Om Thanvi : क्या प्रेमचंद मार्क्सवाद या साम्यवाद के अनुयायी थे? या उन पर जबरन लेबल लगाया जाता है? कवि Bodhi Sattva बोधिसत्व ने तो पिछले दिनों इस वाल पर यहाँ तक दावा किया कि प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी। मैंने प्रमाण पूछा तो वे नहीं दे पाए। वास्तविकता यह है कि प्रलेस की स्थापना लन्दन में हुई थी। उसकी स्थापना में हिंदी का एक भी लेखक शामिल नहीं था। प्रेमचंद ने एक लेख लिखकर जनवरी 1936 में इसका स्वागत जरूर किया। फिर उसके पहले अधिवेशन की अध्यक्षता भी की, जिसमें एक बार भी मार्क्सवाद का नाम नहीं लिया। अगले रोज उन्होंने आर्य समाज के सम्मलेन की अध्यक्षता की।
प्रेमचंद साम्यवादी थे या नहीं, इसकी पड़ताल में मैंने उपन्यास सम्राट की कुछ रचनाओं के हवाले देखे तो एक विद्वान ने अपनी वाल पर लिखा कि पात्रों के हवाले क्या होता है, वहां पात्रों के विचार बोल रहे हैं, प्रेमचंद के नहीं। बात सही है। लेकिन प्रेमचंद अपने लेख में जो कहें, वह? उसके बारे में हम क्या मानें? 'स्वदेश' के 18 मार्च, 1928 के अंक में प्रेमचंद का एक लेख छपा था "राज्यवाद और साम्राज्यवाद"। इसमें प्रेमचंद के ये शब्द साम्यवाद के बारे में हैं:
"एक समय था जब साम्यवाद निर्बल राष्ट्रों को आशा से आंदोलित कर देता था। सारे संसार में जब प्रजावाद की प्रधानता हो जाएगी, फिर दुख या पराधीनता या सामाजिक विषमता का कहीं नाम भी न रहेगा। साम्यवाद से ऐसी ही लंबी-चौड़ी आशाएं बांधी गई थीं; मगर अनुभव यह हो रहा है कि साम्यवाद केवल पूंजीपतियों पर मजूरों की विजय का आंदोलन है, न्याय के अन्याय पर, सत्य के मिथ्या पर, विजय पाने का नाम नहीं। यह सारी विषमता, सारा अन्याय, सारी स्वार्थपरता जो पूंजीवाद के नाम से प्रसिद्ध है, साम्यवाद के रूप में आकर अणु मात्र भी कम नहीं होगी, बल्कि उससे और भी भयंकर हो जाने की संभावना है।"
साम्यवाद के पूंजीवाद से भी भयंकर होने का खतरा? वह भी प्रेमचंद को? गौर करें कि यहाँ प्रेमचंद का कोई पात्र नहीं, प्रेमचंद खुद बोल रहे हैं!
प्रेमचंद समतावादी, साम्प्रदायिकता-विरोधी और प्रगति के हामी थे इसमें कोई शक नहीं। लेकिन उन्हें इतने वर्ष बाद किसी विचार या उससे बंधे घोड़े पर बिठाना उपन्यास-सम्राट के साथ ज्यादती है।
हिंदी दैनिक जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.






