नोएडा। बिगुल मज़दूर दस्ता सहित कई जनसंगठनों ने नोएडा पुलिस द्वारा मज़दूर नेता तपीश मैन्दोला तथा 6 आम नागरिकों को अवैध रूप से हिरासत में रखने की कड़ी निन्दा की है। अवैध हिरासत के विरुद्ध आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका भी दायर की जा रही है। दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन के अजय स्वामी ने बताया कि 27 फरवरी की शाम नोएडा पुलिस के 10-12 लोग दो बोलेरो गाडि़यों में भरकर गाजियाबाद में नवीन प्रकाश के डीटीपी सेंटर में आए और उन्हें व उनके कर्मचारी राजू को जोर-जबर्दस्ती अपने साथ ले गए।
उन्होंने नवीन को बाध्य किया कि वे बिगुल मजदूर दस्ता के कार्यकर्ता तथा अपने सामाजिक मित्र तपीश मैन्दोला को फोन करके वहां बुलाएं और जैसे ही तपीश वहां पहुंचे, पुलिस ने उन्हें दबोच लिया। वहां मौजूद लोगों को यह बताए बिना कि उन्हें कहां ले जाया जा रहा है, पुलिस वाले इन तीनों को अपने साथ ले गए। तीनों में से किसी को फोन नहीं करने दिया गया और उनके फोन भी छीन कर बंद कर दिए गए।
अगले दिन सुबह पता चला कि उन्हें नोएडा के सेक्टर 58 पुलिस स्टेशन में रखा गया है और बीती रात से ही उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जा रहा है। इतना ही नहीं, कल सुबह थाने में एसएचओ से मिलने गये नागरिकों के एक प्रतिनिधिमंडल के चार सदस्यों को भी पुलिस ने हवालात में बंद कर दिया। इनमें दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र सनी सिंह, गजेंद्र, साफ्टवेयर कर्मी ज्ञानेंद्र ओझा और बिगुल मजदूर दस्ता के प्रमोद कुमार शामिल हैं। तपीश के साथ हिरासत में लिए गए दो नागरिक उनके सामाजिक मित्र हैं, जिन्हें पुलिस ने केवल इसलिए पकड़ लिया है क्योंकि उन्होंने तपीश को वह सिम कार्ड दिलाने में मदद की थी, जिसका नंबर संपर्क सूत्र के रूप में पर्चे पर दिया गया है। पुलिस कर्मियों ने खुद ही बताया कि यह नंबर पिछले कुछ समय से पुलिस द्वारा (अवैध रूप से) निगरानी में था!
पुलिस ने अब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ ना कोई प्राथमिकी दर्ज की है और ना ही कोई आरोप लगाया है। पुलिस बस यही कह रही है कि तुम लोग मजदूरों को हिंसा के लिए भड़का रहे हो, इसलिए हम तुम्हें रासुका के तहत बंद करेंगे। आज यहां हुई विभिन्न जनसंगठनों की आपात बैठक में कहा गया है कि पुलिस बेवजह सनसनी का माहौल पैदा कर रही है। 1 मार्च को हड़ताल के बारे में अफवाहें फैलाई जा रही हैं जबकि किसी भी संगठन ने ऐसा कोई आह्वान नहीं किया है।
‘बिगुल मजदूर दस्ता’ 23 फरवरी से ही नोएडा के विभिन्न इलाकों में नुक्कड़ सभाएं करके पर्चा वितरण कर रहा है जिसमें कहा गया है कि 21-22 फरवरी की हड़ताल के दौरान हुई हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं नोएडा के दसियों लाख मजदूरों में व्याप्त गुस्से और हताशा की परिचायक हैं, जिन्हें उनके बुनियादी अधिकार तक नहीं दिए जा रहे हैं। पर्चे में कहा गया है कि गुस्से का अराजक विस्फोट समस्या का समाधान नहीं है और मजदूरों को चाहिए कि वे खुद को क्रांतिकारी यूनियनों और राजनीतिक संगठनों में संगठित करें ताकि वे पूंजीवादी शोषण और शोषकों की मैनेजिंग कमेटी की तरह काम करने वाली राज्यसत्ता के खिलाफ संगठित संघर्ष कर सकें। मगर पुलिस की ओर से बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं कि पर्चे में मजदूरों को हिंसा और हड़ताल के लिए भड़काया गया है।
21-22 फरवरी की घटनाओं में शामिल होने के आरोप में पुलिस नोएडा में 200 से ज़्यादा मज़दूरों को गिरफ़्तार कर चुकी है। मज़दूरों का कहना है कि मिलमालिक मनमाने तरीके से मज़दूरों के नाम पुलिस को दे रहे हैं और बिना किसी जांच के पुलिस उन्हें घरों से उठाकर ले जा रही है। बैठक में कहा गया कि यह स्पष्ट है कि हमेशा की तरह पुलिस इस मामले में भी नोएडा के कारखाना मालिकों के इशारे पर काम कर रही है जो बुनियादी श्रम कानूनों को भी अपने पैरों तले रखते हैं और विरोध के हर स्वर को कुचलने पर आमादा हैं। यदि सभी व्यक्तियों को अविलम्ब रिहा नहीं किया गया तो विभिन्न जनसंगठन नोएडा तथा दिल्ली में इसके खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। बैठक में बिगुल मजदूर दस्ता, दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन, करावलनगर मजदूर यूनियन, जागरूक नागरिक मंच, स्त्री मज़दूर संगठन, दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ता तथा अन्य व्यक्ति शामिल थे।
इधर, चारों ओर से पड़े दबाव के बाद पुलिस ने आज रात सातों व्यक्तियों को सिटी मजिस्ट्रेट के कोर्ट में पेश किया। उन पर शांति भंग की धारा लगाई गई थी। छह लोगों को तो निजी मुचलके पर छोड़ दिया गया लेकिन तपीश मैन्दोला को सिटी मजिस्ट्रेट के सामने अलग से ले जाया गया, जिसने आते ही माफ़ी मांगने के लिए कहा। जब तपीश ने कहा कि जब मैंने कुछ किया ही नहीं है तो माफ़ी किस बात की मांगूं। इस पर मजिस्ट्रेट के आदेश पर उन्हें हथकड़ियां लगाकर अदालत के भीतर ले जाया गया जहां उनके साथ मारपीट भी की गई। लेकिन बाद में, देर रात उन्हें भी छोड़ दिया। (प्रेस रिलीज)






