Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

फिर भी यह देश चल रहा है, यह तो चमत्कार ही है न!

यह स्थिति सिर्फ़ कुछ राज्यों, कुछ जगहों पर ही नहीं है. कुछेक अपवाद छोड़ दें, तो जो जहां ताकतवर है, उसी का दबदबा है. नक्सली लोगों का अलग भय है. एक सामान्य आदमी कैसे जीये? वह राज्य सत्ता को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बड़ा कर देता है. इस मंहगाई में अपना पेट काट कर सरकार चलाने का भारी भरकम खर्च उठाता है, पर उसी आम आदमी का जीवन बंधक है और सरकारें मूकदर्शक. क्या देश की रातनीति में यह सवाल मूल एजेंडा है? क्यों अशासित है देश?

यह स्थिति सिर्फ़ कुछ राज्यों, कुछ जगहों पर ही नहीं है. कुछेक अपवाद छोड़ दें, तो जो जहां ताकतवर है, उसी का दबदबा है. नक्सली लोगों का अलग भय है. एक सामान्य आदमी कैसे जीये? वह राज्य सत्ता को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बड़ा कर देता है. इस मंहगाई में अपना पेट काट कर सरकार चलाने का भारी भरकम खर्च उठाता है, पर उसी आम आदमी का जीवन बंधक है और सरकारें मूकदर्शक. क्या देश की रातनीति में यह सवाल मूल एजेंडा है? क्यों अशासित है देश?

वर्षो पहले एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र ने एक किस्सा सुनाया. नब्बे के दशक में एक रूसी पत्रकार भारत आये. प्रख्यात. अनीश्वरवादी, घोर साम्यवादी. भारत भ्रमण पर आये थे. लौटने लगे, तो लोगों ने उनके अनुभव पूछे. उनका जवाब था, भारत की धरती पर उतरा, तो अनीश्वरवादी था. भारत घूमने के बाद ईश्वरवादी हो गया. पूछा गया कैसे? कहा कि इस देश को देखने के बाद यही लगा कि इसे ईश्वर ही चला रहा है. प्रशासन, हुकूमत या राज्य व्यवस्था अधिसंख्य जगहों पर अनुपस्थित है. फिर भी यह देश चल रहा है, यह तो चमत्कार ही है न!

प्रशासन-शासन अनुपस्थित, फ़िर भी मुल्क चले, यह कैसे संभव है? फ़िर उस अनुभवी रूसी पत्रकार का जवाब था, यह तो अदृश्य ताकतों या ईश्वर का चमत्कार है. इस प्रसंग के बाद भारत के संदर्भ में, मैं ईश्वरवादी हो गया हूं. यह टिप्पणी थी उस रूसी पत्रकार की.भारत के राजकाज को गंभीरता से परखनेवालों को लगता है कि आज तो स्थिति अगणित गुना बदतर है, फि र भी मुल्क चल रहा है.

मणिपुर में 100 दिनों से बंद है. इस बंद के परिणाम स्वरूप रसोई गैस प्रति सिलिंडर 1600 रुपये में बिक रही है. पेट्रोल-डीजल प्रति लीटर 140-180 रुपये मे. आलू 40 रुपये. प्याज 60 रुपये किलो. जीवन रक्षक दवाइयां गायब हैं. अस्पताल बंद हैं. इससे पहले भी एक बार 53 दिनों का बंद रहा. फ़िर 39 दिनों का. सब जोड़ दें, तो इस अंचल में बंद जीवन का स्थायी हिस्सा है. जरूरी समानों के लिए लोग चार-चार किलोमीटर लाइन लगा कर खड़े हैं. फ़िर भी लोग कहते है कि इस देश में सरकार है, शासन है और देश चल रहा है?

