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प्रेस की आजादी का गलत इस्‍तेमाल कर रहे समाचार पत्रों के मालिक

केंद्रीय श्रम कानून ने मजिठिया बोर्ड की सिफारिशों को मानते हुए नोटिफिकेशन जारी कर दिया है, लेकिन समाचार-पत्रों के मालिक इसे अभी तक लागू नहीं कर पाए हैं और ना ही भविष्य में इसे लागू करने की संभावना दिखाई दे रही है। इसके इतर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडे काटजू परिषद को दंतहीन संस्था के तबके से बाहर निकालना चाहते हैं। इन परिस्थियों में देश के पत्रकार संगठनों की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

केंद्रीय श्रम कानून ने मजिठिया बोर्ड की सिफारिशों को मानते हुए नोटिफिकेशन जारी कर दिया है, लेकिन समाचार-पत्रों के मालिक इसे अभी तक लागू नहीं कर पाए हैं और ना ही भविष्य में इसे लागू करने की संभावना दिखाई दे रही है। इसके इतर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडे काटजू परिषद को दंतहीन संस्था के तबके से बाहर निकालना चाहते हैं। इन परिस्थियों में देश के पत्रकार संगठनों की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

यहां ऐसे ही एक पत्रकार संगठन और उनके पदाधिकारियों की सच्चाई से रू-ब-रू कराने की हम कोशिश कर रहे हैं। यहां हम 2007 में पूर्वांचल के प्रतिष्ठित काशी पत्रकार संगठन के तत्कालीन अध्यक्ष संजय अस्थाना की ओर से लिखे एक पत्र का मजमून रख रहे हैं… जिसे उन्होंने इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट की राष्ट्रीय परिषद के बंगलौर अधिवेशन (63वां) के दौरान चर्चा के लिए लिखा था और वहां पढ़ा गया था। उन्हें इस अधिवेशन में बुलाया गया था, लेकिन किसी वजह से वो नहीं जा पाए थे। इस पत्र को उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के मुख्यपत्र श्रमजीवी कलमकार ने नवंबर-दिसंबर2007 अंक में भी छापा था। नीचे पढि़ए वह पत्र:

इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्ल्यूजे) की राष्ट्रीय परिषद का 63वां अधिवेशन ऐसे समय आयोजित है जब समाचार पत्रों में कार्यरत पत्रकार और गैर-पत्रकार कर्मचारी अब तक के सर्वाधिक संकटपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। यह संकट न सिर्फ आर्धिक व सामाजिक सुरक्षा को लेकर है वरन यह उनके रोजगार की गारंटी को खत्म करने वाला है। ऐसे वक्त में यह जरूरी है कि पिछले अनुभवों का निष्पक्ष और निर्मम विश्लेषण करते हुए आईएफडब्ल्यूजे आगे की रणनीति तय करे। आज जिन समस्याओं से पत्रकार और गैर पत्रकार समाचार पत्र कर्मी जूझ रहे हैं, उनका विंदुवार संक्षिप्त उल्लेख निम्नलिखित है-

राष्ट्रीय अधिवेशन के एजेंडा नंबर 4 में नये वेज बोर्ड के लिए चार्टर ऑफ डिमांड की तैयारियों का जिक्र है। काशी पत्रकार संघ का दृढ़ मत है कि नये वेतन आयोग की त्रिपक्षीय बैठक में आईएफडब्ल्यूजे को मजबूती से पहली बैठक में ही इस बात पर जोर देना चाहिए कि वेज बोर्ड अवार्ड लागू न करने वाले समाचार-पत्र प्रतिष्ठानों के लिए कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए। अब तक आये वेज बोर्डों का अनुभव बताता है कि समाचार पत्र प्रतिष्ठानों ने वेज बोर्ड की पूरी तरह अनदेखी की है। इसको लागू करवाने के केंद्र और राज्य सरकारों के प्रयास पूरी तरह विफल साबित हुए हैं। इन प्रयासों और उसके नतीजों पर एक नजर डालना जरूरी है। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट-1955 के प्रावधान के तहत अवार्ड लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। इस सिलसिले में राज्यों में त्रिपक्षीय समितियों के गठन को सुनिश्चित करने हेतु केंद्रीय श्रम मंत्रालय के लेबर व इंप्लायमेंट एडवाइजर की अध्यक्षता में केंद्रीय समिति गठित की गयी। इसके अतिरिक्त स्पेशल सेल का गठन और राज्य समितियों की त्रैमासिक रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की जानी थी लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे।

