वरिष्ठ पत्रकार, उपन्यासकार-कहानीकार दयानंद पांडेय किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. बेबाकी से लिखना-बोलना ही इनकी पहचान रही है. इस दौर में जब लोग गलत देखते हुए ही भी सही नहीं लिखते हैं उस दौर में भी दयानंद पांडेय अपनी बेबाक कलम की धार से कत्लेआम करते रहते हैं. पिछले तीन दशक से पत्रकारिता और लेखन में सक्रिय दयानंद पांडेय कई उपन्यास लिख चुके हैं. पर इस बार उनके लिए बहुत ही खुशी का मौका है. इस बार उनकी पांच किताबें एक साथ प्रकाशित हो रही हैं, जिसे आप प्रगति मैदान में आयोजित होने वाले पुस्तक मेले में खरीद सकते हैं.
दयानंद पांडेय अपने ब्लॉग पर खुद के बारे में कुछ इस तरह लिखते हैं – ''कहानी या उपन्यास लिखना मेरे लिए सिर्फ़ लिखना नहीं, एक प्रतिबद्धता है। प्रतिबद्धता है पीड़ा को स्वर देने की। चाहे वह खुद की पीड़ा हो, किसी अन्य की पीड़ा हो या समूचे समाज की पीड़ा। यह पीड़ा कई बार हदें लांघती है तो मेरे लिखने में भी इसकी झलक, झलका (छाला) बन कर फूटती है। और इस झलके के फूटने की चीख़ चीत्कार में टूटती है। और मैं लिखता रहता हूं।'' शायद यही कारण है कि इस उनकी लिखी पांच किताबें लोग एक साथ पढ़ सकेंगे. नीचे उनके द्वारा संदर्भ में अपने ब्लॉग पर लिखी गई सूचना :
१-यादों का मधुबन [संस्मरण]
२-मीडिया तो अब काले धन की गोद में [लेखों का संग्रह]
३-एक जनांदोलन के गर्भपात की त्रासदी [राजनीतिक लेखों का संग्रह]
४-कही-अनकही [ सिनेमा, साहित्य संगीत और कला क्षेत्र के लोगों के इंटरव्यू]
५- ११ प्रतिनिधि कहानियां
यह सभी किताबें जनवाणी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में हा्ल नंबर १२ के स्टाल नंबर २५ और २६ पर आप को यह किताबें मिल सकती हैं :
यादों की नदी ऐसी नदी है जो कभी साथ नहीं छोड़ती। हमेशा कल-कल, छल-छल बहती रहती है। किसी घर की याद हो, व्यक्ति की याद हो या किसी हस्ती की मन से नहीं जाती तो नहीं जाती। और जो नहीं आती तो फिर नहीं आती। बतर्ज़ खुमार बाराबंकवी, 'जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं वही आज फिर याद आने लगे हैं। लेकिन खुमार ही यह भी कहते हैं कि, 'सुना है वो हम को भुलाने लगे हैंतो क्या हम उन्हें फिर याद आने लगे हैं।
यादों की भूलभुलैया असल में ऐसी ही होती है और गाना ही पड़ता है कि जिन्हें हम भूलना चाहें वो अकसर याद आते हैं। इस की तासीर भी खूब है अब जैसे कि मेरे बचपन का वह घर जहां हम पले-बढ़े, पढ़े-लिखे और जवान हुए, किराए का घर था। लेकिन बड़ा सा और खूब खुला हुआ था। बेला, चमेली, रातरानी, गुड़हल, कनइल, हरसिंगार, गुल मोहर और चंपा जैसे फूल, करौंदा, अमरूद, शहतूत और शरीफा जैसे फल, कुंआं, मंदिर और नीम के पेड़ जैसे हाते वाला वह घर भुलाए नहीं भूलता। जितना बड़ा घर उसका दस गुना हाता। उस घर को छूटे साढ़े तीन दशक से अधिक हो गए हैं, वह घर भी गिर कर अब मैदान हो गया है पर क्या करें कि सपने में अब भी वही घर रह-रह कर लौटता रहता है। गोरखपुर के इलाहीबाग़ में जमींदार साहब का हाता वाला घर । गोरखपुर जाता हूं तो उस मैदान हो चुके घर को भी बड़े मोह से देखने जाता हूं। सारे पुराने दुख-सुख याद आ जाते हैं।
जीवन में कई घर और शहर बदले पर मन की यादों में वही घर बसा हुआ है, जाता ही नहीं। मिटता ही नहीं। जैसे प्यार आप चाहे जितने कर लें पर जैसे पहले प्यार की खुशबू नहीं जाती, ठीक वैसे ही वह घर, वह लोग नहीं जाते। वह पूरा का पूरा मुहल्ला अभी भी मन में टहलता मिलता है। इसे आप नास्टेलिजया भी कह सकते हैं। शायद जो कभी आत्म-कथा लिखूं तो उस में इस मुहल्ले की मन में बसी और कभी जियी हुई तसवीर उतरे। क्या होता है कि कई बार अप्रिय घटनाएं भी काफी समय बीत जाने के बाद लोग किसी सुख की तरह याद करते हैं। यादें एक धरोहर बन जाती हैं। सभी के जीवन में तरह-तरह के लोग मिलते हैं। असंख्य लोग। पर कुछ लोग और उन की याद मन की अलगनी पर टंगी रह जाती है। उतरती नहीं। यादों की खिड़की में कुछ लोग ऐसे झांकते हैं कि मन करता है कि उन्हें घर में बुला लें। यहां यादों के इस

दनपा
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. यह लेख पांडेय जी के ब्लॉग सरोकारनामा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.






