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प्रो. विश्वनाथ मिश्र पर ब्राह्मणों ने गांव में घुसने पर पाबंदी लगा दी थी

रुद्रपुर : प्रख्यात लेखक, विचारक, अनुवादक, वामपंथी विचारों के पुरोधा और चर्चित पत्रिका ‘दायित्वबोध’ के पूर्व संपादक प्रो0 विश्वनाथ मिश्र के निधन पर यहां गांधी पार्क में एक बैठक आयोजित की गई जिसमें प्रो0 मिश्र के समाज हित में किए गये कार्यों का स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी गई. बैठक में कहा गया कि कमाई केन्द्रित होते जा रहे वाम बुद्धिजीवियों के बीच विश्वनाथ मिश्र की आजीवन सामाजिक और बौद्धिक सक्रियता नयी पीढ़ी के लिए आदर्श है. उनके द्वारा लिखा ‘विद्रोही वाल्मीकि’ नाटक काफी चर्चा और विवादों में रहा, तो उनके अनूदित उपन्यास 'आदि विद्रोही' को पढ़कर हजारों हिंदी भाषी युवा सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के वामपंथी विकल्प चुनने को तत्पर हुए. उन्होंने दर्जनों विश्वप्रसिद्ध साहित्य और राजनितिक पुस्तकों का अनुवाद किया, जिसके बदले आजीवन कोई मेहनताना नहीं लिया. उसी लेखकीय सक्रियता का असर था कि इन्टरनेट से दूर रहने वाले विश्वनाथ मिश्र ने गॉड पार्टिकल मुद्दे पर एक बेहद ही सरल भाषा में लोकप्रिय लेख लिखा.

रुद्रपुर : प्रख्यात लेखक, विचारक, अनुवादक, वामपंथी विचारों के पुरोधा और चर्चित पत्रिका ‘दायित्वबोध’ के पूर्व संपादक प्रो0 विश्वनाथ मिश्र के निधन पर यहां गांधी पार्क में एक बैठक आयोजित की गई जिसमें प्रो0 मिश्र के समाज हित में किए गये कार्यों का स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी गई. बैठक में कहा गया कि कमाई केन्द्रित होते जा रहे वाम बुद्धिजीवियों के बीच विश्वनाथ मिश्र की आजीवन सामाजिक और बौद्धिक सक्रियता नयी पीढ़ी के लिए आदर्श है. उनके द्वारा लिखा ‘विद्रोही वाल्मीकि’ नाटक काफी चर्चा और विवादों में रहा, तो उनके अनूदित उपन्यास 'आदि विद्रोही' को पढ़कर हजारों हिंदी भाषी युवा सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के वामपंथी विकल्प चुनने को तत्पर हुए. उन्होंने दर्जनों विश्वप्रसिद्ध साहित्य और राजनितिक पुस्तकों का अनुवाद किया, जिसके बदले आजीवन कोई मेहनताना नहीं लिया. उसी लेखकीय सक्रियता का असर था कि इन्टरनेट से दूर रहने वाले विश्वनाथ मिश्र ने गॉड पार्टिकल मुद्दे पर एक बेहद ही सरल भाषा में लोकप्रिय लेख लिखा.

विश्वनाथ मिश्र वामपंथी राजनीति से जुड़ने से पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहते थे. उसी दौरान उन्होंने ‘विद्रोही वाल्मिकी’ जैसा नाटक लिखा और मंचन कराया. इस नाटक के प्रकाशित और मंचित होने के बाद समाज के तथाकथित संस्कारी समाज ने उनका बहिष्कार किया. खासकर उनके गांव और इलाके के ब्राम्हणों ने उनसे पारिवारिक संबंध तोड़ लिये और उन पर कई बरस तक गांव आने पर पाबन्दी लगी रही.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के सहजौर गांव (राजिपार) के रहने वाले विश्वनाथ मिश्र को इलाके में विद्रोही विश्वनाथ के नाम से याद किया जाता था. एक समय में वह सामंती और ब्राम्हणवादी सांस्..तिक जकड़नों को तोड़ने के कारण चौक-चौराहों और गांवों की चौपालों पर चर्चा में हुआ करते थे. आज भी उनके क्षेत्र में जब कोई छात्र वामपंथी राजनीति से जुड़ता है तो संस्कारी लोग कहा करते हैं कि, ‘बाबू विश्नाथ मिसिर बनिहें.’

