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फैजाबाद

फैजाबाद छावनी में उस फौजी अधिकारी की ‘अमानवीयता’!

Chandan Srivastava : कुछ दस साल पुरानी बात होगी. वो फैज़ाबाद का छावनी क्षेत्र था. आदत के मुताबिक मैंने हेलमेट नहीं लगाया था, उस पर तुर्रा ये कि सड़क की एक मोड़ पर बाइक का हार्न भी बजाए जा रहा था. सामने से आ रही हरे रंग की जिप्सी से हाथ निकालकर मुझे रुकने का इशारा किया गया.

Chandan Srivastava : कुछ दस साल पुरानी बात होगी. वो फैज़ाबाद का छावनी क्षेत्र था. आदत के मुताबिक मैंने हेलमेट नहीं लगाया था, उस पर तुर्रा ये कि सड़क की एक मोड़ पर बाइक का हार्न भी बजाए जा रहा था. सामने से आ रही हरे रंग की जिप्सी से हाथ निकालकर मुझे रुकने का इशारा किया गया.

जिप्सी से उतरे उस फौजी अधिकारी ने बिना कुछ बोले अपनी उंगलियों के इशारे से मुझे एक बोर्ड दिखाया, जहां लिखा था- "हॉर्न बजाना मना है". मैंने कहा- "सॉरी सर, ध्यान नहीं गया". उसने कहा "और हेलमेट कहां है?" मैंने सिम्पैथी गेन करने के लिहाज से कहा- "वो सर एक अंतिम संस्कार से लौट रहा हूं. ऐसी जगहों पर जाने में हेलमेट का ध्यान किसे रहता है".

उस अधिकारी ने अपने एक जवान को आदेश दिया- "बाईक के एक पहिए की हवा निकाल दो". मैनें कहा "अरे सर बहुत दूर तक बाईक खींचनी पड़ेगी, प्लीज सर!! आय एम रियली सॉरी". उसने बाईक की चाभी निकाल ली, कहा- ठीक है, जाओ.

इसके आगे मैंने एक शब्द नहीं बोला. दो कारण थे. पहला मेरी बाईक किसी भी चाभी से ऑन हो जाती थी. लेकिन दूसरा कारण था कि वो कोई पुलिस का दरोगा नही, फौज का अधिकारी था. अनुशासन उसकी सबसे बड़ी कुंजी है, ये मैं जानता था. अब अगर मैं सोचूं कि मेरी इतनी छोटी सी गलती के लिए वो मुझे माफ कर सकता था. उसने मुझे माफ नहीं किया इसका मतलब फौज के लोग कितने अमानवीय होते हैं, उनमें क्षमाभाव बिल्कुल नहीं होता तो आप मुझे मूर्ख ही तो कहोगे.

पत्रकार चंदन श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.
 

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