यह स्थिति सिर्फ़ उत्तर पूर्व की नहीं है, तेलंगाना में भी यही हालात हैं. सड़कें बंद, विजयवाड़ा हाइवे बंद. कई सौ लोगों का आत्मदाह. कॉलेज बंद. यूनिवर्सिटी बंद. दुकाने बंद. बड़े संस्थान बंद. तेलंगाना आंदोलन के कारण हैदराबाद से पूंजी भाग रही है. छात्र भाग कर कर्णाटक व अन्य राज्यों में नामांकन ले रहे है. कई बार पुलिस फ़ायरिंग हो चुकी है. न जाने कितने लोग मरे. आंदोलन करने वाले निर्भय हैं. आग उगलते हैं. किसी को कोई सरोकार नहीं. सब मूकदर्शक हैं. जीवन स्थगित है. बाजार, शिक्षा, कारोबार, व्यापार बंधक है.ऐसे हालात हैं, देश में.

सवाल उठता है कि इस देश को चलाने का मूल जिम्मा किसका है? केंद्र सरकार का ही न! क्या कोई कुछ कह रहा है? पूछ रहा है कि केंद्र सरकार ऐसे मसलों पर क्या कर रही है? क्या इस देश की संसद मूल सवालों को उठा रही है? इस अनिर्णय की स्थिति से क्या करोड़ों-अरबों लोगों का जीवन बंधक बन रहा है? इसके लिए जवाबदेह कौन है?यह स्थिति सिर्फ़ कुछ राज्यों, कुछ जगहों पर ही नहीं है. कुछेक अपवाद छोड़ दें, तो जो जहां ताकतवर है, उसी का दबदबा है. नक्सली लोगों का अलग भय है. एक सामान्य आदमी कैसे जीये? वह राज्य सत्ता को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बड़ा कर देता है.

इस मंहगाई में अपना पेट काट कर सरकार चलाने का भारी भरकम खर्च उठाता है, पर उसी आम आदमी का जीवन बंधक है और सरकारें मूकदर्शक. क्या देश की रातनीति में यह सवाल मूल एजेंडा है? क्यों अशासित है देश?पिछले दिनों विप्रो के चैयरमैन अजीम प्रेमजी ने (टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 1.11.11) साहस के साथ कहा, ‘द कंपलीट एबसेंस ऑफ़ डिसीजन मेकिंग इन द गर्वमेंट इज बिगेस्ट कनसर्न फ़ार द कंट्री’ (सरकार में पूरी तरह अनिर्णय की स्थिति होना देश के लिए सबसे गंभीर विषय है).

पत्रकारों का सवाल था कि इस देश की सबसे बड़ी चिंता कौन-सी है?
इस पर अजीम प्रेमजी ने कहा कि सरकार के नेताओं में नितांत अनिर्णय की स्थिति है. उन्होंने पत्रकारों से कहा, ‘इफ़ प्राम्ट एक्शन इज नाट टेकेन, द कंट्री विल फ़ेस ए सेटबैक. यू मस्ट एप्रीसीयेट, हाउ सीरियस इट इज?’ (अगर तत्काल कदम नहीं उठाये गये, तो देश को भारी नुकसान होगा. आपको यह समझना या जानना होगा कि यह मामला कितना गंभीर है).

एक उद्यमी या उद्योगपति आमतौर से न सरकार को नाखुश रखना चाहता है, न कटु और अलोकप्रिय बात करता है. उद्यमी तो अत्यंत निराशा के माहौल में भी अपने काम में रमे रहते हैं. अपनी आस्था के कारण वे मानते है कि विपरीत परिस्थिति में भी श्रम और कर्म ही रास्ते हैं. जब स्थिति भयावह हो, तभी कोई उद्यमी सरकार के खिलाफ़ मुंह खोलने का साहस करता है.कुछ ही दिनों पहले महेंद्रा और महेंद्रा के केशव महेंद्रा और एचडीएफ़सी के दीपक पारीख व अन्य महत्वपूर्ण उद्योगपतियों-उद्यमियों ने राष्ट्रीय नेताओं को खुला पत्र लिखा था. सरकार की प्रशासनिक कमियों पर चिंता प्रकट करते हुए. गर्वनेंस डेफ़िसिट की बात.

