यशवंत की जेल जाने की इच्छा पूरी हो गई। शिमला के कण्डा जेल के प्रांगण में उन्होंने जेल जाने की इच्छा प्रकट की थी। इतनी जल्दी पूरी हो जाएगी, किसे पता था। 27 जून को शिमला के कण्डा जेल में एक समारोह में यशवंत ने मंच से कहा था, ‘‘मुझ पर मानहानि के 75 से ज्यादा मामले अदालत में विचाराधीन हैं। यदि कभी जेल हुई तो कण्डा जेल में रहना चाहूंगा।’’ इस समारोह में उपस्थित भीड़ उनकी इस इच्छा पर हंस दी थी। भीड़ में डीजीपी (जेल) आई.डी. भण्डारी भी शामिल थे। वे इस समारोह में मुख्य अतिथि थे और यशवंत मुख्य वक्ता।
समारोह में शिमला और अन्य प्रदेशों के कई वरिष्ठ पत्रकार उपस्थित थे। कण्डा जेल के करीब पांच सौ कैदियों ने भी यशवंत की जेल जाने की इच्छा पर खूब ठहाके लगाए। दो दिन से काफी व्यस्त था, इसलिए भड़ास नहीं देख पाया। मंगलवार की सुबह भड़ास देखी तो चौंका। खबर चौंकाने वाली थी, क्योंकि यशवंत ‘अंदर’ हो गए थे। उनके अंदर होने की खबरों-प्रतिक्रियाओं से भड़ास भरा पड़ा था। सब कुछ जल्दी-जल्दी पढ़ लिया गया। फिर जगमोहन फुटेला का ‘जर्नलिस्ट कम्युनिटी’ पढ़ा। यशवंत के अंदर होने पर जगहमोहन फुटेला की ‘भड़ास’ भी पढ़ी। इस अवसर पर फुटेला की ‘दण्डपेल’ पसन्द नहीं आई। फुटेला मेरे पुराने मित्र हैं। उन्हें अच्छा व्यक्ति मानता हूं। संवेदनशील पत्रकार हैं। अच्छा बोलते हैं, अच्छा लिखते भी हैं, लेकिन आज अच्छा सोच क्यों नहीं पा रहे हैं।
यशवंत विवादास्पद हो सकते हैं। जीवित रहते विवादों से परे रह भी कौन सकता है। यशवंत की भड़ास से भी मतभेद रख सकते हैं। भड़ास के पत्रकारीय अंदाज से मैं भी सौ फीसदी सहमत नहीं हूँ, लेकिन यह कल के लिए छोड़ा जा सकता है। आज सामने यशवंत है, जिसने ‘दबे-कुचले’ पत्रकारों के लिए कई लड़ाइयां लड़ी हैं- जिसने बड़े-बड़ों से पंगे ले रखे हैं। यशवंत आम आदमी है और आम आदमियों के लिए खा-पीकर पंगा ले लेता है। लेकिन जो गंभीर आरोप लगाए गए हैं, वे सुनियोजित लग रहे हैं। यशवंत पीपाकर गाली दे सकता है, हड़का भी सकता है, किन्तु जो आरोप लगाए गए हैं वे हजम नहीं हो रहे हैं। ऐसे में यशवंत का साथ न देने का कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता।
लेखक कृष्णभानु शिमला में वरिष्ठ पत्रकार हैं। राष्ट्रीय सहारा, भास्कर और अमर उजाला समेत कई संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। इन दिनों ‘हिमाचल आजकल’ न्यूज चैनल में प्रधान संपादक पद पर कार्यरत हैं।
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