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‘फंड्री’ दलित सिनेमा का उत्सव है

पिछले हफ्ते समय निकाल ‘फंड्री’ देखने गया था. चेम्बूर के एक सिंगल स्क्रीन थिएटर ‘अमर’ में “लास्ट डे – लास्ट शो” देखा. यहाँ चालीस रूपए में बालकनी का टिकट मिल जाता है. फंड्री  की स्क्रीनिंग के दौरान थिएटर में जो जोश भरा माहौल था वह बस अनुभव ही किया जा सकता है. मेरा एक दोस्त चेम्बूर के एक मल्टीप्लेक्स में इस फिल्म को देखने गया था. वहाँ की टिकट डेढ़ सौ रूपए से कम की नहीं आती. साथ ही वहाँ का दर्शक वर्ग भी मुख्यतः अमीर-सवर्णों का ही था जो फिल्म के गंभीर दृश्यों के दौरान भी अपनी जाति की समझ के अनुसार ठहाके लगा कर हँसना नहीं भूलता था.

पिछले हफ्ते समय निकाल ‘फंड्री’ देखने गया था. चेम्बूर के एक सिंगल स्क्रीन थिएटर ‘अमर’ में “लास्ट डे – लास्ट शो” देखा. यहाँ चालीस रूपए में बालकनी का टिकट मिल जाता है. फंड्री  की स्क्रीनिंग के दौरान थिएटर में जो जोश भरा माहौल था वह बस अनुभव ही किया जा सकता है. मेरा एक दोस्त चेम्बूर के एक मल्टीप्लेक्स में इस फिल्म को देखने गया था. वहाँ की टिकट डेढ़ सौ रूपए से कम की नहीं आती. साथ ही वहाँ का दर्शक वर्ग भी मुख्यतः अमीर-सवर्णों का ही था जो फिल्म के गंभीर दृश्यों के दौरान भी अपनी जाति की समझ के अनुसार ठहाके लगा कर हँसना नहीं भूलता था.

फंड्री देखने पर ऐसा लगता है जैसे कि सिनेमा के पर्दे पर दलित साहित्य सजीव हो गया हो. ‘फंड्री’ महाराष्ट्र के एक दलित समुदाय ‘कैकाडी’ द्वारा बोले जाने वाली बोली का शब्द है जिसका अर्थ सूअर होता है. फ़िल्म में सूअर को छुआछूत के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है जहाँ सवर्णों ने यह तय कर दिया है कि किस तरह के जानवर और आदमी ‘शुद्ध’ या ‘अशुद्ध’ हैं. फ़िल्म के निर्देशक नागराज मंजुले फंड्री को अपने जीवन की कहानी बताते है. फंड्री में ओमप्रकाश वाल्मीकि का “झूठन” भी दिखता है. फंड्री उन सभी दलितों की कहानी है जिन्हें जाति की वजह से सवर्णों के अत्याचार सहने पड़े हैं. फंड्री इस कहानी को कहने में कहीं भी जरुरत से ज्यादा मेलोड्रामटिक नहीं होता और ना ही फ़िल्म में दलितों पर होने वाले अत्याचारों के सनसनीखेज वीभत्स दृश्यों को दिखाने की जरुरत पड़ी है.

फ़िल्म एक दलित लड़के जामवंत उर्फ़ जब्या (सोमनाथ अवघडे) की कहानी है जो किशोरवय का है और अपनी कक्षा में पढ़ने वाली एक उच्च जाति की लड़की शालू (राजेश्वरी खरात) से प्यार कर बैठा है. जब्या एक काली चिड़िया की तलाश में है जो दुर्लभ है और जिसके पीछे मान्यता है कि चिड़िया को जलाकर उसके राख को किसी पर भी छिड़क देने से उसे मोहित किया जा सकता है. फ़िल्म 14 फरवरी को महाराष्ट्र में रिलीज़ हुई थी.

