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पेड न्यूज से भी एक कदम आगे बढ़ गया दैनिक भास्कर

दैनिक भास्कर ने मंगलवार 16 जुलाई 2013 को कांग्रेस की प्रदेश सरकार के साथ मिलकर जो किया, इसे आप चाहे तो नया नाम दे सकते हैं परंतु इतना तय है कि यह पत्रकारिता नहीं है। यह पेड न्यूज का अगला कदम जरूर कहा जा सकता है जिसने, ‘भविष्य की पत्रकारिता की दिशा और दशा’ तय कर दी है।

दैनिक भास्कर ने मंगलवार 16 जुलाई 2013 को कांग्रेस की प्रदेश सरकार के साथ मिलकर जो किया, इसे आप चाहे तो नया नाम दे सकते हैं परंतु इतना तय है कि यह पत्रकारिता नहीं है। यह पेड न्यूज का अगला कदम जरूर कहा जा सकता है जिसने, ‘भविष्य की पत्रकारिता की दिशा और दशा’ तय कर दी है।

भास्कर ने राजस्थान की कांग्रेस सरकार की 44 पृष्ठों की एक बहुरंगी पत्रिका,‘राजस्थान सरकार की फलैगशिप योजनाएं एवं अन्य विशेष कार्यक्रम’ अपने अखबार के साथ बांट दी। पत्रिका के मुखपृष्ठ पर साफ लिखा गया, ‘दैनिक भास्कर के पाठकों के लिए निशुल्क।’ सोमवार 15 जुलाई 2013 को ही दैनिक भास्कर के प्रथम पृष्ठ पर इसकी सूचना देते हुए कहा गया था, अपनी प्रति लेना नहीं भूलें। 16 जुलाई को भी प्रथम पृष्ठ पर फिर उसी जैसी सूचना, आज के अंक के साथ निशुल्क प्रति।

राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से प्रकाशित इस पत्रिका में सिवाय कांग्रेस सरकार की उपलब्धियों के और कुछ ना तो होना था, ना है। पत्रिका सरकार की है लिहाजा लगभग हर दूसरे-तीसरे पृष्ठ पर मुख्यमंत्री गहलोत को नजर आना था और वे आ भी रहे हैं। ज्यादातर फोटोग्राफस में जिस विभाग की योजनाएं हैं उनके मंत्री तक नदारद हैं। केंद्र सरकार में सचिन पायलट, जितेंद्र सिंह, लालचंद कटारिया, आनंद शर्मा, गिरिजा व्यास, चंद्रेश कुमारी, नमोनारायण मीणा जैसे मंत्री, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महामंत्री सीपी जोशी, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा भी गायब। सिर्फ गहलोत ही गहलोत। करीब डेढ दर्जन योजनाओं के साथ विकास के कुछ मामलों में पिछली सरकार से तुलनाएं भी की गई हैं।

एक समय था जब सरकारें अपनी बात या तो प्रेस नोट या विज्ञापनों के जरिए कहती थी। पत्रकारिता के दौरान अपन ने कई बार ऐसे अवसर देखें हैं जब पत्रकारों ने प्रेस नोट यह कहते हुए रोक दिए हैं कि अखबार है कोई सरकार का मुख पत्र नहीं। और ऐसा उन पत्रकारों को करते देखा जो उस राजनीतिक दल के कट्टर हिमायती होते थे जिसकी सरकार होती थी। उन्होंने अपने मित्र राजनेताओं की खबरें उन्हें यह कहकर रोकीं कि यह तो विज्ञापन हो जाएगा। विज्ञापन और खबर के बीच की स्पष्ट लकीर ना केवल वे जानते थे बल्कि अपने साथी पत्रकारों और राजनेताओं तक को सिखाया करते थे।

कुछेक ऐसे अवसर भी आए जब ग्रामीण इलाकों के संवाददाताओं ने किसी खास राजनेता की तारीफें या उसके मुहं से योजनाओं की शान में कसीदे गढ दिए गए और डेस्क ने भी भ्रम, भूल या जानबूझकर उसे छाप दिया तो अगले दिन संवाददाता, उप संपादक और डेस्क इंचार्ज तीनों से जवाब मांग लिया जाता था। अच्छी खासी झाड़ पिलाई जाती थी। पत्रकारिता में शुचिता, मूल्य और नैतिकता सचमुच थी और नजर भी आती थी। और यह अधिक नहीं दस-बारह साल पहले की बात थी।

विज्ञापनों के बाद, पैसे लेकर प्रायोजित परिशिष्ट छापने की परम्परा आई और उसके बाद पेड न्यूज का खुला खेल चला। परंतु अखबार के साथ सरकार की, सरकार द्वारा, सरकार के लिए छापी गई प्रचार पत्रिका निशुल्क बांटने का राजस्थान में तो कम से कम यह पहला उदाहरण है। अगर यह भास्कर का प्रकाशन होता तो एकबारगी माना जा सकता था परंतु इसमें तो स्पष्ट लिखा है, ‘सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, राजस्थान सरकार।’ एक दिलचस्प पहलू और सरकार और भास्कर दोनों ने इस पत्रिका के लिए कहा है, ‘परिवार के लिए उपयोगी पुस्तिका’, आम आदमी के परिवार के लिए यह कितनी उपयोगी है, पता नहीं, हां भास्कर परिवार के लिए यह जरूर आर्थिक रूप से उपयोगी साबित हुई होगी इतना तय है। डील कितने में हुई, यह अभी सामने नहीं आया है। कांग्रेस और सरकार से जुड़े लोगों के लिए भी किसी न किसी तौर पर उपयोगी होगी ही।

प्रतिद्वन्द्वी राजस्थान पत्रिका, दैनिक नवज्योति, टाइम्स आफ इंडिया इसका कैसे जवाब देंगे? भास्कर को भी और सरकार को भी! सरकार से तो खैर वह कुछ बीस ही वसूलेंगे!  अखबारों का अगला कदम देखने लायक होगा। पैसा कमाने की इस नई खोज के जरिए भास्कर ने बता दिया कि पेड न्यूज तो अब उसके लिए खेत की वह मूली है जो राह चलता कोई भी उखाड़ लेता है। बहरहाल मूल्यों से समझौतों, पेड न्यूज से अगले कदम की खोज और पत्रकारिता पर पूरी तरह हावी व्यवसायिकता के नए आयाम स्थापित करने आदि-आदि के लिए भास्कर को बधाई !   

राजस्थान से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट. संपर्क: 09549155160 और 09829270160

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