: अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पा रही भाजपा सरकार : उत्तराखंड में रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा की गई भ्रष्टाचार की गंदगी साफ करने के लिए भाजपा ने बीसी खंडूरी को कमान दी. बिल्ली के भाग्य से टूटे छींके के सहारे एक बार फिर सीएम की कुर्सी पर बैठे खंडूरी जमकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का ऐलान किया. लोकायुक्त कानून बनाकर वाहवाही भी लूटी. पर इस रिटायर्ड फौजी के दिखाने के दांत कुछ और खाने के दांत कुछ और हैं. अब असलियत सामने आने लगी है. निशंक ने जिस जगह भ्रष्टाचार को छोड़ा था अब खंडूरी उसी जगह से उठाकर चलने लगे हैं. निशंक से दो कदम आगे बढ़कर खंडूरी अब मीडिया को अपने मायावी हुनर से सरकारी पेरोल पर बंदी बना लिया है.
इस मायावी हुनर का ही जादू है कि निशंक के समय में अंधा बन बैठा मीडिया अब गूंगा और बहरा भी हो गया है. बड़े बड़े कलमवीर
और तोपची अपने हथियार जनरल के सामने डाल दिए हैं. इसी का फल है कि लोकायुक्त में मौजूद छेद और उत्तराखंड के सीने को रौंद रहा भ्रष्टाचार किसी अखबार को नजर नहीं आ रहा है. अमर उजाला ने जब आंख दिखाना शुरू किया तो ईमानदारी की खाल ओढ़े बीसी खंडूरी अपना असली चेहरा दिखाने लगे हैं. निशंक के सिपहसलारों से घिरा यह फौजी, शेर की बजाय अब भेडि़या बनकर अमर उजाला पर हमला कर रहा है. पर भूल गया है कि भ्रष्टाचार से परेशान जनता अखबारों को सरकारी विज्ञापनों से खरीद लेने से बदलने वाली नहीं है. वह अपने साथ हुए हर अन्याय का बदला लेगी, जैसे खंडूरी के सीएम रहते लोकसभा चुनाव में लिया था.
अब इस जनरल को अपने चारण गीत गाने वाले अखबार औरे उसके संपादक पंसद आ रहे हैं. सच और आलोचना खंडूरी साहब को पसंद नहीं आ रहा है. वैसे भी निशंक के समय से आंखों पर पट्टी बांधे गुणगान करने वाले संपादक-पत्रकार अभी तक उबर नहीं पाए हैं कि जनरल खंडूरी उनसे भी दो हाथ आगे निकल गए हैं. सभी अखबार अब सरकार वंदना करने में जुटे हैं. इसलिए अमर उजाला की आईना दिखाने वाली खबरें, सच दिखाने वाली खबरें फौजी सीएम को चुभ रही हैं. इससे बौखलाए बीसी खंडूरी और उनकी धूर्त मंडली ने अमर उजाला की विज्ञापन रुपी रसद लाइन काट दी है. ताकि फड़फड़ाकर यह अखबार भी हथियार डाल दे. पर तारीफ करनी होगी अखबार के मैनेजमेंट और स्थानीय संपादक की कि अभी तक इन लोगों ने अपने हथियार नहीं डाले हैं.
अमर उजाला में सच छपने का ही परिणाम है कि पिछले एक सप्ताह से खंडूरी ने राज्य के सूचना विभाग से जारी होने वाले विज्ञापन इस अखबार को जारी करने पर रोक लगा रखी है. मिसाल के तौर पर 28 नवम्बर को देहरादून से प्रकाशित हो रहे हिन्दी के चार प्रमुख अखबारों में से तीन अखबारों दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान और राष्ट्रीय सहारा में राज्य के सूचना विभाग की ओर से पांच विज्ञापन छपे हैं, लेकिन अमर उजाला में एक भी विज्ञापन नहीं है. यह तब हो रहा है जब अमर उजाला, उत्तराखंड का सबसे बड़ा अखबार है. सर्कुलेशन ही नहीं, न्यूज कंटेट के मामले में भी अमर उजाला की अपनी साख है. पिछले कुछ सालों में वैसे ही शशि शेखर और उनके चेले-चपेटों ने अपनी टुच्चईपन से इस अखबार की जमकर वॉट लगाई है. जब से शशि शेखर एंड कंपनी का अमर उजाला से नाता टूटा, तब से यह अखबार अपनी पुरानी रंगत में आने की कोशिश में सरकारों को आईना दिखाने की कोशिश कर रहा है.
