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प्रधान संपादक का वेतन अपने सहायक से कम!

शंभूनाथ शुक्ल : गणेश शंकर विद्यार्थी ने आज से सौ साल पहले प्रताप अखबार निकाला था। पहले वह साप्ताहिक था फिर डेली हुआ। विद्यार्थी जी उसके संस्थापक संपादक थे। प्रताप निकालने के लिए धन का जुगाड़ नारायण दास अरोड़ा समेत कई नामी गिरामी लोगों ने किया था। जिसमें तारा अग्रवाल भी शरीक थीं। बाद में प्रताप डेली हो गया। विद्यार्थी जी उस समय कांग्रेस के गरम दल के नेता थे और क्रांतिकारियों को भी मदद करते रहते थे।

शंभूनाथ शुक्ल : गणेश शंकर विद्यार्थी ने आज से सौ साल पहले प्रताप अखबार निकाला था। पहले वह साप्ताहिक था फिर डेली हुआ। विद्यार्थी जी उसके संस्थापक संपादक थे। प्रताप निकालने के लिए धन का जुगाड़ नारायण दास अरोड़ा समेत कई नामी गिरामी लोगों ने किया था। जिसमें तारा अग्रवाल भी शरीक थीं। बाद में प्रताप डेली हो गया। विद्यार्थी जी उस समय कांग्रेस के गरम दल के नेता थे और क्रांतिकारियों को भी मदद करते रहते थे।

खुद भगत सिंह ने इसी प्रताप अखबार में काम किया था। चंद्रशेखर आजाद भी विद्यार्थी जी के यहां रुकते थे। इसलिए विद्यार्थी जी आगरा के मशहूर अखबार सैनिक से कृष्णदत्त पालीवाल को अपने यहां अपना सहायक बनाकर लाए। पालीवाल जी संपादक और विद्यार्थी जी उसी प्रताप के प्रधान संपादक। एक दिन पालीवाल जी को पता चला कि विद्यार्थी जी प्रताप से मेहनताने के रूप में जो पैसा ले रहे हैं वह पालीवाल जी के वेतन से पचास रुपये कम है। मालूम हो कि विद्यार्थी जी प्रधान संपादक के रूप में सिर्फ ३०० रुपये लेते थे और कृष्णदत्त पालीवाल जी को वे ३५० रुपये देते थे।

पालीवाल जी लडऩे पहुंच गए कि यह कौन सा न्याय है आप प्रधान संपादक हैं और मुझसे कम वेतन ले रहे हैं। विद्यार्थी जी ने उन्हें समझाया कि देखो भई पालीवाल जी आपको मैं आगरा से लाया हूं। यह आपका अपना शहर नहीं है पर मेरा तो अपना शहर है सो मेरे खर्चे कम इसलिए मेरा वेतन कम। अब जरा आज कोई संपादक अपने ठीक नीचे के संपादक से अपने वेतन की तुलना करे तो पता चलेगा कि नीचे वाले का वेतन प्रधान को मिलने वाले वेतन से कई गुना कम है।

(वरिष्ठ पत्रकार श्री विजयकिशोर मानव ने यह किस्सा दिवंगत पत्रकार श्री सत्यदेव शर्मा के मुख से सुना था।)

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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