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उत्तराखंड

प्रयाग पांडेय की किताब का उनकी गैरमौजूदगी में हुआ पिथौरागढ़ में विमोचन

पिथौरागढ़। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं। समूचा उत्तराखंड राज्य आंदोलन अपनी व्यापकता और आवेग की दृष्टि से बेजोड़ रहा है। आंदोलन में समाज के सभी वर्गों की प्रत्यक्ष और सक्रिय भागीदारी के लिहाज से इस आंदोलन ने विश्व के सभी जन आंदोलनों को कहीं पीछे छोड़ दिया था। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में समाज के प्रत्येक वर्ग की व्यापक और प्रत्यक्ष भागीदारी रही। यह विश्व का अकेला ऐसा आंदोलन था, जिसे सबसे ज्यादा बौद्धिक समर्थन हासिल हुआ।

पिथौरागढ़। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं। समूचा उत्तराखंड राज्य आंदोलन अपनी व्यापकता और आवेग की दृष्टि से बेजोड़ रहा है। आंदोलन में समाज के सभी वर्गों की प्रत्यक्ष और सक्रिय भागीदारी के लिहाज से इस आंदोलन ने विश्व के सभी जन आंदोलनों को कहीं पीछे छोड़ दिया था। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में समाज के प्रत्येक वर्ग की व्यापक और प्रत्यक्ष भागीदारी रही। यह विश्व का अकेला ऐसा आंदोलन था, जिसे सबसे ज्यादा बौद्धिक समर्थन हासिल हुआ।

उत्तराखंड राज्य आंदोलन में समाज का कोई भी हिस्सा निष्क्रिय नहीं रहा। ऐतिहासिक दृष्टि से सदियों पुराने और एक विस्तृत आंदोलनात्मक आयाम वाले उत्तराखंड राज्य आंदोलन की नब्ज टटोलना और चन्द पृष्ठों में लिपिबद्ध करना बेहद श्रमसाध्य एवं दुष्कर कार्य है पर नैनीताल के वरिष्ठ पत्रकार प्रयाग पाण्डेय ने ‘देवभूमि का रण’ नामक किताब में इस असंभव कार्य को बखूबी अंजाम दिया है। प्रयाग पाण्डेय ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन को न केवल राष्ट्रीय राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की है वरन् उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास को एकदम नए ऐतिहासिक संदर्भों में देखने की कोशिश की है। राज्य निर्माण के बाद कई पुस्तकें राज्य आंदोलन के इतिहास पर आईं हैं लेकिन लेखक की विश्वदृष्टि के लिहाज से यह पुस्तक एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गई है। सामाजिक आंदोलनों के लिए यह एक महत्वपूर्ण किताब है। जनगीतों ने इस पुस्तक को अधिक रोचक और आंदोलन के दौर से लोगों का सीधा साक्षात्कार करा दिया है।’’

नगर पालिका सभागार में ‘देवभूमि का रण’ किताब का विमोचन करते हुए वक्ताओं ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि लेखक ने जिस विश्वदृष्टि से उत्तराखंड राज्य के आंदोलन को लिपिबद्ध किया है वह पुस्तक लेखन की एक नई विधा से भी लोगों को रूबरू कराता है। यह प्रयोग हिन्दी साहित्य के लिए भी एक अदभुत देन है। किताब का विमोचन संयुक्त रूप से मुख्य अतिथि एवं वक्ता के रूप में आमंत्रित वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं राज्य आंदोलनकारी श्रीमती के0डी0 लुईस, डॉ0 अशोक कुमार पंत, चन्द्रशेखर कापड़ी, नगर पालिका अध्यक्ष जगत सिंह खाती, उप जिलाधिकारी नरेश दुर्गापाल, पुलिस उपाधीक्षक राजीव मोहन, स्वाधीनता सेनानी संगठन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बसेड़ा, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित लेखक राजेश मोहन उप्रेती, लेखक दिनेश भट्ट, उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के जिलाध्यक्ष जगदीश कलौनी आदि ने किया। इस मौके पर आयोजित विचार गोष्ठी में कोतवाल जी0पी0 बौठियाल, पत्रकार सुशील खत्री, बृजेश तिवारी, टीम संस्था के निदेशक योगेश पाठक, आकाशदीप संस्था के निदेशक संजय चौहान, विप्लव भट्ट, मुकुल पाठक, शबनम खान, मातृ शिशु परिवार कल्याण महिला कर्मचारी एसोसिएशन की संरक्षक श्रीमती देवकी मर्तोलिया, माया मेहता, सावित्री खड़ायत, उमा ततराड़ी, भावना शर्मा, हरी कन्याल, निर्मला देवी समेत भारी संख्या में लोग मौजूद थे। समारोह का संचालन श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के जिलाध्यक्ष जगदीश कलौनी ने एवं अध्यक्षता नगर पालिका के चेयरमैन जगत सिंह खाती ने की।

लेखक की गैर मौजूदगी में हुआ समारोह

पिथौरागढ़। शायद ऐसा पहले कभी हुआ हो। किसी लेखक की पहली किताब का विमोचन हो और वह स्वयं विमोचन समारोह में मौजूद न हो। उत्तराखंड राज्य आंदोलन पर लिखी गई पुस्तक ‘देवभूमि का रण’ के साथ यही हुआ। पुस्तक के लेखक प्रयाग पाण्डेय इस समारोह में न आ सके किंतु  उनकी गैर मौजूदगी में इस पुस्तक का भव्य विमोचन हुआ। इस दौरान वक्ताओं ने पुस्तक में लिखे जनगीतों के माध्यम से आंदोलन की यादें ताजा कर दीं। जनगीतकार प्रकाष चंद्र जोषी ‘शूल’ ने अपनी रचनाओं के माध्यम से उत्तराखंडी समाज के समक्ष खड़ी चुनौतियों पर प्रहार किए। समारोह में लेखक के मौजूद न रहने पर भी विमोचन की भव्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वक्ताओं ने पुस्तक के सभी सहयोगियों के प्रति एक अच्छी पुस्तक के प्रकाशन हेतु अपनी शुभकामनाएं प्रेषित कीं।

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