हालांकि आज के निर्मम बाजारू दौर में जब संपादकों को खबरों से ज्यादा विज्ञापनी धंधे से नत्थी कर लिया गया है, तब सत्ताशीनों के काले कारनामों की परतें उधेड़ने की किसी चरम सीमा तक जाने के लिए हर अखबार की सीमाएं मालिक और नेताओं की दूरभि संधि ने तय कर रखी है. इसी संधि का फायदा भ्रष्ट सरकारें उठाती आई हैं. उत्तराखंड में भी यही हो रहा है. मुख्यमंत्री रहते हुए निशंक ने मीडिया पर नकेल कसने के लिए जो कुकर्म किए, ठीक वैसे ही बीसी खंडूरी भी करने लगे हैं. करीब चार माह पहले निशीथ जोशी की विदाई के बाद उत्तराखंड में अमर उजाला की बागडोर विजय त्रिपाठी के हाथों में आने के बाद से ही सरकार का इस अखबार से तनातनी शुरू हुई है. मैनेजमेंट के नजरिए से भले ही अमर उजाला विज्ञापनों की कमी से परेशान हो रहा हो, पर यह अखबार अब अपने तेवर से उत्तराखंड में सबके दिलों में तेजी से जगह बनाता जा रहा है.
अपने धारदार खबरों से अमर उजाला उस तेवर के आसपास पहुंचने की कोशिश कर रहा है, जिसके लिए कभी अखबार जाने जाते थे. जिनके स्याही की फिसलन से सत्ता हिल जाया करती थी. पर अब जनप्रतिनिधि की बजाय तानाशाह बन चुके नेताओं को अपनी या अपने सरकार की सकारात्मक आलोचना भी पसंद नहीं आ रही है. जनता के ऊपर बम से हमले होने पर भी इन तानाशाहों की एकता नहीं दिखती है, अपनी डफली तथा अपना राग अलापते हैं, पर जनता का एक थप्पड़ इन्हें एक कर देता है तब पूरी बिरादरी पर पहाड़ टूटने लगता है. इसी असंवेदनशील नेताओं की कड़ी को तेजी से खंडूरी अपनाते जा रहे हैं. उन्हें अब अपने खिलाफ एक आवाज सुनना गंवारा नहीं हो रहा है. वो मीडिया को निशंक की तरह अपना चारण-भाट बनाने की कोशिश कर कर रहे हैं.
निशंक के पाप के खिलाफ झंडा उठाने वाले खंडूरी को व्यापक कवरेज देने वाला अमर उजाला आज इसी खंडूरी के कोप का भाजन हो रहा है. ये वही खंडूरी हैं जो सीएम बनने से पहले इस अखबार की खूब तारीफ के पुल बांध रहे थे, लेकिन सत्ता में लौटते ही अब वही अखबार खंडूरी को रास नहीं आ रहा है, क्योंकि सत्ता में आने के बाद सच की चुभन बढ़ गई है. अमर उजाला के खिलाफ खंडूरी का यह हिटलरी चेहरा यह समझने के लिए काफी है कि न केवल वे निशंक के ही भाजपाई कलोन है, बल्कि फौजी पृष्ठिभूमि का यह मुख्यमंत्री लोकतांत्रिक आचार-व्यवहार में कहीं ज्यादा खतरनाक है. भाजपा को भी समझना चाहिए कि अगर अब अपने इस फौजी सीएम की हिटलरशाही पर रोक नहीं लगाया तो आने वाले विधानसभा चुनावों में भी वही हाल होगा जो इसके सीएम रहते लोकसभा चुनावों में हुआ. इसी सीएम की इमानदारी पर विकीलीक्स भी तमाचा लगा चुका है.
बीसी खंडूरी का विकीलीक्स की नजरों में सच जानने के लिए क्लिक करें – बीसी खंडूरी की ईमानदारी पर विकीलीक्स का तमाचा
लेखक दीपक आजाद उत्तराखंड के युवा और बेबाक पत्रकार हैं. कई अखबारों-पत्रिकाओं में काम कर चुके हैं. साफ-साफ और खरी-खरी बात लिखने के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.