2002 से 2005 के बीच केंद्रीय समिति की पांच बैठकें हुईं और उनमें पाया गया कि 1507 समाचार पत्रों में से, राज्य समितियों की रिपोर्ट के अनुसार, 423 समाचार-पत्रों यानी 28.06 प्रतिशत ने अवार्ड पूरी तरह लागू किया। 148 यानी 9.82 प्रतिशत समाचार पत्रों ने आंशिक रूप से और 936 यानी 62.11 प्रतिशत अखबारों ने बिल्कुल ही लागू नहीं किया। यह अत्यंत ही निराशाजनक तस्वीर है। काशी पत्रकार संघ ने मणिसाना लागू करवाने के लिए स्थानीय स्तर पर पहले आंदोलन, फिर हाई कोर्ट का सहारा लिया। काशी से देश के सभी महत्वपूर्ण हिंदी दैनिक जैसे आज, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान व अमर उजाला प्रकाशित होते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि संघ के तमाम प्रयासों के बावजूद किसी भी अखबार में वेज बोर्ड लागू नहीं है। काशी पत्रकार संघ द्वारा माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर रिट संख्या 12811 पर अंतिम दौर की बहस के दौरान समाचार पत्र प्रबंधन की ओर से हलफनामा देकर कहा गया कि उनके पत्रों में अवार्ड लागू कर दिया गया है। मामला जांच के लिए श्रम कार्यालय में दाखिल है, लेकिन प्रबंधन द्वारा मणिसाना के अंतरिम पर लिया गया स्थगनादेश माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुकदमा संख्या 35445 /1996 के निर्णय में खारिज करते हुए प्रबंध को अंतरिम के तत्काल भुगतान का आदेश दिया।

यही नहीं वेज बोर्ड द्वारा तय तमाम भत्ते जैसे डीए, नाइट, मेडिकल, एचआर इत्यादि पत्रकारों को नहीं मिल रहे हैं। बोनस, ग्रेच्युटी और प्राविडेंट फंड के मामलों में भी पत्रकारों और गैर-पत्रकारों को अपने भुगतान के लिए लेबर कोर्ट का सहारा लेना पड़ रहा है। उदाहरण स्वरूप दैनिक आज में 22 सालों तक कार्यरत रहने के बाद श्री एलवीके दास ने जब 2003 में त्यागपत्र दिया तो ग्रेच्युटी व बोनस का भुगतान उन्हें लेबर कोर्ट से आरसी जारी होने के बाद समाचार पत्र प्रबंधन ने किया। सीनियर सब एडिटर की 6452 रुपये मासिक वेतन के आधार पर उनकी ग्रेच्युटी की राशि का निर्धारण हुआ। यह पत्रकारों की आर्थिक स्थिति को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। अमर उजाला में 6500 रुपये से अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों का पीएफ ही नहीं कटता था लेकिन 21 फरवरी, 2005 को हाई कोर्ट के फैसले के बाद उनका पीएफ कटना शुरू हुआ। यह बानगी है जो हमें बाध्य करती है कि वेज बोर्ड की त्रिपक्षीय बैठकों में शिरकत के लिए चुने गए प्रतिनिध वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने के लिए किसी इनबिल्ट मकैनिज्म की शर्त पर ही उसमें भाग लें। अन्यथा बैठक का बहिष्कार कर संघर्ष की अखिल भारतीय रणनीति और रूपरेखा तैयार करें।

दूसरा प्रमुख मुद्दा कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम का है– पत्रकारों और गैर-पत्रकार अखबारकर्मियों के सामाजिक अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा पर सबसे बड़ा हमला कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम के जरिये किया जा रहा है। इससे उनको वैध भत्तों और अन्य लाभों से ही वंचित नहीं किया जा रहा है, बल्कि उनकी नौकरी की सुरक्षा के कांसेप्ट को भी खत्म किया जा रहा है। नौकरी में बने रहने के दबाव में समूचा संपादकीय तंत्र, प्रबंधन की नीतियों का अविवेकपूर्ण ढंग से पालन करने को बाध्य हो गया है। यह प्रेस की आजादी पर सबसे सुनियोजित हमला है। प्रेस की आजादी का इस्तेमाल समाचार-पत्र मालिक कर रहे हैं, न कि संपादक और पत्रकार। जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संपादकीय स्वतंत्रता के लिए 1966 में एक एक्ट के तहत प्रेस काउंसिल का गठन हुआ, उसका उद्देश्य था अंग्रेजों के दमनकारी प्रेस कानूनों को समाप्त कर फ्रीडम ऑफ प्रेस सुनिश्चित करना। लेकिन बड़े औद्योगिक समूहों ने अपने निजी स्वार्थ और अनुचित दबावों के लिए इसका इस्तेमाल शुरु कर दिया और साल दर साल कई गुना मुनाफा देने वाले समाचार पत्र उद्योग के प्रबंधन ने संपादकीय पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। अब वे ऐसा कोई कानून पास नहीं होने देना चाहते जो उनकी इस आजादी में दखल पहुंचाता हो। यह बेवजह नहीं है कि नए वेज बोर्ड के गठन की सूचना पर ही इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी ने इसे भारत में प्रेस की आजादी में बाधक बताते हुए राष्ट्रीय श्रम आयोग के हवाले से इसे अतीत का डायनासोर करार दिया था। समाचार पत्र प्रबंधन के इन नापाक प्रयासों का एक ही माकूल जवाब हो सकता है कि आईएफडब्ल्यूजे कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम के खिलाफ एक तरफ जहां वेज बोर्ड की बैठक में मजबूती से अपना पक्ष रखे वहीं देश के पैमाने पर इसके खिलाफ व्यापक लामबंदी करे। जरूरत हो तो अन्य राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन की भी मदद ले।

