आलोक तोमर को इस दुनिया से विदा हुए पूरा एक वर्ष बीत गया. बीते वर्ष ठीक होली के रोज कैंसर ने उन्हें हरा दिया था और कभी किसी से हार नहीं मानने वाले सरस्वती के इस जांबाज सिपाही को काल की क्रूर नियति ने छलपूर्वक पराजित कर दिया था. हालांकि आलोक तोमर के नहीं होने के बाद भी सूरज वैसे ही निकला जैसे पूर्ववत निकलता था. सांझ भी वैसे ही ढली. टीवी पर खबरें भी वैसे ही आयीं और अखबार के पन्ने भी पहले की तरह ही काले और रंगीन होकर पाठकों के पास पहुंचे. तब क्या बीते वर्ष में किसी को इस बेबाक पत्रकार की कमी नहीं अखरी?
नहीं, यह सच नहीं है. मैं इस सवाल के जवाब में उनके बूढ़े माता-पिता या फिर एकदम अकेलेपन के बोझ तले दब गयीं उनकी पत्नी या इकलौती बेटी के सामने उत्पन्न हुई भयावह रिक्तिता की बात नहीं कर रहा क्योंकि इसे भावनात्मक कहा जा सकता है. मै जिक्र कर रहा हूँ देश भर में फैले उन पाठकों का जो आलोक तोमर की बेबाक टिप्पणियों को पढने के लिए बेचैन रहते थे.
बीता एक वर्ष प्रेस और मीडिया के लिए बहुत घटना प्रधान रहा. कोमन वेल्थ घोटाले से लेकर रामदेव का आन्दोलन और अन्ना हजारे की बूम और फिर इन दोनों के पतन, भाजपा का बाबूलाल कुशवाहा प्रेम और बे-आबरू होकर मध्यप्रदेश से निकाली गयी साध्वी उमा भारती पर देश के सबसे बड़े प्रान्त उत्तर प्रदेश में अपने को दांव पर लगाती देश की दूसरी बड़ी पार्टी, जैसे मीडिया के लिए बहुत मसालेदार घटनाक्रम घटे हैं. जाहिर है कि इन सभी और इन जैसे अनेकानेक घटनाक्रम जब लोगों के यहाँ तक पहुंचे तब अनेक संपादकों को भी आलोक तोमर याद आये और पाठको को उनकी याद सताई. बड़ी संख्या में आह के साथ ऐसे जुमले उछले- अरे इस पर तो आलोक तोमर की टिप्पणी आती तो मजा आता.
स्वर्गीय तोमर का सूत्र संकलन, उनके अध्ययन और विश्लेषण का एकदम अलग नजरिया था और वह पाठकों के दिल और दिमाग पर सीधे वार करता था. यही वजह था कि उनका पाठक बगैर उनकी टिप्पणी पढ़े, संतुष्ट हो ही नहीं सकता. वे छिद्रान्वेषी नहीं थे लेकिन उनकी खोजबीन का तरीका बहुत विषद और गहन था. तोमर की भाषा पर जो पकड़ थी और प्रस्तुति का जो शिल्प था, वह इतना आम था कि अपने आप में खास बन जाता था. वे इस बात पर सबसे अधिक ध्यान देते थे. मुझे एक संस्मरण याद है. मैंने स्व तोमर के कहने पर दिल्ली की एक क्राईम मैग्जीन के लिए मान सिंह गिरोह के अंतिम सदस्य लुक्का उर्फ़ लोकमन दीक्षित पर एक सीरिज लिखी. उसे लेकर दिल्ली पहुंचा. उन्होंने मुझे उस मैगजीन के संपादक के पास ही बुला लिया.
मुझे नहीं पता कि मेरे पहुँचने के पहले वहां क्या बात चल रही थी. लेकिन मेरी स्क्रिप्ट उन्हें पढने को दी. संपादक जी ने उसे पढ़ा और बोले आलोक जी, बहुत अच्छा लिखा है. वे मुस्कराए और मेरी तरफ मुस्कराकर बोले – समझे, खबर नहीं अदा बिकती है और तुम्हारे पास अदा है. उन्होंने जब संपादक को बताया कि यह सीरिज देव ने लिखी है तो वे बड़ी मुश्किल से तब माने जब मुझसे एक बॉक्स लिखवाकर देखा. मुझे जो अदा मिली वह आलोक तोमर के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन का ही परिणाम है. मैं इसके लिए जतन करता था लेकिन आलोक जी की तो अदाकारी आशु थी. उन पर सरस्वती कि इतनी कृपा थी कि उन्हें न तो रेफरेंस खोजने की जरूरत होती थी और न ही कुछ सोचने की… उन्होंने एक बार कलम उठा ली तो फिर वे दुनिया के किसी भी विषय पर पूरे अधिकार और तथ्यों के साथ लिखते थे. जब देश में किसी ने राडिया का नाम भी नहीं सुना था तब उन्होंने लिखा था- मैं बताता हूँ ये नीरा राडिया कौन हैं ?…इसके बाद तलाश शुरू हुई और बड़ा स्कैंडल उजागर हुआ.
अपने बेबाकपन के चलते स्व. तोमर बाजारू पत्रकारिता के अंग नहीं बने और समझौता न करने की उनके ठेठ चम्बली अंदाज के चलते वे तमाम लोगों की आँखों की किरकिरी रहे. उनकी कृपा से पत्रकारिता की डगर पकड़ने वाले तमाम लोग आज भारत के उदीयमान नक्षत्र बने हुए हैं. आलोक तोमर खजानों की पहरेदारी करने वाले चौकीदार नहीं बनना चाहते थे वल्कि वे शब्दों के पहरुए थे और इसीलिए वे अपने पाठकों को देश में होने वाली हर हलचल के समय याद आते हैं और आते रहेंगे.
लेखक देव श्रीमाली ग्वालियर के वरिष्ठ पत्रकार हैं.





