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पेंगुइन वालों ने जिस किताब को प्रतिबंधित किया, उसे भड़ास पर पढ़ें या डाउनलोड करें

पेंगुइन वालों ने वेंडी डॉनिगर की जिस किताब ‘द हिंदूज : एन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को भारत में एकतरफा तौर पर प्रतिबंधित करने और इसकी सारी प्रतियां मंगाकर नष्ट करने का ऐलान किया है, उससे देश के बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों का एक बड़ा हिस्सा नाराज है. यहां तक कि इस किताब के विरोधी भी कहते हैं कि लिखे-पढ़े का मुकाबला लिख-पढ़ कर किया जाना चाहिए न कि पाबंदी लगाकर. इसी को ध्यान में रखते हुए भड़ास की तरफ से किताब को आनलाइन उपलब्ध कराया जा रहा है.

पेंगुइन वालों ने वेंडी डॉनिगर की जिस किताब ‘द हिंदूज : एन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को भारत में एकतरफा तौर पर प्रतिबंधित करने और इसकी सारी प्रतियां मंगाकर नष्ट करने का ऐलान किया है, उससे देश के बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों का एक बड़ा हिस्सा नाराज है. यहां तक कि इस किताब के विरोधी भी कहते हैं कि लिखे-पढ़े का मुकाबला लिख-पढ़ कर किया जाना चाहिए न कि पाबंदी लगाकर. इसी को ध्यान में रखते हुए भड़ास की तरफ से किताब को आनलाइन उपलब्ध कराया जा रहा है.


किताब को डाउनलोड करने का तरीका

  • नीचे दिए गए किताब के कवर पेज के चित्र पर कर्सर ले जाएं और माउस को राइट क्लिक करें. तब Save Link As के दिख रहे आप्शन पर क्लिक कर दें. इसके बाद किताब खद ब खुद पीडीएफ फार्मेट में आपके कंप्यूटर या लैपटाप या मोबाइल में सुरक्षित हो जाएगी, जिसे आप जब चाहें खोलकर पढ़ सकते हैं.
  • अगर आप किताब को सिर्फ पढ़ना चाहते हैं, अपने पास सेव नहीं करना चाहते तो नीचे दिए गए किताब के कवर पेज के उपर ही क्लिक कर दें. इसके बाद पूरी किताब नए विंडो में खुल जाएगी, जिसे आप पढ़ सकते हैं.


ज्ञात हो कि दिल्ली की एक संस्था ‘शिक्षा बचाओ समिति’ ने वेंडी डॉनिगर की किताब के खिलाफ मुकदमा कर रखा है. कोर्ट ने अभी कोई फैसला नहीं दिया लेकिन ‘पेंगुइन’ अपने आप ही पुस्तक को प्रतिबंधित कर सारी प्रतियां मंगाने का फैसला कर लिया. वेंडी डॉनिगर की इस पुस्तक से कट्टर हिंदू नाराज थे. वैसे ही जैसे सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन की किताबों पर कट्टर मुस्लिम नाराज रहते हैं. ईसाई धर्म संबंधी अनेक पुस्तकों पर यूरोप और अमेरिका में काफी बवाल मच चुका है. वेंडी डॉगिनर का कहना है कि उन्होंने हिंदुओं के इतिहास वाली पुस्तक अमेरिकी पाठकों के लिए तैयार की थी.

किताब को लेकर वरिष्ठ पत्रकार डा. वेद प्रताप वैदिक का कहना है कि मैं पुस्तकों पर प्रतिबंध का समर्थक नहीं हूं. प्रतिबंध की मांग तो ऐसी पुस्तकों को हजारों नए पाठक दे देती है. जरूरी यह है कि ऐसी पुस्तकों के जवाब में तर्कपूर्ण और तथ्यपूर्ण सशक्त ग्रंथ लिखे जाएं. हम पाठकों को स्वयं निर्णय क्यों नहीं करने देते कि सही कौन है? आपत्तिजनक किताबों को कानून या हुड़दंग से काटने की बजाय जवाबी किताबों से क्यों न काटा जाए.

उधर, जाने-माने साहित्यकार विष्णु खरे का कहना है कि यहूदी मूल की, लगभग 74-वर्षीया, वेंडी डॉनिगर, जो विश्वविख्यात भारतविद् हैं, की हाल की पुस्तक, 'द हिंदूज़ : एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री' ( 'हिन्दूजन : एक वैकल्पिक इतिहास'), हुज्जत की हदें तोड़ती हुई हिन्दुस्तानी अदालती बाड़े में पहुँच गई. मुद्दआ जाना-पहचाना था– 'यह किताब अश्लील है और हिन्दू धर्म तथा कुछ वंदनीय हिन्दुओं का अपमान करती है'. इससे पहले कि मुआमला और तूल पकड़े, मुददआअलैह प्रकाशन-गृह ने आत्म-समर्पण करने में ही बेहतरी समझी और पूरे भारत से किताब को नेस्तनाबूद कर देने के करारदाद पर दस्तख़त कर दिए. संसार के पुस्तक प्रकाशन इतिहास में शायद ही किसी आधुनिक, जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष देश में मुक़द्दमा हारने से पहले ही किसी प्रकाशक ने अपनी किताब के साथ ऐसा क़ातिलाना सुलूक किया हो.


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