बिज़नेस स्टैंडर्ड की वेबसाइट पर एक मल्टीमीडिया फीचर 'दी मेकिंग ऑफ इंडियाज बजट' में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा का कहना था कि यह सालाना अभ्यास किसी न किसी तरीके से भारत सरकार के हर पहलू और विभाग को छूता है। वह अपने इस बयान में मीडिया को भी शामिल कर सकते थे। बजट पेश किए जाने को जितनी तवज्जो दी जाती है, कुछ उसी अंदाज के साथ टेलीविजन चैनलों पर पूरे दिन बजट का कवरेज किया जाता है और साथ में जुड़ा होता है बजट पूर्व विज्ञापन भी। यह पूरा अभ्यास इतने जोर-शोर से चलाया जाता है कि अब तो याद करना भी मुश्किल है कि कभी ऐसा भी समय रहा होगा जब मीडिया बजट के कवरेज को इतनी तवज्जो नहीं देता था। हां वित्तीय समाचारपत्रों के लिए तो यह हमेशा से काफी महत्त्वपूर्ण रहा है।
सबसे पहले वित्त मंत्री बजट भाषण पढ़ते हैं और शुक्र है कि अब यह भाषण शाम 5 बजे की जगह पर पूर्वाह्नï 11 बजे पढ़ा जाता है। इसके लिए पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा का शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए क्योंकि 2001 में उनके वित्त मंत्री रहते ही यह व्यावहारिक बदलाव किया गया। बजट के दिन जो कुछ होता है वह कुछ बहुत अप्रत्याशित नहीं है। उस दिन जैसे ही वित्त मंत्री बजट भाषण पेश करने के लिए उठते हैं, उससे पहले ही विपक्ष अद्र्घप्रासंगिक मसलों को लेकर शोर-शराबा मचाता है, लोकसभा अध्यक्ष उन्हें शांत करने की कोशिश करते हैं और फिर अपने स्वर कड़े करते हुए विपक्ष को रोकने का प्रयास करते हैं। सदन को शांत और सीमा में रखने की कला सोमनाथ चटर्जी को बड़े अच्छे से आती थी। वहीं मीरा कुमार की आवाज बेहद शांत, सरल और अपने पिता जगजीवन राम से काफी अलग है।
आखिरकार वित्त मंत्री बजट पढऩा शुरू करते हैं। भाग ए को खत्म करते करते ही भारी भरकम आंकड़ों जैसे कि सफाई से लेकर महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लाखों करोड़ों रुपये के आवंटन को सुनकर जिन लोगों का दिमाग काम करना बंद नहीं कर चुका है, वे कुछ हल्के फुल्के मनोरंजन का आनंद उठा सकते हैं। तब तक दूरदर्शन के कैमरामैन वित्त मंत्री के चेहरे पर फोकस करते करते थक चुके होते हैं और अब उनका कैमरा सदन में सोते, कान साफ करते, नाक में उंगली डालते और गप्पें लड़ाते चुनकर भेजे गए जनप्रतिनिधियों की तलाश करने लगता है। जब कभी राजनीतिक तौर पर सही माने जाने वाले प्रस्तावों की घोषणा की जाती है तो झपकी ले रहे लोगों की नींद बीच बीच में सत्ता पक्ष के मेज थपथपाने से टूट जाती है। किसानों, महिलाओं और गरीबों के लिए की जाने वाली घोषणाओं पर सबसे ज्यादा वाहवाही बटोरी जाती है, हालांकि हर किसी को पता होता है कि इनमें से कोई भी इनकी हालत में सुधार नहीं ला सकता।
बीच में कभी कभार विपक्ष के खेमे से भी कोई चुटकुला सुनने को मिल जाता है। अगर वित्त मंत्री का झुकाव भी हास्य बोध की ओर हुआ तो उनकी ओर से भी चुटकुले सुनने को मिल सकते हैं। या फिर वे गांधी, टैगोर, राजीव गांधी या फिर अपने पसंदीदा कवि की पंक्तियां सुना सकते हैं। शायद बजट भाषण इतने ऊबाऊ तरीके से तैयार किया जाता है कि इसे पेश करने वाला कोई भी वित्त मंत्री बेहद दिलचस्प वक्ता नहीं नजर आ सका है।
