम महीने में एकाध चक्कर गाँव का दे मारे. सार-संभाल कर या इससे मिला-जुलता नाटक कर आयें। कई मर्तबा दिल बहलाने के लिए बहुत से काम मज़बूरी में करने पड़ते हैं। अफसोस जो हमारे दायित्व का हिस्सा है। वही अभिनय की विषयवस्तु बनती जा रही है। कई माँ-बाप तो बेचारे बेटे-बेटियों के अभिनय से ही अपना जी बहलाकर ज़िंदा है। बूढ़े लोग शहर जा बसी इस जवां पीढ़ी की वापसी हेतु अपनी बाप-दादा की सम्पत्ति के हक का क्या प्रलोभन देंगे ये पीढ़ी तो पहले से ही लाखों के पैकेज में उलझ गयी थी, जब उनके पिताश्री और माता श्री उन्हें पढ़ा-लिखाई के वक़्त पैसे देकर बसों-ट्रेनों में विदा करने जाया करते थे।

बड़े-बड़े तुर्रम खां गांवों में ही पैदा हुए। बहुत ऊँचे तक उड़े। आखिर दम गाँव में ही आकर लेना पड़ा। आज भी कई महाशय दिल्ली-मुम्‍बई में भले ही अटके हों, उनकी लेखनी में गाँव सांस नहीं ले तो उन्हें कोई सूंघे भी नहीं. समझदारी भी इसी में ही है कि हम महीने में एकाध चक्कर गाँव का दे मारे. सार-संभाल कर या इससे मिला-जुलता नाटक कर आयें। कई मर्तबा दिल बहलाने के लिए बहुत से काम मज़बूरी में करने पड़ते हैं। अफसोस जो हमारे दायित्व का हिस्सा है। वही अभिनय की विषयवस्तु बनती जा रही है। कई माँ-बाप तो बेचारे बेटे-बेटियों के अभिनय से ही अपना जी बहलाकर ज़िंदा है। बूढ़े लोग शहर जा बसी इस जवां पीढ़ी की वापसी हेतु अपनी बाप-दादा की सम्पत्ति के हक का क्या प्रलोभन देंगे ये पीढ़ी तो पहले से ही लाखों के पैकेज में उलझ गयी थी, जब उनके पिताश्री और माता श्री उन्हें पढ़ा-लिखाई के वक़्त पैसे देकर बसों-ट्रेनों में विदा करने जाया करते थे।

अफसोस, सिनेमा और किताबों में गाँव की साख भले घटती-बढ़ती रही हो, लेकिन नगरीय जीवन जीने वाले युवाओं के मन में गाँव हमेशा हिलोरे मारता रहता है। तब वे चाहे शहर में ठूंसे हों या गाँव में ही जमे हुए हों। ये तो समय की करवट ही है जो तमाम हमउम्र के जवान पट्ठे इस हिलोर को अब कुछ कम आंकने लगे हैं। बेचारों की व्यस्तता ही इतना घेरे रखती है उन्हें कि कई साथी तो इन हिलोरों की उठान को एक नज़र तक नहीं देख पाते। अफसोस, जबकि इधर छुट्टियां बिताने ठेठ गाँव आये एक युवा की कहानी में गाँव में उसके रहने के हालत अक्सर दूजे युवा की कहानी से मेल खाती हैं। गंवई संस्कृति में पले-बढ़े और अब शहर में जा चिपके हम साहबजादों को कौन समझाए कि जन्म भूमि क्या होती है जिसे तुम बिसारकर उसे उलांघते हुए बहुत आगे चले गए हो। किसमें हिम्मत है जो बैठकर इन राह भटके दोस्तों को रास्ता दिखा दे।