इस फ़िल्म को बस एक प्रेम-कहानी मान लेने की भूल नहीं करनी चाहिए. यह फ़िल्म एक दलित के प्यार के सामाजिक यथार्थ को दिखाती है. फ़िल्म गहरे सामाजिक-राजनीतिक अर्थ रखती है. फ़िल्म में ऐसे बहुत से दृश्य हैं जो बहुत ही प्रभावशाली हैं. वह चाहे पृष्ठभूमि में दिख रही स्कूल की दीवारों पर बनी अम्बेडकर और सावित्रीबाई फुले की तस्वीरें हो या कक्षा में अंतिम पंक्ति में बैठने को मज़बूर दलित बच्चे. अपने घर की दीवार पर ‘शुभ विवाह’ लिख रहा जब्या का परिवार हो या फिर स्कूल में डफली बजा रहा जब्या या फिर वह दृश्य जहाँ जब्या का परिवार सूअर उठाकर ले जाता रहता है और पृष्ठभूमि में दीवार पर दलित आन्दोलनों से जुड़े सभी अगुआ नेताओं की तस्वीरें होती हैं. ये मोंटाज उस यथार्थ को दर्शाता है कि इतनी लड़ाई और इतने साल गुजर जाने के बाद भी दलितों की स्तिथि में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है.

इस फिल्म का एक दृश्य मेरे लिए ख़ास अहमियत रखता है जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता. जब्या स्कूल जाने की जगह गाँव के सवर्णों के आदेश पर अपने परिवार के साथ सूअर पकड़ रहा होता है. तभी अचानक स्कूल में राष्ट्र-गान बजना शुरू हो जाता है. राष्ट्र-गान सुनकर पहले जब्या स्थिर खड़ा हो जाता है और फिर उसका पूरा परिवार. फ़िल्मकार ने यह दृश्य बहुत ही प्रभावशाली बनाया है जो हमारे भारतीय सिनेमा के सबसे महत्वपूर्ण दृश्यों में से एक है. इस दृश्य के गहरे राजनीतिक अर्थ हैं कि कैसे हमारा शासक वर्ग राष्ट्रीय प्रतीकों और एक कल्पित राष्ट्र के सिद्धांत के बल पर देश के वंचित तबकों को बेवकूफ बनाकर रखे रहता है. फ़िल्म का क्लाइमेक्स शायद इस जंजीर को तोड़ता है. फंड्री का क्लाइमेक्स बहुत ही गैर-परंपरागत क्लाइमेक्स है जिसका लोग अपने हिसाब से अलग-अलग संभावनाएँ सोच सकते हैं.

फ़िल्म में नागराज मंजुले का भी एक किरदार है जिसका नाम चाणक्य है. फ़िल्म में उसे एक साइकिल की दुकान चलाते हुए देखा जा सकता है जो जब्या के प्रति सहानुभूति रखता है. चाणक्य को लोग बदमाश समझते है और जब्या का बाप भी उसे चाणक्य से दूर रहने को कहता है. फ़िल्म में एक जगह गाँव के एक मेले में जब्या नाचने की कोशिश करता है ताकि वह शालू पर अपना प्रभाव जमा सके. इस दौरान जब सवर्ण उससे धक्कामुक्की कर उसे बाहर कर रहे होते है तब चाणक्य बेधड़क नाचते हुए भीड़ में घुसकर जब्या को बचाता है. फ़िल्म में यह घटना लोगों को भले ही छोटी लगे लेकिन देश में मेलों-त्योहारों के समय दलितों का पिटना आम बात होती है.

फंड्री सच्चे अर्थों में एक नव-यथार्थवादी फिल्म है जहाँ एक दलित फ़िल्मकार बिना भव्य-नकली सेटों की मदद के असली लोकेशन पर फ़िल्म शूट करता है. फ़िल्म में जब्या के बाप का किरदार कर रहे किशोर कदम को छोड़कर लगभग सभी किरदार नए हैं. सोमनाथ कोई मंझा हुआ अभिनेता नहीं है बल्कि महाराष्ट्र के एक गाँव का दलित लड़का है जो अभी कक्षा 9 में पढ़ा रहा है वहीं उसके दोस्त पिरया का किरदार कर रहा सूरज पवार सातवीं कक्षा का छात्र है. फिल्म अंग्रेजी सबटाइटल्स के साथ रिलीज़ हुई है. फिल्म मराठी में है लेकिन कई जगह दलित कैकाडी समुदाय की मराठी बोली का भी प्रयोग किया है. अभी तक मराठी फिल्म निर्माण में सवर्णों का ही दबदबा रहा है. कुछ लोग व्यंग्य से कह रहे हैं कि फंड्री और इसकी भाषा ने मराठी फिल्मों की ‘शुद्धता’ को ‘अपवित्र’ कर दिया है.

