दीपावली से पूर्व टीवी चैनलों-अखबारों ने जमकर जागरूकता अभियान चलाया कि हम पटाखे न छोड़ें. स्कूलों-कॉलेजों में बच्चों को संकल्प दिलाया गया कि वे पटाखे नहीं छोड़ेंगे. और तो और, हरियाणा में पटाखामुक्त दीपावली के लिये महायज्ञ भी किया गया जिसकी यजमानी गिनीज बुक रिकार्डधारी डॉ. अशोक गर्ग ने की लेकिन हुआ वही जिसकी आशंका थी. इन सबके बावजूद देश की राजधानी में लोगों ने दीपावली पर जमकर पटाखे छोड़े. दीपावली के बाद केन्द्रीय व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जो आंकड़े जारी किये उसके अनुसार कुछ राज्य के शहरों में प्रदूषण में कमी आई लेकिन काफी शहरों में पिछले साल की अपेक्षा प्रदूषण बढ़ा ही है.
देश के सात महानगरों के 35 स्थानों पर वायु एवं ध्वनि प्रदूषण मापने के यंत्र लगाने वाले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार पिछले पांच साल के मुकाबले इस बार दीपावली पर वायु प्रदूषण कम जरूर रहा लेकिन इसके उलट देश की राजधानी दिल्ली में इस बार ध्वनि प्रदूषण पिछले साल के मुकाबले बहुत अधिक हुआ. दिल्ली में पिछली दीपावली के मुकाबले इस बार दीवापली पर प्रदूषण आरएसपीएम (रेस्पिरेबल सब्सटैंशियल पार्टीकुलेट मैटर) 748 और 951 के मुकाबले 796 और 1138 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर हो गया. वहीं राज्य की राजधानी लखनऊ में 2:3 (दो जगह बढ़ा और तीन जगह घटा) का अनुपात रहा.
खैर, ये तो हो गई आंकड़ों की बात. अब देखते हैं कि तमाम जागरूकता के बावजूद आखिर प्रदूषण कम ना हो पाने की वजहें क्या हैं? बात सबसे पहले दुर्गा पूजा और दशहरे की करते हैं. पिछले दिनों जब नवरात्र की शुरुआत हुई तभी एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुये इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पवित्र नदियों में (गंगा-यमुना इससे अधिक प्रभावित हैं) मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगा दी. हाइकोर्ट के इस आदेश से हड़कम्प मचना एकदम तय था और जमकर मचा भी. संतों-शंकराचार्यों की फौरन मीटिंग हुई, फैसले की भर्त्सना हुई और यहां तक कहा गया कि हाईकोर्ट को ऐसा आदेश देने से पहले संतों से सलाह लेनी चाहिये. सरकार भी फजीहत से बचना चाहती थी इसलिये विशेष अपील की. मामले की गंभीरता को देखते हुये छुट्टी के दिन भी जजों की विशेष बैठी और इस साल नदियों में मूर्ति विसर्जन की छूट दे दी गई. फिलहाल कोर्ट के आदेश के मद्देनजर जिला प्रशासन ने मूर्तियों को कहीं और विसर्जित कराने की पूरी तैयारी कर ली थी. आश्चर्यजनक बात यह भी रही कि नवरात्र की समाप्ति के बाद दशमी के दिन गंगा-यमुना में मूर्ति विसर्जित करने की छूट मिलने के बावजूद बड़े पैमाने पर तालाबों-पोखरों में मूर्तियों को विर्सजित किया गया.