काश ये जवान आँखें समझ पाती कि क्यूं गाँव से शहर की वापसी पर माँ-पिताजी का मुंह छोटा सा हो जाता है। वे आखिर तक कुछ बातें याद दिलाते रहते हैं। हम गाड़ी स्टार्ट करके आगे बढ़ने की जुगत में रेस पर हाथ धरे रहते हैं। हुंकारे भरते हुए आखिर हमारी अति आधुनिक औलादें आगे बढ़ ही जाती हैं। और इन तमाम दृश्यों में फिर से एक बार पीछे न सिर्फ गाँव छूटता है बल्कि अपने हाल ज़िंदगी जीते माँ-पिताजी छूट जाते हैं। वे वहाँ अपनी सारी फुर्सत हम नाचीज़जनों पर खर्चते हैं। और इधर हम बेकाम की चीजों में उलझे हुए ख़ास रिश्तों तक की टोह नहीं ले पाते हैं। अजीब ज़िंदगी है। कभी-कभी खुद पर बहुत दया आती है। स्वयं को ही कटघरों में खड़ा पाते हैं। खुद को सजा देने की बात सोचते ही हैं कि अचानक इसी शहर का कोई ज़रूरी काम याद आ पड़ता है। कोई नई सेमीनारें आवाज़ लगाती हैं, प्रेस की संगतें बुलाती हैं या दोस्तों के साथ की शामें, जहां हम बोतलें खोलने के अलावा कभी-कभी कुछ भी सार्थक नहीं कर पाते। हम सोचना छोड़ बस आखिर में चल पड़ते हैं।

हमारे ज़रूरी कामों की फेहरिस्त में समय निकाल कर गाँव फोन लगाना या कि फिर गाँव को अपने विचारों के केंद्र में लाना कभी कभार ही शामिल कर पाते हैं। इस दौड़ में हम भूल जाते हैं कि बूढ़े पिताजी कैसे आटे को पिसाने के लिए चक्की तक लाते-ले जाते होंगे। कैसे नल के चार दिन में आने पर हैंडपंप-बावड़ी-तालाब खंगालते होंगे। हमें लगता है कि उनके पास बहुत सी फुर्सत बची हुयी होती है। इधर कितने व्यस्त हैं हम जिनके पास खर्चने को इतना वक़्त भी नहीं कि हम इत्मीनान से अपनी जन्म भूमि को याद कर सकें। पोतड़े धोने वाली उस माँ से ठीक से बतिया सकें। अगर माँ है तब तक तो उसकी ज़रूरत अनुभव नहीं होती है, अफसोस। ये पक्की बात है कि बाद के सालों में कितने ही छाती माथे कूटते रहो, हाथ कुछ नहीं आने वाला, जब माँ नहीं रहेगी। कम से कम अब तो संतान की कीमत तो समझे जब खुद हमारी संतानें स्कूल जाने लगी हैं। ये आत्मबोध कभी कभार कर लेने से दुःख हल्का हो जाता है। मगर मन भारी हो जाता है। वैसे भी आत्मचिंतन का ये सही समय है।

ये किसी अतीत मोह की चर्चा की जुगाली नहीं वरन अतीत बोध के विमर्श का हिस्सा है। पिताजी की आँखों के आगे करियर में बढ़ते हुए बच्चे जाने कब आँखों से ओझल हो जाते हैं, इसके पीछे के असली कारणों और बाद के परिणाम जैसे विषय आज शोध के ज़रूरी विषय हो चले हैं। इस पूरे खेल में पिताजी को चक्कर देना सीख चुकी हमारी युवा ज़मात खुद मन ही मन जानती है। तमाम हथकंडों के साथ वे शहर में अपने नितांत निजी पल बिताते हुए नितांत अकेले पड़ जाने के खतरे की तरफ बढ़े जा रहे हैं। इस पूरे चक्र में पता नहीं चलता कब अपने से बड़ों को हम अलग-थलग डाल देते हैं। इधर माँ-बाप ये सोचकर ही हैरान रहते हैं कि एक दिन इन जवान बच्चों की अपने प्राथमिकताओं की सूची में बहुत सी ज़रूरी चीजें गायब होती जा रही हैं, मसलन संस्कार, नैतिकता, सचाई, प्यार, निस्वार्थ भाव, सेवा, आदर। ऐसी तमाम परतें त्वचा से चरम रोग के प्रभाव की तरह साथ छोड़ती जा रही हैं। असल में ये संक्रमण का दौर हैं जिसके प्रभाव से हर रिश्ता प्रभावित हो चुका है।

