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बदलाव की बयार से भागने का मतलब

ढूंढ़ों….ढूंढ़ों….अरविंद केजरीवाल की जाति….पता कर ली है? कल ही एक मित्र आए थे, बोले, "अरविंद केजरीवाल सवर्ण है, पक्का व्यापारी……बनिया है. कुछ देर पहले ही एक मित्र का एसएमएस आया है," दूसरों की तरह यह भी व्यक्ति से पहले जाति ही ढूंढते हैं, लेकिन खुद उसी के शिकार हैं.
 
भाजपा को आप चाहते ही नहीं हो, क्योंकि वह साम्प्रदायिक पार्टी है. कांग्रेस भ्रष्ट है तथा वंशवाद की शिकार है, यह आप ही कहते हैं. पूरा देश भ्रष्टाचार के चंगुल में फंसा है, यह तो आप कहते ही रहते हो. लेकिन जब कोई व्यक्ति, पार्टी, 'इस बार आप राज करो', नीति के तहत जनता की शोषक कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ कोई चुनौती देते हुए आता है तो आप उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं.
 
विश्लेषक कहते हैं कि दिल्ली में 'आप' पार्टी को जितनी सीटें मिली हैं, यह पहला मौका है, जब चुनाव में इतनी कामयाब पार्टी के उम्मीदवारों की जाति और धर्म का प्रोफाइल चुनावी पंडितों के पास भी उपलब्ध नहीं. इसके उम्मीदवारों ने ना सिर्फ जाति, धर्म और क्षेत्रीयता का नाम लिए बिना चुनाव लड़ा बल्कि चुनाव लड़ने के लिए पैसे भी लोगों से ही लिए.
 
मीडिया मानने लगा हैं कि दिल्‍ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की शानदार सफलता ने राजनीति में नए युग का सूत्रपात कर दिया है. अरविंद केजरीवाल की धमाकेदार एंट्री ने वर्षों से जोड़-तोड़ की राजनीति करने वाली पार्टियों को न केवल आइना दिखा दिया बल्कि जनता के मन में यह विश्‍वास भी जगाया कि राजनीति में साफ-सुथरे लोग आ सकते हैं. एक साधारण सा व्‍यक्ति बगैर धनबल और बाहुबल के चुनाव जीत सकता है.
 
कुछ दलित विश्लेषक कह रहे हैं कि 'आप' पार्टी की जीत के पीछे मीडिया का हाथ है. जबकि सच्चाई क्या है, सब जानते हैं. मीडिया का बस चलता तो 'आप' पार्टी को एक सीट भी नहीं लेने देती. आखिरी समय तक इस कोशिश में लगी रही कि भारतीय जनता पार्टी ही सत्ता में आए. उसने पूरी कोशिश की 'आप' पार्टी को बदनाम करने की. वह तो जनता पूरी तरह समझ रही थी कि मीडिया पैसा खाकर डकार ले रही है. पैसा खाकर मीडिया डकार ना ले तो भाजपा के लोग क्या उसका क्या न करते, पैसा खाया है तो डकार लेनी ही थी. उसने खूब ली. लेकिन उसकी डकार ने कोई काम नहीं किया. 'आप' पार्टी ढेर सारी रूकावटों को पार करते हुए 28 सीटें जीती और दूसरे लोगों को संदेश दिया कि बगैर धनबल तथ बाहुबल के चुनाव जीता जा सकता है.
 
अरविंद केजरीवाल की जाति का पता करने वालों को खुशी इस बात की नहीं है कि आप' पार्टी ने इस मिथ को तोड़ा है कि दारू की बोतल और बांटकर वोट खरीदे जा सकते हैं. बिना पैसा, दारू बांटे 'आप' पार्टी के काफी विधायक जीते हैं. जबकि भाजपा, कांग्रेस के उम्मीदवार पैसा, दारू बांटने के बाद भी हारे.
अब मैं बात करता हूं उनकी, जो सवर्णों का विरोध करते हैं. कहते हैं कि कथित ऊंची जाति के लोग दलितों को व्यापार में भी उभरने नहीं देते.
 
