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‘बनारस समाचार’ की पहली वर्षगांठ पर अस्सी घाट बना सोशल मीडिया की ऐतिहासिक प्रतिध्वनि का साक्षी

: सीढियां थीं दर्शक दीर्घा :  फर्श था वक्ताओं का मंच : बिना ताम-झाम का आयोजन : नौ मार्च को फिर मिलेंगे : अस्सी घाट पर रविवार की सुरमई शाम सचमुच एक यादगार लम्हा बनी. कहने को तो यह 'बनारस समाचार' की प्रथम वर्षगांठ का अवसर था मगर इसकी प्रतिध्वनि ने दिखा दी भविष्य की मीडिया की झलक. जमघट ऐसा भी नहीं कि जाम जैसी स्थिति रही हो. अर्थात संख्या हजारों में नहीं, सैकड़ों में रही लेकिन उनका अंदाजे बयां यह स्पस्ट संकेत दे रहा था कि देश अब चुप बैठने वाला नहीं है. सूचना क्रांति की कोख से उपजा सोशल मीडिया के रूप में अब एक ऐसा अस्त्र देशवासियों के हाथ लग चुका है, जो देश की दशा और दिशा बदलने में निर्णायक भूमिका निभाने जा रहा है.

: सीढियां थीं दर्शक दीर्घा :  फर्श था वक्ताओं का मंच : बिना ताम-झाम का आयोजन : नौ मार्च को फिर मिलेंगे : अस्सी घाट पर रविवार की सुरमई शाम सचमुच एक यादगार लम्हा बनी. कहने को तो यह 'बनारस समाचार' की प्रथम वर्षगांठ का अवसर था मगर इसकी प्रतिध्वनि ने दिखा दी भविष्य की मीडिया की झलक. जमघट ऐसा भी नहीं कि जाम जैसी स्थिति रही हो. अर्थात संख्या हजारों में नहीं, सैकड़ों में रही लेकिन उनका अंदाजे बयां यह स्पस्ट संकेत दे रहा था कि देश अब चुप बैठने वाला नहीं है. सूचना क्रांति की कोख से उपजा सोशल मीडिया के रूप में अब एक ऐसा अस्त्र देशवासियों के हाथ लग चुका है, जो देश की दशा और दिशा बदलने में निर्णायक भूमिका निभाने जा रहा है.

इस आयोजन में न तो कहीं कोई ताम-झाम था और न ही कोई परंपरागत मंच. घाट की सीढियां बनी दर्शक दीर्घा. कुल्हड़ में चाय के साथ बनारसी चाट का विशेष व्यंजन 'टमाटर' के स्वाद के साथ विचारों का आदान-प्रदान और बिना किसी लाग लपेट के हुई खुल कर चर्चा से यह स्पष्ट सन्देश निकला कि आज की सियासत और सियासतदानों से आम आदमी का भरोसा उठ चुका है . वह अब और ज्यादा बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है. लूटपाट में बदल चुका भ्रष्टाचार, सड़ांध मारती वर्तमान व्यवस्था, बढती दुष्कर्म की घटनाएं, पुरुष प्रधान समाज में नारी के प्रति बदलाव की शुरुआत और अपने अधिकारों के प्रति भारतीय महिलाओं, विशेषकर युवा वर्ग में आयी नव चेतना, वोट की खातिर देश तक को दांव पर लगाने की राजनेताओं की सोच, चुनाव, पुलिस, न्यायिक सुधार और व्यवस्था परिवर्तन आदि मुद्दों पर हुई खुली चर्चा में साफ़गोई दिखी ही, कैसे इसमें बदलाव लाया जा सकता है, इस पर भी हुई बहस देखने योग्य थी. इस बहस और चर्चा में राष्ट्रीय मीडिया पर सच उजागर करने का दिनोदिन बढ़ता दबाव भी कम उल्लेखनीय नहीं रहा. चर्चा इस शोध पर भी बेवाकी से हुई कि वर्तमान राष्ट्रीय मीडिया २०३० के आते-आते तक न सिर्फ इतिहास की वस्तु हो चुका होगा बल्कि वह पाठ्यक्रम का भी हिस्सा बन चुका होगा.