उन्होंने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार देश के तानेबाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है. इस समूह ने साहस किया और कहा, कारपोरेट जगत के कुछ बड़े लोगों, नौकरशाहों और सत्ता के दलालों के बीच गंठबंधन इस देश के लिए सबसे खतरनाक है. पर कोई सुननेवाला है, इस मुल्क में?कोई जिम्मेदार या गंभीर व्यवस्था या सरकार होती, तो वह मणिपुर, तेलंगाना या देश के अन्य जगहों पर अशासन की स्थिति पर निर्णायक कदम उठाती. आर या पार. परिस्थितियों के भरोसे हालात को नहीं छोड़ा जा सकता. अगर यही अराजकता रहती है, तो फ़िर सरकार, नियम कानून और संविधान की क्या जरूरत है?

पर हो क्या रहा है? पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि हुई, तो ममता बनर्जी ने धमकी दी, समर्थन वापसी का. फ़िर सूचना आयी कि केंद्र सरकार बंगाल को विशेष पैकेज देगी. ममता जी चुप हैं. पंजाब में चुनाव होनेवाले हैं इसलिए वहां भी बड़ा पैकेज देने की तैयारी है. केरल में कांग्रेस समर्थित सरकार है, वहां भी राहत देने की बात चल रही है. पर, जिस बिहार और झारखंड के साथ आजादी के बाद से ही भेदभाव हुआ, उनकी मांगों पर कोई चर्चा ही नहीं. क्या केंद्र की राजनीति निष्पक्ष और तटस्थ होनी चाहिए या पक्षपाती? फ़िर संघीय एकता का क्या होगा?

10 नवंबर 2011 की एक और महत्वपूर्ण खबर है. (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) उत्तराखंड़ के मुख्यमंत्री बी.सी. खंड़ूरी ने प्रधानमंत्री को विरोध जताया है. वहां 10 नवंबर 2011 को ऋषिकेश-कर्ण प्रयाग रेल परियोजना की शुरूआत हुई. चमोली जिले के पहाड़ी इलाके में. 125 किलोमीटर लंबी रेल लाइन की शुरुआत सोनिया गांधी को करनी थी. पर, अस्वस्थ होने के कारण वह नहीं आयीं. उनकी जगह रक्षा मंत्री ए.के. एंटोनी गये. रेलमंत्री दिवेश त्रिवेदी भी थे. मुख्यमंत्री बी.सी.खंड़ूरी ने कहा, इस कार्यक्रम में उत्तराखंड राज्य सरकार को आमंत्रित नहीं किया गया.

मुख्यमंत्री ने गिनाया कि अपने साथी भगत सिंह कोसियारी के साथ मिल कर मैंने ने इस रेल परियोजना को मुकाम तक पहुंचाने में क्या-क्या किया है? संसद में व उसके बाहर भी. इसके बाद मुख्यमंत्री ने बड़ा सवाल उठाया कि एक राज्य में केंद्र सरकार अपने ढंग से योजनाओं का शिलान्यास और राजनीति करे और राज्य मूकदर्शक रहे, क्या यह सही है? बी.सी.खंड़ूरी ने प्रधानमंत्री से यह सवाल पूछा है? क्या इससे केंद्र और राज्य के संबंधों पर असर पड़ेगा या नहीं? उत्तराखंड सत्ताधारी दल की प्रतिक्रिया है कि केंद्र, गैर कांग्रेसी राज्यों में राजनीति करता है, क्या इससे भारत की एकता सुदृढ़ होगी? यह स्वस्थ व सही परंपरा है? संघीय स्वरूप में केंद्र की यह भूमिका जायज है?

ये और ऐसी अनेक घटनाओं को देखने के बाद क्या आपको यकीन नहीं होगा कि यह मुल्क अगर चल रहा है, तो इसका श्रेय किसको हरिवंशहै? सरकार को ? या व्यवस्था को? या कानून को ? या परिस्थितियों को? या फ़िर भगवान को?

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के सबसे बड़े हिंदी अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...