इसी साल विश्व पुस्तक मेले की बात है. सवर्णों का घोर विरोध करने वाले दलितों लेखकों में से एक बड़े लेखक (ओमप्रकाश वाल्मीकि नहीं) एक दलित लेखिका को मिले. लेखिका ने खुश होते हुए बताया, "मेरा एक कहानी संग्रह आया है."
"किससे?" यह सवाल बड़े लेखक का था.. जवाब लेखिका को देना ही था,"सम्यक प्रकाशन" से.
"यह क्या किया? अरे किसी बड़े प्रकाशक से छपवातीं. राजकमल है, वाणी प्रकाशन है, शिल्पायन है….आदि."
आप तो जानते ही होंगे, यह बड़े प्रकाशन कौन चला रहा है.
 
एक समय था, जब दलित साहित्य को कोई कथित बड़ी जाति का प्रकाशक, अखबार, पत्रिका छापने को तैयार नहीं था. दलित पत्रिकाओं में छपे. दलित प्रकाशक आए. लेकिन बाद मे उन्हीं से मुंह मोड़ लिया. जबकि दलित साहित्य को छापना कथित बड़ी जाति के लोगों की व्यवसायिक मजबूरी है, जबकि दलित प्रकाशकों का मिशन. दलित प्रकाशक ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने वाली चीजें नहीं छापेगा. जबकि दूसरे सबकुछ छापते हैं, अश्लीली साहित्य भी.
 
दलित जातियों के लेखकों में भी अपनी ही जाति के लेखकों के बढ़ने पर खुशी होती है, दूसरी जाति के लेखक के अच्छा लिखने पर भौहें तन जाती हैं.
जब कोई छोटा सा सवर्ण लेखक इनती तारीफ कर दे तो इनकी छाती फूल जाती है. मन में हमेशा चाह रहती है कि कोई सवर्ण लेखक तारीफ करे, कोई कर भी दे तो ढोल नंगाड़ों के साथ शोर मचाएंगे, देखों फला बड़े सवर्ण लेखक, आलोचक ने उसकी तारीफ की. क्यों चाहना है भईया उसके स्वीकार करने या न करने को.
 
पूरे जीवन भर ब्राह्मणों का विरोध करने वाले दलित लेखकों को वैतरणी यही ब्राह्मण पार करवाते हैं. इनकी हिम्मत कभी इतनी नहीं होती कि यह अपने परिवार के लोगों को अंतिम इच्छा बताकर इस दुनिया से जाएं कि मेरा अंतिम संस्कार किसी ब्राह्मण से मत कराना. शमशान घाट में मजबूरी हो तो कम से कम हरिद्वार में जाकर ब्राह्मणों से मेरी आत्मा की शांति के लिए कुछ मत कराना. मजे की बात यह कि जिन ब्राह्मणों को जीवनभर कोसा, वही ब्राह्मण इनकी आत्मा की शांति के लिए मंत्र पढ़ते हैं और यज्ञ करते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि 'आत्मा नहीं होती' कहते-कहते मन के किसी कोने में यह भी डर सताता रहता हो कि मरने के बाद ब्राह्मणों ने आत्मा की शांति के लिए कुछ नहीं किया तो कहीं उनकी आत्मा भटकती न रहे.
 
