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प्रकाशन से पूर्व ही दम तोड़ गया ‘देशबन्धु’, विनायक विजेता ने दिया इस्‍तीफा

बीते अक्टूबर माह से ही पटना से प्रकाशित होने का दावा करने वाला हिन्दी दैनिक ‘देशबन्धु’ ने प्रकाशन के पहले ही दम तोड़ दिया। अब तो हालात ये हो गए हैं कि कई माह से यहां काम करने वाले दर्जनों पत्रकार और कर्मचारी वेतन न मिलने के कारण कार्यालय में रखे लगभग तीन दर्जन कम्प्यूटर और अन्य कीमती सामान उठा ले जाने की तैयारी में हैं। इस अखबार ने पूर्व में पूरे पटना सहित बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में पूरे तामझाम से अखबार के प्रकाशन का प्रचार व प्रसार किया।

बीते अक्टूबर माह से ही पटना से प्रकाशित होने का दावा करने वाला हिन्दी दैनिक ‘देशबन्धु’ ने प्रकाशन के पहले ही दम तोड़ दिया। अब तो हालात ये हो गए हैं कि कई माह से यहां काम करने वाले दर्जनों पत्रकार और कर्मचारी वेतन न मिलने के कारण कार्यालय में रखे लगभग तीन दर्जन कम्प्यूटर और अन्य कीमती सामान उठा ले जाने की तैयारी में हैं। इस अखबार ने पूर्व में पूरे पटना सहित बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में पूरे तामझाम से अखबार के प्रकाशन का प्रचार व प्रसार किया।

बीते मार्च महीने में हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर के पूर्व संपादक सुकान्त नागार्जुन ने संपादक और पटना हिन्दुस्तान के पूर्व वरीय संवाददाता विनायक विजेता ने विशेष संवादाता, दैनिक जागरण के पूर्व संवाददाता राजीव शर्मा सहित कुछ अन्य चर्चित पत्रकारों ने इस अखबार में ज्वाइन किया तो पटना से प्रकाशित होने वाले अन्य अखबारों के भी पसीने छूटने लगे थे। सूत्रों के अनुसार ज्वाइन करते समय संपादक सहित अन्य पत्रकारों को यह पता था कि अखबार को मध्य प्रदेश में रहने वाले उसके मूल मालिक ही प्रकाशित कर रहे हैं पर बाद में पता चला कि इस अखबार की फ्रेंन्चाइजी बिहार के एक पूर्व सांसद विजय कृष्ण के करीबी यशवंत सिंह नामक व्यक्ति ने ली है, जिनका इंडस प्रकाशन के नाम से एक कंपनी भी है और इसी प्रकाशन के बैनर तले ‘देशबन्धु’ का प्रकाशन होना था।

बीते 19 अप्रैल को अखबार के लांचिंग की तिथि भी तय की गई, जिसके लोकार्पण के बिहार के राज्यपाल डीवाई पाटिल ने समय भी दे दिया पर अर्थाभाव में अखबार का प्रकाशन नहीं हो सका। अखबार प्रबंधन की माली हालात और अखबार के प्रकाशन की दूर-दूर तक कोई संभावना न दिखता देख विनायक विजेता ने अपनी ज्वाइनिंग के पंद्रह दिनों के अंदर ही अखबार को बाय-बाय कह दिया। इसके कुछ दिन बाद से ही संपादक सुकान्त नागार्जुन ने भी कार्यालय जाना छोड़ दिया है, जबकि वेतन की आस में अन्य कर्मचारी अभी भी कार्यालय का चक्कर काट रहें हैं। इस संदर्भ में जब विनायक विजेता से उनके मोबाइल पर बात की गई तो उन्होंने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि ‘बिना कोई काम के सिर्फ हाजिरी बनाकर वेतन लेने या वेतन का दावा करने में मैं विश्वास नहीं रखता।’

सूत्रों के अनुसार इस अखबार ने पूरे तामझाम से पटना में दो जगह अपना कार्यालय खोला है। संपादकीय कार्यालय पटना के सीडीए बिल्डिंग के बगल में राजेन्द्र पथ तथ सर्कुलेशन और विज्ञापन कार्यालय किदवईपुरी में ईटीवी कार्यालय के बगल में खोला गया था। सूत्रों के अनुसार इन दोनों कार्यालयों का रेंट भी कई महीनों से नहीं दिया गया है, जिसके कारण किदवईपुरी स्थित कार्यालय पर उसके मकान मालिक ने टू-लेट का बोर्ड लगा दिया है। सूत्र बताते हैं कि फ्रेन्चाइजी की शर्तों पर अमल न होने से क्षुब्ध ‘देशबन्धु’ के मालिक ललित सुजान ने फ्रेन्जाइजी के हुए करार को भी रद्द कर दिया। इसके बाद अब ‘देशबन्धु’ सिर्फ पटना की सड़कों पर होर्डिंग के रुप में ही दिखने को बाध्य हो गया है।

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