तीसरा महत्वपूर्ण बिन्दु सुरक्षा से संबंधित है- अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर आज पत्रकारों का धार्मिक, कट्टरता, आतंकवाद, माफिया और राजनीतिक दबावों से जूझना पड़ रहा है। कमजोर आर्थिक स्थिति और सामाजिक सुरक्षा के अभाव में उसके लिए फील्ड में काम करना दुरूह होता जा रहा है। पिछले सालों में पत्रकारों पर हमले की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हो हुई है। ऐसे में उन्हें किसी व्यापक सुक्षा छतरी की आवश्यकता है। काशी पत्रकार संघ का सुझाव है कि आईएफडब्ल्यूजे अन्य अंतरराष्ट्रीय व क्षेत्रीय संघटों से इस मुद्दे पर हुए विचार विमर्श के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा की रूप रेखा तैयार करे।

स्थायी आदेश- विभिन्न समाचार पत्रों में लागू स्थायी आदेश के उन तमाम गैर कानूनी प्रावधानों को तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाना चाहिए जो मौजूदा श्रम कानूनों के खिलाफ है। वाराणसी जिले में कई प्रमुख समाचार-पत्रों मे स्थायी आदेश के नाम पर सेवानिवृत्ति की आयु 55 वर्ष कर दी है। स्थानीय श्रम कार्यालय उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई अबतक नहीं कर पाया है। इसके अतिरिक्त स्थायी आदेशों में समय-समय पर परिवर्तन कर पत्रकारों का शोषण किया जा रहा है। पेंशन- समाचार पत्रों में कार्यरत पत्रकारों के लिए भी केंद्रीय सरकार के कर्माचरियों की तरह पेशन योजना वेज बोर्ड की सिफारिश में शामिल किया जाए।

— अंत में संघ का प्रस्ताव है कि वेतन निर्धारण के वक्त आईएफडब्ल्यूजे समाचार पत्र प्रबंधन के दबाव में आए बिना न सिर्फ मिनिमम वेज, बल्कि डीसेंट वेज तय करवाने का प्रयास करे। 5वें वेतन आयोग ने भी केंद्रीय कर्मियों के वेतन निर्धारण में डीसेंट वेज पर ही जोर दिया था और संसाधनों की कमी के तर्क को यह कहकर खारिज कर दिया था कि गैर जरूरी खर्चों में कटौती कर कर्मचारियों को कॉरपोर्ट सेक्टर से समतुल्य वेतन देने का प्रयास होना चाहिए। समाचार पत्र उद्योग में यह ज्यादा प्रासंगिक है। समाचार पत्र समूह करोड़ों रुपये मशीनरी और कार्यालय की साज सज्जा पर खर्च करते हैं, लेकिन वेतन किसी भी उद्योग के कर्मियों से कम भुगतान करते हैं। पालेकर और बछावत दोनों ने ही अवार्ड लागू होने के बाद की रिपोर्टों में मालिकानों के इस तर्क की धज्जियां उड़ा दी कि वेज बोर्ड लागू करना उनके लिए वित्तीय घाटे की बात होगी और तमाम अखबार बंद हो जाएंगे। रिपोर्टों से पाया गया कि सिफारिशें लागू होने के बाद उनका राजस्व 200 फीसदी तक बढ़ा। काशी पत्रकार संघ की मांग है कि समाचार पत्र समूह अपनी वार्षिक बैलेंस शीट में फिजिकल ऐसेट्स के साथ इंटिलेक्चुअल ऐसेट भी घोषित करें ताकि पता चल सके कि उक्त पत्र के संपादकीय विभाग में कर्मचारियों की संख्या कितनी है।

(यह पत्र उपलब्‍ध कराया है सोनभद्र के पत्रकार शिवदास ने)

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