16 दिसंबर 2012 की रात को एक लड़की के बुरी तरह प्रताड़ना देते हुए बलात्कार होता है तो दलित समाज के नुमाइंदे, रहनुमा कहे जाने वाले यह विचारक उसमें शामिल इसलिए नहीं होते कि वह लड़की दलित नहीं थी. अरे भईया मान लिया लड़की दलित नहीं थी, दलित होती तो शायद इतना हंगामा नहीं होता, लेकिन वह महिला तो थी. आप यह कहते हुए आंदोलन का समर्थन तो करते कि देखो, जब हमारी बहन बेटियों के साथ बलात्कार, अत्याचार होता है आप विरोध तो नहीं करते, लेकिन हम तुम्हारी बहन बेटियों के साथ होने वाले बलात्कारों, अत्याचारों का विरोध करते हैं. बताइए, जब महिलाओं खिलाफ होने वाले जुर्मों के खिलाफ नियम-कानून बनाए तो आपकी क्या भागीदारी रही? जब 16 दिसंबर की घटना के विरोध में लोग सड़कों पर उतर रहे थे तो आप घर में बैठे लड़की की जाति वह किस वर्ग से आती है, यह ढूंढ रहे थे. जबकि आप खुद, अपने दलित समाज की स्त्री के साथ बलात्कार होता है तब विरोध नहीं कर पाते. आपको चाहिए कि आप दलित समाज की स्त्री पर होने वाले अत्याचारों का खुलकर विरोध करें. आप लोगों की संख्या भी तो कम नहीं है, लेकिन आप खुद ही एकजुट नहीं हो पाते. आप एक मीटिंग के लिए भी 1000 लोगों को सूचना भेजते हैं, तो मुश्किल से 50 लोग जुट पाते. आपके लिए वही सबसे सफल विरोध मिटिंग बनकर रह जाती है.
 
अन्ना हजारे दिल्ली में भूख हड़ताल कर रहे थे. देश के कोने-कोने से लोग आकर आंदोलन में शामिल होकर सरकार को झुकाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन आप कह रहे थे, भई इसमें दलितों की भागीदारी कहां है? आम आदमी कहां है? जबकि उस आंदोलन में दलित भी शामिल था, आम आदमी भी. जब अन्ना का अनशन दलित, मुस्लिम के बच्चों से तुड़वाया तो आपने व्यंग्य कसा, "अब खुश, दलितों के बच्चों से अनशन तुड़वाया. उसमें मुस्लिम भी थे. अब न कहना, आंदोलन में दलितों, मुस्लिमों को शामिल नहीं किया गया."
 
अब कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि 'आप' सरकार बनाने से क्यों डर रही है? यह नहीं सोचा भाजपा सरकार बनाने से क्यों डरी? इस पर भी विचार करने की जरूरत नहीं कि भई जब 'आप' ने समर्थन मांगा ही नहीं तो कांग्रेस खुद ही क्यों एलजी के आमंत्रण से पहले ही 'आप' को समर्थन करने का पत्र एलजी को थमा दिया. जबकि पार्टी समर्थन देने वाली पार्टी से बात करने उनके नाम के साथ राष्टपति या राज्यपाल के पास जाती है तथा बताती है कि फलां लोग, पार्टी हमें समर्थन देने के लिए तैयार है, इसलिए हम सरकार बना सकते हैं. कांग्रेस कहती है कि हमें जनता को चुनावी खर्च से बचाना है. यदि यही राय है तो भाजपा को जाकर समर्थन दो न, क्यों खुद ही 'आप' के पीछे लगे हो. दूसरी बात जब 'आप' पार्टी के 18 मांगे जनहितैषी हैं तथा आप उससे मौखिक सहमत हैं तो तथा आप पार्टी खुद भी उन्हें लागू कर सकती है आप लिखकर कह दो कि आपके जनहितैषी बिंदुओं पर सहमत हैं. आप बनाइए सरकार.
 
जिस पार्टी ने जिस पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ा, उसी से आसानी से समर्थन ले ले, यह धोखा नहीं होगा, जिस पर सोच नहीं रहे हैं. बस 'आप' सरकार बनाने से डर रही है, भाजपा, कांग्रेस, मीडिया की भाषा बोल रहे हैं.
 
असल में कुछ लोग कांग्रेस व भाजपा के षड़यंत्र को नहीं समझ रहे हैं. यह दोनों पार्टियां अपनी लोकसभा की सीटें बचाना चाहती हैं. यदि आप पार्टी राष्ट्रपति शासन की तरफ ढकेल रही हैं तो क्या भाजपा ऐसा नहीं कर रही है. वह क्यों नहीं कांग्रेस का समर्थन लेकर दोबारा चुनाव के खर्चे से जनता को बचाती. दूसरी बात आप केवल आप से ही "सारी अपेक्षाएं रख रही हैं". आपकी बात से तो लगता है आपकी सारी अपेक्षा कांग्रेस या भाजपा पूरी कर देती.
 
