लेखकों का सभी सम्मान करते हैं. हम भी. केवल इसलिए नहीं कि वे कुछ ऐसा लिख पाते हैं, जो लोगों के मन को छूता है, प्रभावित करता है, बल्कि इसलिए भी कि वे दूसरों के बारे में भी सोचते हैं, उनके हक़ के बारे में सोचते हैं और अगर कहीं किसी को उसके हक़ से वंचित किया जा रहा होता है तो वे लड़ते भी हैं, प्रतिरोध करते हैं. मेरा मानना है कि लेखक का काम लिखना है और वह कहीं भी प्रकाशित हो, इस पर किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए. वह किसी के लिए लिखे, यह उसकी आजादी है, उस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता है. यह उसका चुनाव है. परन्तु कोई भी लेखक किसी दमनकारी, कर्मचारियों का हक़ मारने वाले, लेखकों का लाखों का पारिश्रमिक हड़प कर जाने वाले किसी भी संस्थान के लिए बिना उससे यह सवाल किये कि आखिर तुमने लोगों के पैसे क्यों मार लिए, कैसे जुड़ सकता है, कैसे लिख सकता है?
एक अख़बार लखनऊ से निकलता है. नाम लेना जरूरी नहीं है. उसके प्रबंधकों ने कुछ खास कर्मचारियों को लक्ष्य करके ऐसी परिस्थिति बनाई कि उन्हें भागना पड़े, छोड़कर जाना पड़े. उनकी योजना सफल रही और मुझे, हरे प्रकाश को, अविनाश को और गौरव को जाना पड़ा. योजना कुछ ऐसी फुलप्रूफ थी कि नहीं जाते तो अपमानित होते. मतलब यह कि हमें या तो छोड़कर चले जाने या अपमान झेलने को तैयार रहने का विकल्प दिया गया. हमने पहला विकल्प चुना. सम्मान बचाकर बाहर हो जाना. प्रबंधकों ने हरे प्रकाश, अविनाश, गौरव की पूरे महीने की तनख्वाह नहीं दी, मेरा भी ३० हजार से ज्यादा बकाया मार लिया. लेखकों का छह-सात माह का पारिश्रमिक रोक लिया गया था, यह कहकर कि लेख-कवितायेँ बेकार की चीजें हैं. न्यूजपेपर को व्यूजपेपर नहीं होना चाहिए. जब लेखकों ने पारिश्रमिक की बात की तो पोतदार साहब ने कइयों से कहा कि तुम्हारा पैसा संपादक लेकर चला गया है, उससे बात करो.
कई लेखकों ने बताया कि निहायत बदतमीजी से उनसे बात की गयी. अब वही ठग लेखकों से बात करके उन्हें फुसला रहे हैं, बता रहे हैं. पैसा मिलेगा, आप लिखिए. कुछ लोग लिख भी रहे हैं. कुछ लोगों के लिखने के व्यक्तिगत कारण भी हैं, हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है लेकिन भाई आप सब बड़े लेखक हो, एक बार लिखना शुरू करने के पहले उससे पूछते कि हरेप्रकाश, अविनाश और गौरव का वेतन क्यों नहीं दिया, क्यों नहीं दे रहा है. वह तर्क देता है कि नोटिस नहीं दी, इसलिए वेतन नहीं दे रहा है पर ऐसी परिस्थिति तो उसने ही बनाई कि नोटिस देने की नौबत ही न आये. उसका यह तर्क वैसे ही फिजूल है, जैसे लेखकों के पैसे के बारे में यह कहना कि संपादक लेकर चला गया है. मुझे पता है कि ज्यादातर लेखकों ने इन ठगों के मधुर आग्रह को ठुकरा दिया है क्योंकि वे इसलिए नहीं लिख रहे थे कि वह कोई ऐसा अख़बार है, जिसमें लिखने
मात्र से उनकी प्रतिष्ठा बढ़ जायेगी, बल्कि इसलिए कि वहां मैं था, हरे था. फिर भी कुछ प्रियजन, बहुत थोड़े, नगण्य कहूं तो ठीक रहेगा, उनके बहकावे में आ गए हैं, या उन्हें याद नहीं है कि वे हकमारों का साथ दे रहे हैं.
लेखक सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार और ब्लागर हैं. लखनऊ से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक में प्रधान संपादक हैं.