वैचारिक वामपंथी पत्रिका दायित्वबोध के संपादक रहे विश्वनाथ मिश्र ,पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के सह्जौर (रजिपार) चौराहा के रहने वाले थे और गोरखपुर के बड़हलगंज के नेशनल पीजी कॉलेज में ..षि विभाग के प्रमुख पद से कुछ वर्ष पहले सेवानिवृत हुए थे. सेवानिवृत्ति के बाद वह पारिवारिक जरूरतों के लिए होमियोपैथ के डाक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करने लगे थे. उनके परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा है. उनकी मौत से उनके परिजनों, वामधारा से जुड़े सैकड़ों लोगों और उनके छात्रों में गहरा शोक है.

विश्वनाथ मिश्र के करीबियों में शामिल रहे आदेश सिंह ने बताया कि, ‘वह चाहते थो दर्जनों पुस्तकें साहित्य, दर्शन, विज्ञान, समाज और ..षि पर लिख सकते थे, लेकिन उन्होंने बहुत कम किताबें लिखीं. वह प्रसिद्ध चीनी साहित्यकार लू शून को अपना आदर्श मानते थे और कहते थे कि नये समाज के निर्माण के लिए जो पुस्तकें देश और दुनिया में लिखीं जा चुकी हैं, उसको हिंदी पाठकों तक पहुंचाना मेरी पहली जिम्मेदारी है. इसी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए वह आजीवन अनुवाद करते रहे.’ गौरतलब है कि चीनी साहित्यकार लू शून ने भी कम्यूनिष्ट क्रांति के दौर में कई पुस्तकों का अनुवाद किया था.

उनके पारिवारिक मित्र सुनील चौधरी ने कहा कि, विश्नाथ मिश्र का जाना एक शिक्षक, एक साथी और एक दर्शंनशास्त्री का जाना है, जिसने कभी पद और पॉवर के लिए अपनी वैचारिकी से समझौता नहीं किया. वामबुद्धजीवियों के बीच बढ़ते लोभ-लालच के इस दौर में वह एक मात्र उदाहरण हैं, जिन्होंने सैकड़ों युवाओं को वाम राजनीति से जोड़ा. उनके जाने से पूर्वांचल के वाम राजनीति में कमी खलती रहेगी. गौरतलब है कि वामपंथ की जिस राजनीतिक धारा से वे जुड़े थे, उसको लेकर पिछले कुछ वर्षों से वे आलोचनात्मक हो गये थे. खासकर उन संगठनों के प्रयोगात्मक और व्यावहारिक कार्यवाहियों को लेकर. वह बार-बार शिकायत करते थे कि ये विचारधारा के बनिए हो गए हैं. मगर वह जीवनपर्यंत व्यापक वाम विचारधारा के समर्थन में रहे और अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं को खत्म करने के लिए वामपंथ को ही एकमात्र निर्णायक राजनीति मानते थे.  उन्होंने जिन किताबों का अनुवाद किया था, उनमें तरुणाई का तराना, क्रांति का विज्ञान, शहीदे आजम भगत सिंह की जेल नोटबुक आदि हैं।

बैठक में में अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, कस्तूरीलाल तागरा, खेमकरण ‘सोमन’, रूपेश कुमार सिंह, प्रह्लाद सिंह कार्की, प्रकाश भट्ट, नरेश कुमार, दीपिका भारती, स. गुरुचरन सिंह, अन्जार अहमद, कमला बिष्ट, राजेश प्रधान, शिवजी धीर, दिनेश कुमार, मा. प्रताप सिंह, संजय रावत, गिरीश भट्ट, दीप पाठक, अरविंद कुमार सिंह, विमल शर्मा, देवेंद्र दीक्षित आदि शामिल थे.

रुद्रपुर से खेमकरण ‘सोमन’ की रिपोर्ट.

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