इस अनूठे आयोजन के सूत्रधारों भाई राजेश गुप्त, मनीष खत्री, बनारसी राजेश आदि के साथ ही उनके समस्त सहयोगियों की सहभागिता के दौरान यह सन्देश भी वर्तमान व्ययवस्था को गया कि अब देश और सहने की स्थिति में नहीं है. देश के तहरीर चौक यानी जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर पिछले दिनों मानस को उद्वेलित करने वाले मुद्दों पर युवा शक्ति का स्वतः स्फूर्त धरना, प्रदर्शन भी चर्चा का मुख्य विषय रहा और यह भी कि यही वर्ग सोशल मीडिया का ध्वजवाहक है, वही उसका मालिक है और वही सम्पादक. यही नहीं उसे किसी नेतृत्व की जरूरत नहीं. वही सेनापति है और वही सिपाही. 'बनारस समाचार' से लगभग ४५०० लोग जुड़ चुके हैं. यह संख्या आगे सात-आठ अंको तक जानी है. जरा कल्पना कीजिये कि जब इस मीडिया में हर कोई अंशदान करेगा बतौर पत्रकार, संपादक और हाँ हाकर भी , तब खुद को कहां खड़ा पाएगा आज का परम्परावादी नेशनल मीडिया.,

इस आयोजन में जैसा कि मैंने पहले भी कहा, कुछ भी औपचारिक नहीं था. आप अपनी जगह पर बैठे-बैठे भी बोल सकते थे तो सीढ़ियों के नीचे की फर्श था नैसर्गिक मंच. माइक की भी जरूरत महसूस ही नहीं हुई. साप्ताहिक अवकाश की वजह से घाट पर बड़ी संख्या में मौजूद देसी-विदेशी सैलानियों ने भी कौतूहल के साथ नगर में अपने आप में हुए इस अनूठे कार्यक्रम को देखा-सुना. वाकई,यहाँ लगा जमघट किसी भीड़ का हिस्सा नहीं था बल्कि यह जज्बे और जूनून से भरे वे लोग थे जिनमे बीता हुआ कल था तो था आज भी और बड़ी संख्या में मौजूद था भविष्य. चाहे वो लखनऊ से आये युवा पत्रकार अनुराग तिवारी रहे हों या बुजुर्ग भास्कर के अलावा राधाकृष्णन गणेशन, दुर्गेश वर्मा, आनंद राय, नवीन सिंह, राजेश ओझा, मुकेश सेठ, अशोक मेहरा, मनीष मिश्र, नवीन सिंह, उमेश जोगाई, अंटोनी 'बंटी' श्रीवास्तव आदि के अलावा सुश्री रेखा गुप्ता, संगीता मेहरा, प्रतिमा सिन्हा और शारदा विजय सहित जो भी उपस्थित थे, उनमे एक अलग सी तड़प और जज्बे को आप स्पष्ट देख सकते थे और यह भी कि वे ही संवाददाता थे और वे ही फोटोग्राफर. कैमरे के फ्लैश लगातार चमक रहे थे तो मोबाईल में इन क्षणों को कैद करने की होड़ भी कम नहीं थी

तय हुआ कि 'बनारस समाचार' के साथी फिर से मिलेंगे शिवरात्रि की पूर्व संध्या यानि नौ मार्च को तब हाथों में ठंडई के पुरवे के साथ होगी देश-काल को लेकर खुली चर्चा और बिंदास बहस….!!

लेखक पदमपति शर्मा Padampati Sharma जाने-माने खेल पत्रकार रहे हैं. इन दिनों बनारस में रहते हुए कई क्षेत्रों में सक्रिय हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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