फ़िल्म में सोमनाथ सहित दूसरे सभी किरदारों का अभिनय बहुत ही स्वभाविक रहा है. फ़िल्म में जब्या और उसका दोस्त पिरया अभिनय करते नहीं बल्कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जीते दिखते हैं. फिल्म में सोमनाथ ने डफली बजायी है और उसे वाकई डफली बजाना आता भी है. दरअसल फिल्मकार की मुलाक़ात सोमनाथ से भी तब ही हुई थी जब वह अपने गाँव के एक कार्यक्रम में डफली बजा रहा था. फंड्री में कैमरा और साउंड का काम भी बेहतरीन रहा है. फ़िल्म देखते वक्त लगेगा कि आप वास्तव में जब्या के गाँव पहुँच गए है. नागराज मंजुले ने इससे पहले एक शार्ट फ़िल्म ‘पिस्तुलिया’ बनायी थी जिसे कई पुरस्कार मिले थे. फंड्री ने कमर्शियल सिनेमा के दायरे में रहकर भी बेहतरीन काम किया है. नागराज मंजुले का कहना कि जब तक अलग-अलग समुदाय, खासकर वंचित समुदाय के लोगों को फ़िल्म इंडस्ट्री में जगह नहीं मिलेगी तब तक हमारा सिनेमा हमारे समाज का सही मायने में प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा. पिछले कुछ सालों में आए हिंदी के कथित प्रयोगधर्मी फिल्में फंड्री के आगे पानी भरते दिखती हैं.

पिछले दिनों अपने एक पत्रकार साथी से इस फिल्म पर बातें हो रही थी. साथी का कहना था कि हिंदी सिनेमा के जो कथित प्रयोगधर्मी फिल्मकार हैं उनकी फ़िल्में कभी इस ओर नहीं जा पाती हैं और वे फ़िल्मकार सामंती भावना को तृप्त करने में ही लगे रहते हैं. वाकई अगर देखा जाए तो इन कथित प्रयोगधर्मी फिल्मकारों की फिल्मों से दलित-आदिवासी गायब होते हैं और अगर कहीं होते भी हैं तो उनका चित्रण मनमाने ढंग से किया जाता है. इनकी फ़िल्में जातिवादी दंभ और सामंतवाद का जश्न मनाती है. गैंग-वार और अपराध कथाएँ ही इनकी सीमा है और वहाँ भी वे हॉलीवुड से चुराए गए फ़ॉर्मूले ही इस्तेमाल करते हैं.

अभी देश के एक दूसरे हिस्से से आने वाले दलित दशरथ माँझी पर ‘माउंटेनमैन’ के नाम से एक फ़िल्म बनायी जा रही है. जाहिर है कि फ़िल्मकार एक सवर्ण है. फ़िल्म की पटकथा को सुधार रहे एक पटकथा लेखक से कुछ समय पहले बात हुई थी. उनसे बात कर पता चला कि फ़िल्मकार के तरफ़ से दशरथ माँझी के चरित्र को जानबूझकर आक्रमक दिखाए जाने और कहानी को मसालेदार बनाने की कोशिश की जा रही है. ‘बैंडिट क्वीन’ का शेखर कपूर ने क्या हश्र किया था वह सबको पता है. ‘बैंडिट क्वीन’ में बलात्कार के दृश्यों का इस्तेमाल फ़िल्म को सनसनीखेज बनाने के लिए किया गया था. फ़िल्म बनाने के बाद निर्देशक ने फुलन देवी को फ़िल्म दिखा उनकी रजामंदी लेने की जरुरत भी नहीं समझी. यही हाल भंवरी देवी पर बनी ‘बवंडर’ का भी हुआ था. ये सवर्ण फ़िल्मकार, दक्षिण भारत के एक डाक्यूमेंट्री फ़िल्मकार के हालिया फिल्म के शीर्षक को अपने लिए सन्देश समझ सकते हैं – “डोंट बी आवर फादर्स”!

फंड्री अब देश के कुछ मुख्य शहरों में प्रदर्शित होने वाली है. पीवीआर इस शुक्रवार, 28 फरवरी को इसे देश के सात शहरों दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलौर, इंदौर, अहमदाबाद और बड़ौदा में रिलीज़ कर रहा है. फंड्री दलित सिनेमा का उत्सव है! फंड्री सच्चे अर्थों में लोगों का सिनेमा है जिसकी हमारे समय में बहुत जरूरत है…

अतुल, रांची से जनसंचार में स्नातक करने के बाद अभी टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS), मुंबई से मीडिया में स्नातकोत्तर कर रहे है.इनसे संपर्क का पता है- [email protected]
 

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