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प्रभात खबर के दफ्तर पहुंचे कलाम, अतिथि संपादक बने

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने की चर्चाओं के बीच एपीजे अब्दुल कलाम कल प्रभात खबर के पटना स्थित दफ्तर में अतिथि संपादक की भूमिका निभाते हुए खबरों की खबर ले रहे थे. उन्होंने प्रभात खबर समूह के पाक्षिक पंचायतनामा का भी अवलोकन किया. प्रभात खबर, पटना के दफ्तर में बैठे अतिथि संपादक एपीजे अब्दुल कलाम ने पाक्षिक पंचायतनामा को ग्रामीण पत्रकारिता का अभिनव प्रयोग बताया. साथ ही उन्होंने सभी को सलाह दी कि वे घर में एक प्रार्थना की जगह और पुस्तकालय जरूर रखे. ऐसा करने से उनके व्यक्तित्व का विकास होगा और आने वाली पीढ़ी का संस्कार भी बेहतर होगा. डा. कलाम के अतिथि संपादक बनने पर प्रभात खबर के बिहार स्टेट हेड स्वयं प्रकाश ने अखबार में कलाम के व्यक्तित्व पर एक लेख लिखा, जो इस प्रकार है…

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने की चर्चाओं के बीच एपीजे अब्दुल कलाम कल प्रभात खबर के पटना स्थित दफ्तर में अतिथि संपादक की भूमिका निभाते हुए खबरों की खबर ले रहे थे. उन्होंने प्रभात खबर समूह के पाक्षिक पंचायतनामा का भी अवलोकन किया. प्रभात खबर, पटना के दफ्तर में बैठे अतिथि संपादक एपीजे अब्दुल कलाम ने पाक्षिक पंचायतनामा को ग्रामीण पत्रकारिता का अभिनव प्रयोग बताया. साथ ही उन्होंने सभी को सलाह दी कि वे घर में एक प्रार्थना की जगह और पुस्तकालय जरूर रखे. ऐसा करने से उनके व्यक्तित्व का विकास होगा और आने वाली पीढ़ी का संस्कार भी बेहतर होगा. डा. कलाम के अतिथि संपादक बनने पर प्रभात खबर के बिहार स्टेट हेड स्वयं प्रकाश ने अखबार में कलाम के व्यक्तित्व पर एक लेख लिखा, जो इस प्रकार है…

डॉ कलाम आज अतिथि संपादक

।। स्वयं प्रकाश ।।

पटना : डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के व्यक्तित्व के कई बिंब हैं. असंभव को संभव, निराशा को आशा, अहंकार को सहकार, हतोत्साह को उत्साह, संकट को अवसर, विफलता को सफलता, समस्याओं को समाधान और कमजोरी को ताकत में बदलने का नाम है डॉ कलाम. आज चहुंओर अंधेरा है. ऐसे में वे प्रकाश स्तंभ हैं. प्रेरणा पुरुष. अनास्था में आस्था का आगाज़ और नकारात्मकता के बीच सकारात्मकता को साकार करने वाले. अविश्वास के अंधेरे में विश्वास का दीया जला रहे हैं. वे नव निर्माण में लगे हुए हैं. कभी खत्म न होनेवाले मिशन पर.

यह उनके जीवन को देखने से ही लगता है. यह सब उन्होंने खुद जिया है, किया है. कथनी-करनी में कोई भेद नहीं. बहुत कम लोग जीते जी महानायक की सीमा को भी पार कर जाते हैं, वे उनमें से एक हैं. मिसाइलमैन, सफल वैज्ञानिक, कुशल प्रशासक, विचारक, दार्शनिक, मानवता के रक्षक, कवि, लेखक, संगीत-कला-प्रकृति प्रेमी.. असीम संसार है उनका. अपार विस्तार. बहुआयामी इतने कि शब्द-विशेषण भी कम पड़ जायें.

