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बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाकर साइकिल की दुकान पर काम किया मेहंदी हसन ने

: एक बार चले आओ, सूरत तो दिखा जाओ : लूणा से ननिहाल चिड़ावा तक दुवाओं का सिलसिला जारी : मेहन्दी हसन की सेहत को लेकर सलामती की दुआ : मित्रों व परिजनों में छाई उदासी, सेहत को लेकर चिंतित : मंदिरों में भी मांगी मन्नतें, चला पूजापाठ का दौर : चिड़ावा । 'दुनियां किसी के प्यार में किसी जन्नत से कम नहीं…' यह वो लाइन जो जाने-माने गजल गायक मेहदी हसन ने 'जाग उठा इंसान' में गुनगुनाया था। अब इस गाने में जो प्यार है वो उनके पैतृक गांव लूणा में देखने को मिल रहा है। वही प्यार उनके ननिहाल चिड़ावा में दिखाई दे रहा है।

: एक बार चले आओ, सूरत तो दिखा जाओ : लूणा से ननिहाल चिड़ावा तक दुवाओं का सिलसिला जारी : मेहन्दी हसन की सेहत को लेकर सलामती की दुआ : मित्रों व परिजनों में छाई उदासी, सेहत को लेकर चिंतित : मंदिरों में भी मांगी मन्नतें, चला पूजापाठ का दौर : चिड़ावा । 'दुनियां किसी के प्यार में किसी जन्नत से कम नहीं…' यह वो लाइन जो जाने-माने गजल गायक मेहदी हसन ने 'जाग उठा इंसान' में गुनगुनाया था। अब इस गाने में जो प्यार है वो उनके पैतृक गांव लूणा में देखने को मिल रहा है। वही प्यार उनके ननिहाल चिड़ावा में दिखाई दे रहा है।

पिछले 12 सालों से गले के कैंसर से पीड़ित मशहूर गजल सम्राट मेहन्दी सहन की सेहत को लेकर राजस्थान के झुंझुनूं जिले में चिंता की लहर फैल गई है। कैंसर से पीड़ित 84 वर्ष के मेहंदी हसन का पाकिस्तान के निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। उनके ननिहाल चिड़ावा में हिन्दू मुस्लिम दोनों समुदाय मंदिर व मस्जिदों में उनके जल्द स्वस्थ होकर हिदुस्तान आने की दुआ कर रहे हैं। कस्बें के बच्चों से लेकर बूढ़े तक मेहदी हसन के लिए दुआएं मांग रहे हैं।

उनके मामा की 98 वर्षीय बेटी चिड़ावा निवासी नसीबन बानो दावा करती हैं कि मेहन्दी हसन का ननीहाल चिड़ावा है। बचपन के बारे में बताती हैं कि उन्होंने काफी समय चिड़ावा की गलियों में बिताया। नसीबन बानों की माने तो हसन के वालिद ने दो शादियां की हैं, एक तो पिलानी के पास नून्दह बहल के गांव में तथा दूसरी चिड़ावा में शरबती बानों के साथ। बुजुर्ग नसीबन के अनुसार मेंहदी हसन के एक बड़े भाई थे जिन्हें पंडित गणपत के नाम से जाना जाता था। लेकिन पाकिस्तान जाने के बाद उनका नाम बदला गया। उन्हें बाद में गुलाम कादिर के नाम से पहचान मिली। मेहंदी हसन की एक छोटी बहन थीं, जो पाकिस्तान में हैं। वो उस समय काफी छोटी उम्र की थीं। उसका नामकरण पाकिस्तान में हुआ, इसलिए उसका नाम पता नहीं है।

नसीबन के परिवार के लोगों ने बताया कि दादी के माध्यम से हसन साहब की तालीम की शुरुआत भी चिड़ावा से हुई। आज भी नसीबन बानो के परिवार में अधिकतर सदस्य या तो गायक हैं या फिर अच्छे संगीतकार, जो देश विदेश में अपनी कला पेश कर चुके हैं। इसी कड़ी में नसीबन बानों का पोता कव्वाली, भजन व गजल में महारत हासिल कर चुका है। उन्होंने भी अपनी बातों को गजल के माध्यम से सुनाया। नसीबन बानो बताती हैं कि लगातार पन्द्रह पीढियों से गीत-संगीत के क्षेत्र में काम कर रहे गुगीया परिवार, जो हसन साहब का ननिहाल है, के गीत-संगीत के रियाज को देखकर हसन की भी गीत-संगीत में रुचि बढ़ी तथा यहीं से उन्होंने गीत संगीत की शुरुआत की। अपने चाचा ईस्माइल खान से संगीत की पूरी तालीम हासिल की। पिता अजीम खान ने हसन की काबिलियत देखकर उनका पूरा सहयोग किया।

मेहंदी हसन के बचपन के मित्रों की संख्या देखें तो कम ही दिखाई पड़ती है लेकिन लूणा गांव के 92 वर्षीय नारायण सिंह शेखावत के साथ उन्होंने बचपन का अधिकांश समय बिताया। आज भी नारायण सिंह से बात करने पर गजल के माध्यम से वो अपना भाव इस प्रकार व्यक्त करते है- इक बार चले आओ, सूरत तो दिखा जाओ.. इसी नग्में की चंद लाइनों को गुनगुनाते हुए उनकी आंखें भर आती हैं। हसन के मामा की लड़की चिड़ावा की नसीमन बानो अपने भाई के दीदार की आशा संजोये हुए हैं। वे उनकी गजलों को अपने पोते इदरीश कादरी के माध्यम से सुनकर अपना दुःख छुपाती हैं।

हसन साहब का बचपन बहुत परेशानियों में गुजरा है। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाने के बाद उन्होंने एक साइकिल की दुकान पर काम किया। साथ ही मोटर मैकेनिक का काम भी उन्होंने किया लेकिन संगीत के प्रति जो जुनून था, वो कभी कम नहीं हुआ और अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने अपना एक अलग मुकाम बनाया। वैसे तो 1950 का वह दौर उस्ताद बरकत अली, बेगम अख्तर, मुख्तार बेगम जैसे कलाकारों का था, जिसमें मेहदी हसन के लिये अपनी जगह बना पाना सरल नहीं था।

गायक के तौर पर उन्होंने पहली बार 1957 में रेडियो पाकिस्तान में बतौर ठुमरी गाकर अपनी पहचान बनायी। इसके बाद उन्होंने कभी मुड़ कर नहीं देखा। 1957 से 1999 तक वे गायन के क्षेत्र में सक्रिय रहे। मेहदी हसन ने गले के कैंसर के बाद पिछले 12 सालों से गाना लगभग छोड़ दिया है। उनकी अंतिम रिकार्डिंग 2010 में 'सरहदें' नाम से आयी, जिसमें फ़रहत शहज़ाद की लिखी- तेरा मिलना बहुत अच्छा लगे है- की रिकार्डिंग उन्होंने 2009 में पाकिस्तान में की और उस ट्रैक को सुनकर 2010 में लता मंगेशकर ने अपनी रिकार्डिंग मुंबई में की। इस तरह यह युगल अलबम तैयार हुआ।

राजस्थान के झुंझनू से श्याम रत्न शर्मा की रिपोर्ट.

मेहंदी हसन से संबंधित कुछ चित्र यूं है…


(सुनें)

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