पिछले दिनों दिल्ली में था. संसद के शीत सत्र के गरम होने की चर्चाओं के बीच संसद भवन के गलियारों के रंग-रोगन का काम जोर-शोर से चल रहा था. विपक्ष महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार को घेरने और हंगामा खड़ा करने की रणनीति में और सत्तापक्ष उसकी काट के उपाय ढूंढने की रणनीति तैयार करने में जुटा था. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी देश के विभिन्न हिस्सों में तकरीबन 7600 किमी की ‘जन चेतना यात्रा’ कर लौट रहे थे. लगा कि इस बार संसद का शीत सत्र गंभीर और उग्र चर्चाओं से वाकई गरम होगा. लेकिन जैसा कि हाल के संसदीय सत्रों में देखने को मिलता रहा है, इस बार भी संसद में हंगामा खड़ा करने के नाम पर संसद की कार्यवाही को ही जाम करने का शुरुआती नजारा देखने को मिला. लगातार चार दिन संसद की कार्यवाही ठप सी रही.
अब यह गिनाने-बताने का कोई अर्थ नहीं कि संसद की एक-एक मिनट की कार्यवाही चलने पर कितनी रकम खर्च होती है और ठप रहने पर आम आदमी की गाढ़ी कमाई का कितना बड़ा हिस्सा बरबाद हो जाता है. जो सत्ता में होता है, इस तरह के आंकड़े पेश करता है लेकिन विपक्ष में होने पर इसे ही वह अपना सबसे बड़ा संसदीय धर्म और कर्म समझता है. इस बार मुख्य विपक्षी दल भाजपा और उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम का त्यागपत्र होने तक उनके बहिष्कार की घोषणा कर रखी है. कारण, तत्कालीन वित्त मंत्री के बतौर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में कथित तौर पर उनकी भूमिका भी संदिग्ध रही है. लिहाजा भाजपा का तर्क है कि उन्हें पद से हटना चाहिए और नहीं हटने की हालत में उन्हें हटाया जाना चाहिए. लेकिन किसी जांच आयोग अथवा अदालत ने उन्हें दोषी तो नहीं ठहराया है?
तो क्या हुआ, भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर का तर्क सुन लीजिए. वे कहते हैं, ‘‘राजग सरकार में तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस के खिलाफ भी कहां किसी अदालत ने टिप्पणी की थी. उनके खिलाफ कहां कोई मामला दर्ज हुआ था. लेकिन कांग्रेस (तब मुख्य विपक्षी दल) ने संसद में कितने दिनों तक उनका लगातार बहिष्कार किया था.’’ यानी इस मामले में भाजपा और उसके नेतृत्ववाले राजग के लोग कांग्रेस का ही अनुसरण कर रहे हैं. उम्मीद तो थी कि इस बार संसद के शीत सत्र में सुरसाकार महंगाई और अनियंत्रित भ्रष्टाचार, देश-विदेश में जमा काले धन, लोकपाल विधेयक आदि के बारे में सार्थक बहस और चर्चाएं होंगी. सत्ता पक्ष और विपक्ष के लोग मिलजुलकर कोई रास्ता निकालेंगे जिससे एक बार फिर वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बीच महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त आम आदमी को कुछ राहत मिल सकेगी. लेकिन इसके बजाए हमारे राजनीतिक दल एक-दूसरे को नीचा दिखाने और एक दूसरे के विरुद्ध राजनीतिक स्कोर खड़ा करने में ही ज्यादा व्यस्त दिख रहे हैं.
दूसरी तरफ राजनीतिज्ञों के खिलाफ जनाक्रोश तेजी से बढ़ रहा है. 24 नवंबर, गुरुवार को नई दिल्ली में कृषि मंत्री शरद पवार के साथ जो कुछ हुआ उसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता. वह सर्वथा निंदनीय है. लोकतंत्र में अभिव्यक्ति लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी हर किसी को है लेकिन अभिव्यक्ति पर मार-पीट की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती. इससे तो अराजकता ही पैदा होगी जो लोकतंत्र के लिए घातक ही कही जा सकती है. लेकिन चंद रोज पहले दूसंचार घोटाले के आरोप में सजा भुगतने जेल जा रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम और फिर श्री पवार पर हाथ उठाने वाले हरविंदर सिंह को सिरफिरा और सनकी कहकर समस्या को खारिज भी नहीं किया जा सकता.
चिंता की बात यह है कि इस तरह की प्रवृत्ति बढ़ रही है. इससे पहले भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री चिदंबरम, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी, सुरेश कलमाणी पर जूता-चप्पल उछाले जा चुके हैं. यहां तक कि भ्रष्टाचार और कालेधन के विरुद्ध जनाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का आंदोलन चला रहे गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की टीम के सदस्यों-प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल के साथ भी हाथापाई हो चुकी है. जो लोग महंगाई के नियंत्रित नहीं होने पर जनता के हिंसक होने की भविष्यवाणियां कर रहे हैं और जो लोग जाने-अनजाने शरद पवार के गाल पर पड़े थप्पड़ को जायज ठहराते हुए उसे अपर्याप्त घोषित करने वाले बयान जारी करने के बाद सफाई दे रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह की बह रही प्रवृत्ति से कोई अछूता नहीं रह सकेगा. आज जरूरत इस बात के गंभीर विवेचन की है कि इस तरह की घटनाएं किसी के साथ भी क्यों हो रही हैं. क्या शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की गुंजाइश नहीं रही.
इसके साथ ही संसदीय लोकतंत्र के सभी स्तंभों को संचालित करने वालों को भी अपनी भूमिका के बारे में भी गंभीरता से विवेचन करने की आवश्यकता है कि वे अपने दायित्वों का निर्वाह जिम्मेदारी और जवाबदेही के साथ कर रहे हैं? खासतौर से सरकार चलाने
वालों को चाहे महंगाई हो अथवा भ्रष्टाचार, महज परिस्थितियों का विवेचन करने, एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराने के बजाय अपनी सरकार और मंत्रालयों के द्वारा किए जा रहे ऐसे ठोस उपायों के बारे में बताना होगा, जिससे इन पर नियंत्रण पाया जा सके, जनता के दुख दर्द को कम किया जा सके. कई बार तो हमारे माननीय मंत्रियों के बयान भी आम जनता के दुख-दर्द पर मरहम लगाने के बजाय उन पर नमक छिड़कने, उनको मुंह चिढ़ाने और उन्हें डरानेवाले जैसे भी लगते हैं. अगर ऐसा ही चलते रहा तो देश को अराजकता की अंधी सुरंग में जाने से रोकने में भारी कठिनाई हो सकती है.
लेखक जयशंकर गुप्त जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार एवं लोकमत समाचार के कार्यकारी संपादक हैं.