ऐसे करिश्माई डॉ कलाम 15 जून को प्रभात खबर समूह के अतिथि संपादक होंगे. बिहार-झारखंड और बंगाल की पत्रकारिता के इतिहास का यह पहला अवसर होगा. शुक्रवार को जब वे इस भूमिका में होंगे, तब उनकी उम्र 80 साल आठ महीने होगी. फिर भी युवा ऊर्जा से ओत-प्रोत. दूसरों के दुख-दर्द उन्हें उद्वेलित करते हैं, उन्हें प्रेरित करते हैं. और वे उनके लिए करते भी हैं. कम वजन के कैलिपर का निर्माण इसका छोटा-सा उदाहरण है. जहां भी रहे सहज-सरल और अपने तरीके से. पर उनके सरोकार, उनकी चिंताएं, उनकी बेचैनी का दायरा व्यापक है. और यही चीजें उनको सबसे अलग करती हैं, क्योंकि वे आम लोगों की पीड़ा से अपने को जोड़ते हैं.

वह इस देश के करोड़ों-करोड़ औसत लोगों की आंखों में सपने जगाये रखना चाहते हैं. सपने इस उम्मीद के कि नया सवेरा जरूर आयेगा, और रात चाहे जितनी भी संगीन हो, सुबह को हर हाल में रंगीन होना है. सपने इस हसरत के कि बच्चों की बेखौफ हंसी और निश्छल जिद से उसका रिश्ता कभी न टूटे. वह अक्सर कहते हैं-

स्वप्न, स्वप्न, स्वप्न.
स्वप्न विचारों में परिवर्तित होते हैं
और विचार, कार्यो में परिणत होते हैं.

उनकी केंद्रीय चिंता रहे हैं बच्चे. जो सवाल पूछते हैं. जो जानना चाहते हैं कि जुगनू रात में ही क्यों चमकता है? उन नौनिहालों को भी यह शख्स सपने देखने से मना नहीं करता. पहले सपना, फिर विचार और फिर कर्म. आगे कहते हैं –

विद्या देती नयी कल्पना, कल्पना लाती नये विचार.

नये विचारों से मिले ज्ञान, ज्ञान बनाये हमें महान.

बच्चों तक ही उनकी चिंताएं सीमित नहीं हैं. उनके और कई मिशन हैं. इनमें एक है – मदर्स स्माइल (मां की मुस्कान). यह बात बहुत छोटी लगती है. पर मां ही परिवार, समाज, राष्ट्र और कल के भविष्य यानी बच्चे, सबकी पहली इकाई हैं.

बकौल डॉ कलाम –
माताएं मुस्करायेंगी, तो परिवार मुस्करायेगा,
जब परिवार मुस्करायेगा, तो समाज और राष्ट्र मुस्करायेगा.

वे कहते रहे हैं- सोचो, हमने देश को क्या दिया? इसे करते भी हैं. उनका एक और मिशन है- ह्वाट आइ कैन गिव (मैं क्या दे सकता हूं)? उदाहरण देते हैं- सूरज को देखो. वह धरती से कभी नहीं कहता कि मैंने जो दिया है, लौटाओ या मेरा धन्यवाद दो. वह बिना किसी अपेक्षा के अनवरत प्रकाश और जीवन दे रहा है.

जिस दिन सूरज यह सब देना बंद कर देगा, उसकी चमक खत्म हो जायेगी. सूरज जो प्रकाश, गरमाहट और जीवन दे रहा है, वही उसकी आत्मा के लिए खुशी है. देने से ही लेना संभव है. क्योंकि देने से ही हम किसी को भागीदार बनाते हैं. भागीदार बनाने से ही खुशी मिलती है.

देश-समाज की तमाम समस्याओं को लेकर उनकी अपनी दृष्टि है और उसी के सहारे वह स्पष्ट राह दिखाते हैं. भारत को कैसे विकसित बनायें, इसके लिए विजन 2020. युवा, छात्र, किसान, सेना के जवान, किसान, डॉक्टर-इंजीनियर, प्रोफेशनल्स सबसे अपील करते हैं. उन्हें शपथ भी दिलवाते हैं. उनको प्रोत्साहित करते हैं.

एक सच्चे कर्मयोगी की तरह. वे सुखी परिवार और समृद्ध राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो खुशहाल और समृद्ध विश्व भी. रुकना, थकना, आराम नहीं, बस चलते जाना है.

चरैवेति.चरैवेति.

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