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सुख-दुख...

प्रभाष जी के जन्मोत्सव में नामवर सिंह क्यों झुंझलाए

ये चौथा अवसर था. प्रभाष परंपरा न्यास ने एक बार फिर प्रभाष जी का जन्मदिन मनाया. मैं भी भाषण, भजन और भोजन की प्रभाषीय परंपरा का प्रत्यक्षदर्शी एक बार फिर बना. हर बार एक नया आनंद मिलता है प्रभाष परंपरा न्यास के कार्यक्रमों में. आनंद तो इस बार भी मिला, लेकिन इस बार आनंद में कुछ खटक सा गया. भाषण की श्रंखला में सांसद राव इंद्रजीत सिंह और टीएन चतुर्वेदी बोल चुके थे. अब बारी नामवर सिंह जी की थी. थोडी़ सी ना नुकुर के साथ नामवर सिंह जी बोले तो पहले उन्होंने नेताओं को धोया. नेताओं के बहाने राव इंद्रजीत ही निशाने पर थे. उसके बाद उन्होंने उस संस्था को ही धोना शुरु कर दिया जिसके वे खुद अध्यक्ष हैं. यानि उन्होंने प्रभाष परंपरा न्यास पर ही टीका टिप्पणी शुरु कर दी.

ये चौथा अवसर था. प्रभाष परंपरा न्यास ने एक बार फिर प्रभाष जी का जन्मदिन मनाया. मैं भी भाषण, भजन और भोजन की प्रभाषीय परंपरा का प्रत्यक्षदर्शी एक बार फिर बना. हर बार एक नया आनंद मिलता है प्रभाष परंपरा न्यास के कार्यक्रमों में. आनंद तो इस बार भी मिला, लेकिन इस बार आनंद में कुछ खटक सा गया. भाषण की श्रंखला में सांसद राव इंद्रजीत सिंह और टीएन चतुर्वेदी बोल चुके थे. अब बारी नामवर सिंह जी की थी. थोडी़ सी ना नुकुर के साथ नामवर सिंह जी बोले तो पहले उन्होंने नेताओं को धोया. नेताओं के बहाने राव इंद्रजीत ही निशाने पर थे. उसके बाद उन्होंने उस संस्था को ही धोना शुरु कर दिया जिसके वे खुद अध्यक्ष हैं. यानि उन्होंने प्रभाष परंपरा न्यास पर ही टीका टिप्पणी शुरु कर दी.

उस सभा की ही मीनमेख निकालनी शुरु कर दी, जिसके संवैधानिक सभापति भी थे. एकबारगी लगा कि नामवर सिंह जी सभा के सभापति नहीं बल्कि सभा में बुलाए गए वक्ता हैं… और वो कार्यक्रम के स्वरूप से खुश नहीं हैं. प्रभाष परंपरा न्यास के कार्यक्रमों में नामवर सिंह पहले कभी इस रूप में नहीं दिखे थे.
    पिछले साल के ही कार्यक्रम में दिए गए उनके भाषण को याद कीजिए, उन्होंने कहा था कि प्रभाष जी उत्सवधर्मी थे. भाषण, भजन और भोजन उन्हें प्रिय था. इस बार नामवर सिंह को पता नहीं क्या हुआ-बोले हम जिन्हें अपना आदर्श मानते हैं उनके जन्मदिन का भी उत्सव मना लेते हैं और उडा़ देते हैं. प्रभाष जी महज उतसवधर्मी नहीं थे. उनके जन्मदिन पर कुछ ठोस होना चाहिए. केवल एक दो भाषण की जगह संगोष्ठी-सेमिनार होने चाहिए. खूब बहस होनी चाहिए. गोष्ठी में शामिल होने के लिए वक्ताओं को छह महीने पहले से विषय बताना चाहिए. वो उस पर तैयारी करके आएं. जो वक्ता गोष्ठी में बोल पाएं उनके और जो न बोल पाएं उन सभी के लेख एक पत्रिका में प्रकाशित किए जाएं. तब ठोस काम होगा. प्रभाष जी अगर कहीं से देख रहे होंगे तभी उन्हें संतुष्टि मिलेगी.
    नामवर सिंह के ये समालोचनात्मक उपदेश बहुत अच्छे हैं. इन उपदेशों में बुराई भी कोई नहीं है. मगर, ऐसा मेरा मानना है कि नामवर सिंह जी ने जिस मंच से ये बातें कहीं वो मंच उनसे ये अपेक्षा नहीं रखता था. वो अपनी ये सभी टीका टिप्पणी या सुझाव प्रभाष परंपरा न्यास की उस सभा में उठा सकते थे जिसमें प्रभाष जी के जन्मदिन के अवसर पर होने वाले कार्यक्रम तय होने थे. नामवर सिंह अध्यक्ष के अधिकार से प्रभाष परंपरा न्यास के न्यासियों को अपने सुझावों पर अमल करने के लिए बाध्य भी कर सकते थे.  इतना नहीं तो कम से कम प्रभाष परंपरा न्यास के अध्यक्ष के नाते नामवर सिंह जी “जो उचित है” उसको क्रियान्वित करने के निर्देश तो बाकी न्यासियों को दे ही सकते थे. उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया.
    अब सवाल यह उठता है कि नामवर सिंह जी ने प्रभाष परंपरा न्यास के आंतरिक मंच की जगह प्रभाष जी के जन्मदिन पर हो रहे सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच को ही अपनी टिप्पणी के लिए क्यों चुना? क्या प्रभाष परंपरा न्यास की बैठकों में बाकी न्यासियों ने अपने ही अध्यक्ष को सुझाव देने से रोक दिया था? या प्रभाष परंपरा न्यास के न्यासियों ने अपने अध्यक्ष के सुझावों को अनसुना कर दिया? क्या प्रभाष परंपरा न्यास अब अपने अध्यक्ष की अवहेलना और उपेक्षा कर रहा है? क्या प्रभाष परंपरा न्यास के अध्यक्ष नामवर सिंह के सुझाव न्यास की परंपरा के अनुकूल नहीं थे, इसलिए न्यासियों ने अनदेखा कर दिया? या  नामवर सिंह जी ने अपनी टीका-टिप्पणियों के जरिए कोई कूटनीतिक संदेश देने की कोशिश की है?
    सवाल-संशय कुछ और भी हो सकते हैं, लेकिन इन सभी सवाल-संशय या विवाद को जन्म नामवर सिंह जी ने ही दिया है. हालांकि, नामवर सिंह जी ने भाषण सुना-दिया, भजन का आनंद लिया और भोजन भी किया. ठीक उसी तरह जैसा कि वो पहले के आयोजनों में करते रहे थे. आखिर अपने ही मंच पर, अपने ही आयोजन को लेकर उनके मन में झुंझलाहट क्यों थी?
और उनकी ये प्रतिक्रिया उनके 'कद' और 'पद' के अनुरूप कही जा सकेगी?

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