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पुराने लोगों को क्‍यों दरकिनार किया जा रहा है अमर उजाला, लखनऊ में?

‘अमर उजाला’ लखनऊ में बीते तीन वर्षों से बेइज्जती व उत्पीड़न का दंश झेल रहे लोगों ने अपने अलग रास्ते चुनने शुरू कर दिये हैं। सम्पादक डा. इन्दू शेखर पंचोली ने संस्थान के निष्ठावान व पुराने लोगों को या तो बाहर का रास्ता दिखाया या उन्हें किनारे कर दिया और नये लोगों को उनसे डेढ़ गुना वेतन पर लाकर उन्हें स्थापित करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन जिन लोगों पर उन्होंने ऐतबार जताया उन्होंने भी मौके का फायदा उठाने के बाद उन्हें ठेंगा दिखाया और दूसरी जगहों पर मौका मिलते ही चले गये।

‘अमर उजाला’ लखनऊ में बीते तीन वर्षों से बेइज्जती व उत्पीड़न का दंश झेल रहे लोगों ने अपने अलग रास्ते चुनने शुरू कर दिये हैं। सम्पादक डा. इन्दू शेखर पंचोली ने संस्थान के निष्ठावान व पुराने लोगों को या तो बाहर का रास्ता दिखाया या उन्हें किनारे कर दिया और नये लोगों को उनसे डेढ़ गुना वेतन पर लाकर उन्हें स्थापित करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन जिन लोगों पर उन्होंने ऐतबार जताया उन्होंने भी मौके का फायदा उठाने के बाद उन्हें ठेंगा दिखाया और दूसरी जगहों पर मौका मिलते ही चले गये।

फिर भी प्रबंधन की आंखें खुली नहीं हैं और पुराने लोगों को दरकिनार किया जा रहा है, उन्‍हें न तो प्रमोशन दिया जा रहा है और न ही महत्व। बल्कि कम अनुभवी लोगों को आगे करके कम्पनी के पुराने व निष्ठावान लोगों को नजरंदाज करना प्रबंधन के शगल में शामिल हो गया है। ‘अमर उजाला’ लखनऊ के लोग बेइज्‍जत किए गए, ऑफिस के बाहर भगाए गए। इसमें कई लोग बेहोश हुए, बीमार हुए और कुछ दुर्घटना ग्रस्‍त भी हुए, लेकिन लोगों की आवाजें नक्कारखाने की तूती की तरह दबी रह गईं। ऊपर वालों ने कोई सुनवाई नहीं की और लोग परिवार की मजबूरी में सब कुछ सहकर भी नौकरी करते रहे क्योंकि उनके आगे कोई रास्ता नहीं था। लेकिन अब जैसे ही रास्ता खुला लोग भागने को तैयार हो गए।

पहले जो लोग पुराने व निष्ठावान लोग थे उन्हें या तो कम्पनी से निकाल दिया गया या उन्हें किनारे करके उनसे डेढ़ गुना वेतन पर नए लोगों को रखा गया। ताकि वह स्वयं ही कम्पनी छोड़कर चल जाएं। लेकिन परिवार की मजबूरी उन्हें इस बेइज्जती को बर्दाश्त कर नौकरी करने पर विवश करती रही। पंचोली के खास रहे अजीत खरे को काफी प्रमोशन व आगे बढ़ाने का हर संभव प्रयास किया गया, उन्हें रिपोर्टर से सीधे प्रमुख संवाददाता बनाया गया। ये ‘अमर उजाला’ के इतिहास में पहली बार हुआ। अजीत खरे मौका पाते ही ‘हिन्दुस्तान’ चले गए।

इसके बाद सौरभ श्रीवास्तव, मनीष श्रीवास्तव, रमन शुक्ला, संकेत मिश्रा सरीखे लोगों को प्रमोशन से लेकर खबरों में आगे बढ़ाने का हर संभव प्रयास किया गया, लेकिन यह सभी लोग संस्थान को ‘बाय’ कहकर दूसरे अखबारों में चले गए। जबकि पुराने लोगों को जिन्हें किनारे किया गया वह अब भी संस्थान में पूरी ईमानदारी व निष्ठा से काम कर रहे हैं। इसके अलावा महेंद्र तिवारी, आरिफ, फोटोग्राफर इमरान व अन्य लोगों को अधिक पैसा देकर लाया गया और उन्हें काफी आगे बढ़ाया जा रहा है। जिन नए लोगों की भर्ती हुई है वह कम अनुभवी हैं और उन्हें पैसा अधिक दिया जा रहा है। जबकि पुराने व निष्ठावान लोग कम पैसों पर भी अभी तक कम्पनी में काम कर रहे हैं। यदि समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो जल्द ही कम्पनी को बड़ा नुकसान झेलना होगा।

कम्पनी में डेस्क पर नए लोगों को इंचार्ज बनाकर सीनियर को उनके अधीन करके उन्हें इसलिए बेइज्जत किया जा रहा है ताकि वह स्वयं काम छोड़कर चले जाएं। लेकिन लोग मौके की तलाश में जैसे ही और लोगों को भी अपना ठिकाना मिलेगा वह संस्थान को बाय कहकर नए ठिकाने पर सुकून से नौकरी करेंगे। लखनऊ ब्यूरो, लोकल डेस्क व जिला ब्यूरो हर कोई संपादक के उत्पीड़न से परेशान है। लेकिन इन सभी की कोई सुनने वाला नहीं है। कम्पनी के वरिष्ठ अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रहा है। वे लोग कान में तेल डालकर बैठे हैं लिहाजार किसी कर्मचारी की आवाज उन्‍हें सुनाई नहीं पड़ रही है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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