इसके बाद वित्त मंत्री जैसे ही इन शब्दों को पढ़ते हैं, 'अब मैं अपने भाषण के भाग बी की ओर रुख करता हूं' तो हर किसी की नींद टूट जाती है। जहां तक बजट पर नजर रखने वाले अधिकांश तबके का सवाल है तो बजट के असल हिस्से पर हम अब पहुंचे हैं, यानी कि कर। नए करों और कर में छूट के हिसाब से अब शुरू होता है ओह, आह और वाह-वाह का दौर। इन सबके साथ ही तकरीबन दो घंटे चली (जसवंत सिंह ने इससे अधिक समय तक बजट भाषण पढ़ा था ) बजट पेश करने की प्रक्रिया यहीं खत्म हो जाती है। यह प्रक्रिया गांधी, टैगोर, राजीव गांधी या फिर वित्त मंत्री के पसंदीदा कवि की पंक्तियों के साथ भी खत्म हो सकती हैं या फिर उनके बिना भी।
बजट के बाद की कहानी यहां से शुरू होती है। वित्त मंत्री और उनकी टीम विभिन्न चैनलों पर आकर बार-बार एक ही बात दोहराते हैं। साक्षात्कार लेने वाला उनसे चाहे जो भी सवाल कर ले मगर वे बार-बार एक ही जवाब देंगे। फिर सामना होता है उद्योगपतियों और विश्लेषकों के झुंड से। एक अरब से अधिक आबादी के बावजूद भारत ऐसे विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों की संख्या बेहद सीमित है जो बजट की जटिलताओं को सही और सरल तरीके से समझा पाएं। पहले उन्हें केवल अपने ज्ञान के आधार पर बजट का विश्लेषण कर देना होता था। मगर आज की तारीख में जनसांख्यिकी झुकाव की वजह से उन्हें कॉलेज और स्कूली छात्रों के बचकाने सवालों का भी बड़ी विनम्रता से जवाब देना पड़ता है। बजट के पूरे दिन और रात टीवी स्टूडियो में इस पर विश्लेषकों और अर्थशास्त्रियों की चर्चाएं चलती रहती हैं और इनमें से कुछ तो अगली सुबह अखबारों में आलेख के रूप में फिर नजर आ जाते हैं।
इस पूरे अभ्यास में अगर कोई नया नया जुड़ा है तो वह है विज्ञापन उद्योग। अपने क्लाइंट को बढ़ावा देने का एक बेहतर मौका भांपते हुए बजट पूर्व, बजट के दौरान और बजट के बाद जनसंपर्क उद्योग की गतिविधियां मीडिया कवरेज बढऩे के साथ अचानक से बेहद बढ़ गई हैं। जहां आमतौर पर मीडिया को लोगों से टिप्पणियां हासिल करने के लिए प्रयास करना पड़ता है वहीं बजट के दिन स्थिति एकदम उलट होती है। विभिन्न कंपनियों के सीईओ और वरिष्ठï कार्याधिकारियों को पता होता है कि यही एक ऐसा दिन है जब दर्शकों और पाठकों की संख्या काफी अधिक होती है, इसलिए वे पीआर (जनसंपर्क) टीम से कवरेज की मांग करते हैं। बजट पूर्व या बजट के बाद सीईओ की ओर से आलेखों और फोटो के साथ या फोटो के बिना संक्षिप्त टिप्पणियों की पेशकश खुद ही की जाती हैं।
क्या यह सब जरूरत से ज्यादा भारी भरकम था? शायद, खासतौर पर तब जबकि आपको पता चलेगा कि भारत से कहीं अधिक बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भी सालाना बजट पर किसी का ध्यान तक नहीं जाता। मगर व्यापक संदेश निराश करने वाला है: आर्थिक उदारीकरण के दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अर्थव्यवस्था और उद्योग में सरकार की भूमिका इतनी महत्त्वपूर्ण है कि बजट मीडिया के लिए पैसा जुटाने का एक भारी भरकम अभ्यास बन गया है। (बीएस)






