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फ्रीजर में आशुतोष महाराज और चैनलों पर उबाल

Awadhesh Kumar :  आसाराम बापू के बाद ऐसा लग रहा है जैसे हमारे कुछ टीवी चैनलों के टीआरपी के लिए आशुतोष महाराज मिल गए हैं। अलग-अलग तरीके से ताबड़तोड़ खबरें, बहस…..इस तरह चल रहीं हैं मानो इस समय देश के लिए सबसे बड़ा मुद्दा वही हो। किसी साधु का शरीर डीप फ्रीजर में रखा हो और उसकी सांसे बंद हो, ह्दय के धड़कन रुके हुए हों तो आम तौर पर उसे मृत या साधुओं के लिए ब्रह्मलीन हुआ माना जाएगा। डॉक्टर उन्हें मृत घोषित कर रहे हैं और पंजाब सरकार ने भी यही कहा है। लेकिन उनके भक्त कह रहे हैं कि वे समाधी की अंतिम अवस्था में हैं जहां शरीर की सारी क्रियाएं रुक जातीं हैं।

Awadhesh Kumar :  आसाराम बापू के बाद ऐसा लग रहा है जैसे हमारे कुछ टीवी चैनलों के टीआरपी के लिए आशुतोष महाराज मिल गए हैं। अलग-अलग तरीके से ताबड़तोड़ खबरें, बहस…..इस तरह चल रहीं हैं मानो इस समय देश के लिए सबसे बड़ा मुद्दा वही हो। किसी साधु का शरीर डीप फ्रीजर में रखा हो और उसकी सांसे बंद हो, ह्दय के धड़कन रुके हुए हों तो आम तौर पर उसे मृत या साधुओं के लिए ब्रह्मलीन हुआ माना जाएगा। डॉक्टर उन्हें मृत घोषित कर रहे हैं और पंजाब सरकार ने भी यही कहा है। लेकिन उनके भक्त कह रहे हैं कि वे समाधी की अंतिम अवस्था में हैं जहां शरीर की सारी क्रियाएं रुक जातीं हैं।

मेरा मानना है कि अगर उनके भक्त यह कह रहे हैं कि हमें उनके समाधि अवस्था से वापस आने की प्रतीक्षा करनी है तो तत्काल उसमें बाधा डालने का कोई औचित्य नहीं है। ऐसे अभियानों से उन पर दबाव बढ़ता है। आखिर यह बात समझ से परे है कि तत्काल फैसला कराने पर उतारु क्यों हैं ये लोग? कुछ समय प्रतीक्षा करने में समस्या क्या है? अगर वे ब्रह्मलीन हो गए हैं तो फिर कुछ दिनों बाद एक संन्यासी की तरह उनका अंतिम संस्कार हो सकता है। लेकिन चैनलों के कारण ऐसा माहौल बन गया है मानो अगर उनका अंतिम संस्कार नहीं हुआ तो प्रलय आ जाएगा।

इस प्रसंग से योग की अंतिम अवस्था समाधि पर गंभीर चर्चा हो सकती थी। लेकिन चैनलों पर ऐसे लोग आ रहे हैं जिनमें ज्यादातर समाधि का अनुभव तो छोड़िए…पातंजलि योगसूत्र या गीता में श्रीकृष्ण के उपदेशों केा भी ठीक से न पढ़ा या समझा है। अगर योग पर समाधि पर मनुष्य के शरीर का आधुनिक विज्ञान से परे आध्यात्मिक वर्गीकरण पर, शरीर के चक्रों पर, प्राण पर ….गंभीर चर्चा होती तो इससे सारे श्रोताओं को लाभ होता। पर इन्हें लगता है कि इससे टीआरपी नहीं मिलेगी। तो भला क्यों चर्चा की जाए। इसलिए बहस और रिपोर्टें इतने छीछले, अनावश्यक, आपत्तिजनक एवं जुगुप्सा पैदा करने वाले हैं कि कोई भी विवेकशील व्यक्ति विद्रोह कर जाए।

जिस आश्रम का व्यापक विस्तार हो और उसमें संपत्ति हो तो कई प्रकार के संदेह पैदा होते हैं। इस बारे में हम कुछ भी नहीं कह सकते लेकिन किसी चैनल में अभी तक ऐसी खबरें नहीं दिखाईं हैं जिनसे वाकई ऐसी आशंका की पुष्टि हो। अचानक आशुतोष महाराज के परिवार को तलाश लिया गया है जिस वे वर्षों पहले त्याग चुके हैं। उनका बेटा कह रहा है कि आशुतोष महाराज से जब वह मिला तो उनने कहा कि वे अब पूरे विश्व के लिए हैं, इसलिए उनसे मिलने की कोशिश न करे।

आशुतोष महाराज की जिन्दगी हम नहीं जानते। पर किसी अंदर वैराग्य कई कारणों से और किसी समय पैदा हो सकता है। कोई घर की समस्या से न जूझ पाने के कारण पलायन करने के बाद किसी समय संन्यासी हो सकता है। ऐसे हजारों उदाहरण उपलब्ध हैं। इसीलिए कहा गया है कि किसी साधू का भूत नहीं देखना चाहिए। हमारे उन चैनलों को यदि यह लगेगा कि इससे टीआरपी बढ़ाने के लिए दर्शक मिलेंगे तो वे जानते समझते हुए भी सामान्य मर्यादा, आध्यात्मिकता, सनातन धर्म की विशेषताओं को तार-तार करने में नहीं हिचकेंगे। यही कारण है कि टीवी चैनल अनेक अच्छी खबरें दिखाते हैं, सार्थक बहस भी करते हैं, पर ऐसी हरकतों से जनता के अंदर उनके प्रति सम्मान का क्षय होता है और पत्रकारों के प्रति जो श्रद्धा भाव होता था वह भी खत्म हो चुका है। पता नहीं कुछ प्वाइंट की टीआरपी से ये बाहर निकलकर देश की करोड़ों आबादी तक पहुंचने वाले मुद्दों की ओर अग्रसर क्यों नहीं होते!

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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