आज की पीढ़ी जो वनस्पति घी पर ज़िंदा है। मिलावटी और बाजारू उत्पादों की पैदाइश हैं। विचारधारा के नाम पर अधरझूल में अटकी ज्ञान गंगा से लबरेज़ हैं। बड़ा विकट समय है। हम यहाँ युवाओं को सिरे से नकार नहीं रहे वरन युवा जमात के भेजे में जमने वाली गलत परिभाषाओं के खिलाफ एक माहौल बनाना चाहते हैं। वैसे ही काम की जुगत में फंसा युवा अपने लिए ही समय नहीं जुटा पाता, फिर भला वो अपने एकल परिवार के लिए फुरसत जुटा डाले, बहुत हैं। ये समाज उसका आभारी रहेगा। अब भला हम उससे  कैसे आशा करें कि वो बहुत पीछे छूट गए अपने गाँव को याद कर पायेगा। यहाँ गाँव एक प्रतीक भी हो सकता है जो उसके बीत उस दौर से जुड़ा हो, जहां उसके जन्मने-तुतलाने-बढ़ने के शुरुआती दिन बीत रहे थे। अपने बीते को इस हद तक आज की पीढी बिसार सकती है कि जिसमें माँ-पिताजी तक भी शामिल हों जाए। सोचने भर से ही बहुत खतरनाक लगता है।

अब तमाम बहाने गढ़े जायेंगे कि नौकरी, काम-धंधा, घर-परिवार, यारी-दोस्ती, सफ़र जैसी सब बातें। अरे दोस्तों उन बुजुर्गों को हम अनुभवहीन क्या बतलाते चले, उन्होंने दुनिया देखी है। वे आपकी आँख़ें देखे बगैर ही माज़रा भांप लेने का कौशल रखते हैं। अपनी नज़र में उन्हें बेचारे मान लेने वाले युवा सही मायने में आज बहुत गरीब हो चले हैं। भले वे बूढ़े आपकी इस नयी धोखेबाजी के करीब करीब शक्ल वाली शब्दावली से अनजाने हो, मगर जुबान की चपलता और चालाकियां वे भले से जानते हैं। सच मानिए वे आपके इन दुराग्रहों पर भी चुप रह सब कुछ सह लेंगे। उनके सहने की शक्ति का अंदाजा इस युवा पीढ़ी को भला कहाँ। मैं भी इसी ज़मात का हिस्सा हूँ, जहां गिनीचुनी कुछ नवाचारी बातों में फंसा अपने अभिभावक को उलझा आता हूँ। कई मर्तबा बहाने कम पड़ जाते हैं, जब माँ बार-बार गाँव नहीं आ पाने का कारण पूछती है। हम बहुत बुरे फंसे हुए मर्द हैं। न आगे बढ़ने के न पीछे जाने के। ये बीमारी केवल खासकर मध्यमवर्गीय युवाओं के साथ ज्यादा फिट बैठती है। बाकी सेठ-साहूकारों की मुझे नहीं मालूम।

लेखक माणिक राजस्‍थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्‍यापक हैं. 'अपनी माटी' वेब पत्रिका के पूर्व संपादक हैं. साथ ही आकाशवाणी चित्‍तौड़ के एमएम चैनल मीरा के लिए पिछले पांच सालों से उद्घोषक के रूप में सेवा रहे हैं. सालों से स्पिक मैके नामक सांस्‍कृतिक आंदोलन से भी जुड़े़ हुए हैं. उनकी कविताएं उनके ब्‍लॉग माणिकनामा पर पढ़ी जा सकती हैं.

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