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उत्तराखंड

प्रचार-प्रसार के माध्यम से अपने चहेतों पर धन लुटाने में लगी उत्तराखंड सरकार

देहरादून :  उत्तराखण्ड राज्य में आई देश की सबसे बडी त्रासदी का दुख पूरे देश को है। जिन्होंने अपनो को खो दिया है या जिन्होंने अपने बच्चों, अपने बुजुर्गों, अपने रिश्तेदारों को अपनी आंखों के सामने मलवे के नीचे दफन होते देखा है, उनका दुख तो वही लोग ही जानेंगे। जब सुनने वालों की रूह कांप जाती है और आंखों मे आंसू भर आते हैं तो उनका हाल सभी समझ सकते हैं। वैसे तो सरकार ने आपदा बचाव कार्य तो किए हैं लेकिन उसके उलट उनका प्रचार-प्रसार भी बहुत जोरों से समाचार पत्रों व टीवी चैनलों के माध्यम से किया लेकिन सरकार ने किसी भी विज्ञापन मे जो लोग मृत थे या जो लोग लापता थे, उनका ना ही कोई फोटो जारी किया, ना नाम-पते ही दिखाये। सिर्फ और सिर्फ अपनी बड़ाई के पुलिन्दे बांधे। कुछ इस तरह के प्रचार दिखाए जाते रहे- सरकार ने 16 हैलिकाप्टर लगा रखे हैं… सरकार ने इतने गांवों में राशन भिजवाया है। 
देहरादून :  उत्तराखण्ड राज्य में आई देश की सबसे बडी त्रासदी का दुख पूरे देश को है। जिन्होंने अपनो को खो दिया है या जिन्होंने अपने बच्चों, अपने बुजुर्गों, अपने रिश्तेदारों को अपनी आंखों के सामने मलवे के नीचे दफन होते देखा है, उनका दुख तो वही लोग ही जानेंगे। जब सुनने वालों की रूह कांप जाती है और आंखों मे आंसू भर आते हैं तो उनका हाल सभी समझ सकते हैं। वैसे तो सरकार ने आपदा बचाव कार्य तो किए हैं लेकिन उसके उलट उनका प्रचार-प्रसार भी बहुत जोरों से समाचार पत्रों व टीवी चैनलों के माध्यम से किया लेकिन सरकार ने किसी भी विज्ञापन मे जो लोग मृत थे या जो लोग लापता थे, उनका ना ही कोई फोटो जारी किया, ना नाम-पते ही दिखाये। सिर्फ और सिर्फ अपनी बड़ाई के पुलिन्दे बांधे। कुछ इस तरह के प्रचार दिखाए जाते रहे- सरकार ने 16 हैलिकाप्टर लगा रखे हैं… सरकार ने इतने गांवों में राशन भिजवाया है। 
उत्तराखड का सूचना एवं लोक संपर्क विभाग है। यह सरकार के द्वारा ''मुख्यमंत्री की डायरी'' जैसे विज्ञापन ऐसे चैनलों को बाट दिये जो दिखते ही नहीं हैं। कई ऐसे अखबारों को दिया जिन्हें कोई जानता ही नहीं है। सरकार तो सरकार, सूचना विभाग में अगर सही से आकलन किया जाये तो कितने धन का दुरूपयोग किया जाता है। उसका अंदाजा तो इसी बात से लगया जा सकता है कि अमित सहगल नाम के पत्रकार ने जब इस बाबत आरटीआई द्वारा सूचना एकत्र की तो जो आंकड़े सामने आए वो चौंकाने वाले थे कि किस प्रकार सूचना विभाग के अधिकारियों द्वारा हर साल सरकार को करोडो रुपये का चूना लगाया जाता है।
 
भ्रष्टाचार की इतनी हद हो चुकी है कि जो पत्रकारों को सुविधा सरकार की ओर से मुहैया कराई जाती है वो भी सिर्फ उन्हीं को जो सूचना विभाग के अधिकारियों के हमेशा इर्द गिर्द घूमते रहते हैं। हद तो तब हो जाती है जब सारे नियमों को ताक पर रख कर खेल खेले जाते हैं। राज्य मान्यता प्राप्त, जिला मान्यता प्राप्त ऐसे कुछ पत्रकार भी हैं जिनका पत्रकारिता से लेना देना ही नहीं है। ऐसे कई समाचार पत्र हैं जिनकी सिर्फ कापियां इतनी ही छपती हैं जो सरकारी कार्यालयों में दिखई देने भर के लिए हैं। जिनको ना आम आदमी पढता है और ना ही उन्हें सूचना विभाग या और ना ही कुछ विभागों के अलावा जाना जाता है। जिनको पिछले 2 सालों में करोडो के विज्ञापन दिये जा चुके हैं। यह सब सूचना विभाग में तैनात अधिकारियो की मिलीभगत से हो रहा है और नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। 
 
देहरादून से राकेश भाटी की रिपोर्ट.
 
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