कांग्रेस या भाजपा के आने से अच्छा है दोबारा चुनाव हों उसमें कोई तीसरी पार्टी आए. कम से कम हजारों, लाखों करोड़ के घोटालों से तो हम बचें. हम निष्पक्ष भाव से नहीं सोच रहे हैं, हमें दिक्कत यह हो रही है कि हमें दशक से ज्यादा बीत गये, कुछ तो चालीस पचास साल भी गंवा चुके, लेकिन वह चुनाव में कुछ हासिल नहीं कर पाए, आज की पार्टी 28 सीट ले गई. इसलिए अब हमारी माथा पच्ची इसी बात की रह गई है कि हम कहां से इस पार्टी की कमियों को निकालें. हम इस पार्टी से सीखने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, कमियां निकाल रहे हैं. इस समय भाजपा व कांग्रेस मिलकर यह राजनीति कर रही है कि इस पार्टी को यहीं खत्म कर दिया जाए. नहीं तो हम दोनों पार्टियों को यह लोकसभा चुनाव में भी नुकसान पहुंचाएगी और हम आप की कमजोरियों को ढूंढ़ने के चक्कर में भाजपा तथा कांग्रेस को मजबूती प्रदान करने का काम कर रहे हैं.
 
यह पब्लिक है, सब जानती है
कांग्रेस व भाजपा के विधायकों को चिंता इस बात की नहीं है कि जनता पर दोबारा से चुनाव के खर्च का बोझ पड़ेगा, चिंता तो इस बात की है कि इन पार्टियों के विधायकों ने लाखों की रूपये खर्च कर टिकट खरीदा. फिर सीट जीतने के लिए लाखों रूपये खर्च किए. वोट के लिए दारू तथा रूपया भी लोगों को दिया. अब दोबारा से यही खर्च करना पड़ेगा. दोबारा से जीत भी जाएंगे, यह भी पक्का नहीं है. आम लोग तो यह कहते हैं कि अबकी बार 'आप' पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी. इसलिए भाजपा व कांग्रेस मीडिया के साथ मिलकर 'आप' पार्टी को जिम्मेदारी से भागने वाली साबित करने पर तुले हैं लेकिन आम जनता सब जानती है. 
 
मीडिया की चलती तो 'आप' पार्टी को उसी के कहे अनुसार 6 से ज्यादा सीट नहीं मिलती. मीडिया तो आखिर तक इसी प्रयास में रहा कि आए तो केवल भाजपा ही दिल्ली की सत्ता में आए. अब उनकी घबराहट इस बात को लेकर हो गई है कि वह केंद्र सरकार में भाजपा को देखना चाहती है, लेकिन 'आप' पार्टी तो मोदी के प्रधानमंत्री बनने के सपनों पर धूल झोंकने पर लगी. कांग्रेस तो उससे घबरा ही गई है. उसे पता है, इस बार भाजपा आनी थी, लेकिन उसकी बुरी हालत यह सोचकर हो रही है कि क्या कांग्रेस इज्जत बचाने लायक लोकसभा में सीट हासिल कर पाएगी. लेकिन जनता है, सब जानती है. इसलिए वह 'आप' को समर्थन देने पर तुली हुई है, वो भी उसकी बिना रजामंदी के. ताकि लोकसभा चुनाव में 'आप' पार्टी उसे कोई नुकसान न पहुंचा सके, तथा यह पार्टी सरकार के खिलाफ ज्यादा न बोल सके. वास्तविकता को समझें, केवल आंखों पर पट्टी बांधकर किसी की आलोचना करने से बचें.
 
लेखक कैलाश चंद चौहान साहित्यकार हैं तथा त्रैमासिक पत्रिका कदम का संपादन करते हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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