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प्रिंट इंडस्ट्री को कमजोर बनाएगा फैसला (मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नभाटा की राय)

नवभारत टाइम्स यानि नभाटा यानि टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप वालों का हिंदी अखबार. इस अखबार के वेब पेज पर मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एक लंबी टिप्पणी प्रकाशित हुई है, 'एनबीटी नजरिया' नाम से. शीर्षक है- 'प्रिंट इंडस्ट्री को कमजोर बनाएगा फैसला'. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ इस टिप्पणी में नभाटा प्रबंधन की तरफ से कई तरह के तर्क-कुतर्क भी दिए गए हैं. भड़ास पर इसलिए प्रकाशित किया जा रहा है ताकि इस मसले के दूसरे पक्ष की बात भी सामने आ सके.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

नवभारत टाइम्स यानि नभाटा यानि टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप वालों का हिंदी अखबार. इस अखबार के वेब पेज पर मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एक लंबी टिप्पणी प्रकाशित हुई है, 'एनबीटी नजरिया' नाम से. शीर्षक है- 'प्रिंट इंडस्ट्री को कमजोर बनाएगा फैसला'. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ इस टिप्पणी में नभाटा प्रबंधन की तरफ से कई तरह के तर्क-कुतर्क भी दिए गए हैं. भड़ास पर इसलिए प्रकाशित किया जा रहा है ताकि इस मसले के दूसरे पक्ष की बात भी सामने आ सके.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

प्रिंट इंडस्ट्री को कमजोर बनाएगा फैसला

एनबीटी नजरिया

वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला प्रिंट मीडिया के बड़े हिस्से को हिलाकर रख देगा और उसे आर्थिक तौर पर कमजोर बनाएगा। खास बात यह कि इसकी जद में वे बड़े मीडिया कंपनियां भी आएंगी, जो पहले से ही भारी दबाव में हैं और वजूद के सवाल से जूझ रहे हैं।

समय को देखते हुए यहां बड़ा मुद्दा यही है कि क्या सरकार से नियुक्त वेज बोर्ड के जरिये प्राइवेट सेक्टर में सैलरी कंपेनसेशन/पैकेज तय किया जाना पूरी तरह से समय के उलट नहीं है? अट्ठावन साल पहले जब पहला वेजबोर्ड गठित किया गया था, तब सरकार को यह चिंता थी कि कहीं नियोक्ता अपने कर्मचारियों के हितों का शोषण न कर सकें। लेकिन समय के साथ देश आगे बढ़ा। इस संगठित इंडस्ट्री में सामान्यतया श्रम बाजार स्वतंत्र और निष्पक्ष है, जिसमें ब्लू कॉलर स्टाफ के लिए डिमांड और सप्लाई के जरिये ही पारिश्रमिक और सैलरी का निर्धारण होता है। साथ ही, मैनेजमेंट और यूनियन द्विपक्षीय बातचीत के जरिये एक समझौते तक पहुंचते रहे हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या वेज बोर्ड बाहर से इंडस्ट्री पर ऐसा पारिश्रमिक थोप सकता है जो वित्तीय रूप से निर्वहनीय और उचित न हो।

दुख की बात यह भी है कि यह देश में इकलौती (प्रिंट) ऐसी इंडस्ट्री है, जहां पारिश्रमिक और सैलरी का निर्धारण बाहरी बोर्ड द्वारा होता है और खास बात यह कि इसकी सेवा शर्तें ऐसी हैं कि उनसे प्रबंधन को सबसे अक्षम, निकम्मे और बेकार कर्मचारी को बाहर करने में भी मुश्किलें पेश आती हैं। दुनिया में हुआ प्रत्येक सर्वे यह साबित कर चुका है कि श्रम बाजार में कर्मचारियों के बचाव के अतिरिक्त गैर-लचीलापन भी दरअसल नई नौकरियों के पैदा होने में रुकावटें खड़ी करता है। इससे नियोक्ता भी जॉब मार्केट में बूम के वक्त भी नौकरियां देने में हिचकते हैं क्योंकि मंदी के समय उन्हें छटनी में मुश्किलें आती हैं। इसके उलट, लचीले बाजार में जब इंडस्ट्री वृद्धि कर रही होती है और सुनहरे भविष्य की उम्मीद होती है तो नियोक्ता भी नए लोगों को जॉब देने में ज्यादा भरोसा दिखाते हैं।

आज की मीडिया इंडस्ट्री में वेज बोर्ड के कॉन्सेप्ट में ही दोष है। ऐसे दौर में जब तकनीक बदलावों की वजह से उपभोक्ता के विचारों और बर्ताव में भी परिवर्तन दिख रहा है। प्रिंट इंडस्ट्री सूचना देने का इकलौता जरिया नहीं रह गई है। टीवी, इंटरनेट, मोबाइल …ये सभी प्रिंट इंडस्ट्री के भविष्य के लिए खतरा बन गए हैं और उसके बाजारगत हिस्से को छोटा करते जा रहे हैं। लेकिन हैरत की बात है कि इनमें से कोई भी इंडस्ट्री वेज बोर्ड के तहत नहीं आती। इससे प्रिंट इडस्ट्री के लिए वैसे भी प्रतिस्पर्धा असमान हो गई है और इससे प्रिंट इंडस्ट्री को खासा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

असल में प्रिंट जर्नलिस्ट की परिभाषा भी काफी धूमिल हो गई है। अब ऐसे जर्नलिस्ट को अकेले प्रिंट के लिए ही नहीं काम करना पड़ रहा , वह ऑनलाइन रिपोर्ट भेज रहा है। टीवी के लिए भी रिपोर्टिंग कर रहा है। यह सारा काम एक दिन में ही हो रहा है।
 
पारिश्रमिक में यह बढ़त औसतन 70 से 80 पर्सेंट है , जो जर्नलिस्ट से लेकर प्रेस वर्कर , ड्राइवर और चपरासी , सभी पर एकसमान रूप से लागू होगी। अगर यह मान भी लें कि जर्नलिस्ट की जॉब विशेष है तो अन्य का क्या ? इससे एक ड्राइवर की सैलरी 36 हजार रु . से बढ़कर 62 हजार रु . हो जाएगी। क्लर्क की सैलरी भी 39 हजार से बढ़कर 62 हजार हो जाएगी। वहीं , चपरासी की सैलरी 33 हजार रु . से बढ़कर 58 हजार रु . हो जाएगी। स्टेनोग्राफर की सैलरी 40 हजार से बढ़कर 71 हजार हो जाएगी। इतना ही नहीं , रोटरी मशीनमैन की सैलरी 40 हजार से बढ़कर 76 हजार रु . हो जाएगी। यह उससे बहुत ज्यादा है जो दूसरे इंडस्ट्री और दफ्तरों में फैक्ट्री और अन्य कर्मचारियों को मिल रहा है।

बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार को नियोक्ता और कर्मचारी के रिश्ते में हस्तक्षेप की इजाजत दी जानी चाहिए। एक ऐसी इंडस्ट्री में जो न सिर्फ शहरी है बल्कि संगठित भी है। क्या यह बाजार नियमों का उल्लंघन नहीं है। यह अखबार सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निराश है। यह समकालीन मीडिया की असलियत से काफी दूर है। यह ऐसे वक्त में समय को पीछे मोड़ने की तरह है , जब दुनिया नए नजरिये से देख रह ी है। (साभार: नवभारत टाइम्स डाट काम)

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