अब बात करते हैं दशहरे पर रावण के पुतला दहन की और यहीं से शुरू हो जाता है पटाखा फोड़ना भी, जो राम की जीत के बाद उनके अयोध्या लौटने की खुशी के बतौर मनाये जाने वाले त्योहार दीपावली तक चलता रहता है. इसमें पुतला दहन प्रदूषण का उतना बड़ा कारक नहीं है लेकिन पटाखों से सबसे अधिक प्रदूषण फैलता है. इससे वायु के साथ ही ध्वनि प्रदूषण भी बहुत तीव्र मात्रा में फैलता है जिसका असर करीब तीन-छह माह तक रहता है. चिंता की बात यह है कि हाईकोर्ट ने अब तक स्वतः संज्ञान लेते हुये इस पर पूरी तरह प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया या फिर अभी तक इसको लेकर किसी ने पीआईएल क्यों नहीं दाखिल की. कुछ लोग तर्क देते हैं यह आस्था का विषय है. चलिये, मान लिया लेकिन वे मथुरा के उस ब्राह्मण बहुल गांव के बारे में क्या कहेंगे जहां रावण का पुतला दहन नहीं होता और न ही राम की जीत की खुशी में पटाखे ही फोड़े जाते हैं. कृष्णनगरी स्थित इस गांव के सारस्वत ब्राह्मणों का मानना है कि वे रावण के वंशज हैं और उनकी पूजा करते हैं. फिलहाल, यहां बात वंशजों की नहीं बल्कि पुतला दहन व पटाखे फोड़ने की है. 2003 में यहां के एडवोकेट ओमवीर सारस्वत ने रावण दहन का सर्वप्रथम विरोध किया. विरोध शुरू करने वाले एडवोकेट ओमवीर सारस्वत का मानना है कि आज नहीं तो कल, रावण के पुतले का दहन व राम की जीत के जश्न का यह सिलसिला बंद हो जाएगा. वह कहते हैं कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था. पुराणों में उल्लेख है कि सेतु बंध की स्थापना के समय भगवान श्रीराम ने रावण से लंका पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से पूजन कराया था. राम ने उसे अपना पुरोहित माना था. लंका पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद भी लिया था. वह प्रकांड विद्वान भी था. इसके बावजूद समाज में विषमताओं के कारण रावण का पुतला दहन कर भगवान राम की मर्यादा का उल्लंघन हर साल किया जाता है. और फिर इस लिहाज से राम की जीत का जश्न पटाखा फोड़कर मनाना कहां तक उचित है? आज कलियुगी रावणों के कारण वेस्टर्न यूपी सांप्रदायिक प्रदूषण से ग्रस्त हो गया है लेकिन उसी जगह ऐसे सैकड़ों गांव हैं जहां ना पुतला दहन होता है और ना वातावरण प्रदूषित करने के लिये पटाखे फोड़े जाते हैं. मेरठ के शामली थाना क्षेत्र कैराना के गांव एरटी (आबादी तीन हजार से अधिक) के लोगों को राम की जीत का जश्न मनाना कतई पसंद नहीं है. अगर देखें तो जिसे हम परंपरा मानते हैं, वह सब हमारे हिन्दू धर्म में है नहीं. बतौर उदाहरण हिंदू धर्म में लकड़ी को जलाना पाप माना गया है लेकिन इसके बावजूद होली पर जितनी लकड़ियां जल जाती हैं और इससे जितना प्रदूषण फैलता है, उस बारे में कोई कभी भी नहीं सोचता. इको फ्रेंडली होली मनाने के लिये भी कई सालों द्वारा तमाम जागरूकता अभियान जलाया जाता है लेकिन आज भी होलिका पर हजारों-लाखों टन लकड़ियां वैसे ही जलती हैं, जैसे पहले जलती थीं.
सवाल फिर उठता है तो फिर क्या ऐसे ही वातावरण प्रदूषित होता रहेगा? धर्म और आस्था के नाम पर प्रदूषण फैलाने वाले तमाम कारकों पर क्या कभी रोक नहीं लग पायेगी? जागरूकता के बावजूद जब लोगों पर उतना असर नहीं पड़ रहा है जितना कि पड़ना चाहिये तो आखिर ऐसा कौन सा उपाय है जो कारगर साबित होगा? क्या हम एकदम तभी चेतेंगे जब कोई ऐसी आपदा या त्रासदी आ जाये जो हमारे पूरे अस्तित्व को ही खत्म करने की कोशिश करे? क्या हम तभी समझेंगे, जब पानी हमारे सर से ऊपर गुजर जायेगा? क्या हम तब उपाय करेंगे जब हमारे देश का हर व्यक्ति प्रदूषित वायु से बचने के लिये अपने मुंह पर मास्क लगाकर चलेगा? इन सारे सवालों का एक ही जवाब है – नहीं. कहते हैं कि शिक्षक भी बच्चे को अच्छा नागरिक बनाने के लिये डंडे का प्रयोग करता है. तो फिर उस वातावरण को बचाने के लिये क्यों डंडे का जोर नहीं आजमाना चाहिये जो हमारे-आपके और सबके जीवन के लिये सबसे अधिक आवश्यक है. इसके लिये पहल तो सर्वप्रथम न्यायपालिका को ही करनी पडे़गी और वो भी एकदम सख्त. सरकारें तो अपने वोट बैंक के लिये जनता और आस्था-धर्म का मुंह टापती हैं. उसे सिर्फ न्यायपालिका ही मजबूर कर सकती है. अगर ऐसा हो गया तो कोई एक भी न तो पटाखा जला सकता है और ना ही पुतला दहन व लकड़ी जला सकता है.
लेखक रवि प्रकाश मौर्य से संपर्क 09026253336 के जरिये किया जा सकता है.