Manisha Pandey : लड़कियों के लिए फेसबुक पर अपनी पुरानी स्कूल और कॉलेज की दोस्तों को खोजना आसान नहीं। मैं कई बार फेसबुक पर उन पुरानी सहेलियों को खोजने की कोशिश करती हूं, जो मेरे साथ स्कूल में पढ़ती थीं। जिनके साथ मैंने एक्खट-दुक्खट खेली है, क्लास में मुर्गा बनी हूं, शैतानी करने पर कान पकड़कर खड़ी रही हूं, एक-दूसरे का टिफिन चुराकर खाया है, टेंथ क्लास में चुपके से एक-दूसरे के कान में बताया है कि देखो, आज मैंने भी शमीज के नीचे ब्रा पहनी है। लाइफ की फर्स्ट ब्रा और फर्स्ट पीरियड्स का सीक्रेट चुपके से शेयर किया है। मैं आज भी कई बार उन सहेलियों को फेसबुक पर ढूंढा करती हूं।
सर्च पीपुल वाले कॉलम में लिखती हूं – Ruchi Khosla. कई नाम आते हैं, लेकिन वो इनमें से कोई नहीं। फिर लिखती हूं Ruchi Khosla Allahabad। वह तब भी नहीं मिलती। फिर लिखती हूं Ruchi Khosla Allahabad University। तब भी नहीं। सारे कीवर्ड डाल देती हूं, लेकिन रुचि नहीं मिलती। ऐसे ही जाने कितनी सहेलियां नहीं मिलतीं, अपने-अपने नामों से। कविता शर्मा को ढूंढ-ढूंढकर थक गई। गुंजन शुक्ला को भी, लेकिन मिली नहीं। फिर एक दिन मां ने बताया कि अरे, गुंजन की शादी हो गई। उसका नाम अब गुंजन मिश्रा है। इस नाम से ढूंढो। ढूंढा और वह मिल भी गई।
गुंजन तो मिल गई, लेकिन बाकियों का क्या। मुझे क्या मालूम कि अब मेरी सारी सहेलियों के क्या-क्या नाम है। मैं तो उन्हें उसी नाम से जानती हूं, जिसके साथ वह पैदा हुई थीं। जो नाम स्कूल में लिखे गए थे। जो नाम उनकी पहचान थे। जो उनका अपना नाम था। मुझे क्या मालूम था कि एक दिन उन सबके नाम बदल दिए जाएंगे और नामों के साथ उनकी पहचान भी। वह इस तरह बदल जाएंगी कि फेसबुक पर भी नहीं मिल पाएंगी खोई हुई सहेलियां।
इंडिया टुडे हिंदी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.






