जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हम सभी कैंटीन संचालक अनधिकृत रूप से भोजन करने आए भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के छात्रों का इस बार भी भारी मन से स्वागत कर रहे हैं. हमारे देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थान के छात्र हैं आप लोग. आप नवांकुर पत्रकारों के लिए हम लोग जेएनयू में अगस्त से अप्रैल तक एक्सट्रा खाना बनाते हैं. आप आते हैं चोरी-छुपे 8-10 लड़कों के गुट में. आपलोगों को देखकर हम समझ जाते हैं कि आप महान आईआईएमसी के छात्र हैं, जहां शौचालय की खूबसूरती और बनावट भी मुनिरका-कटवारिया सराय के उन कमरों से बेहतर है, जहां आप 3-4 लड़के एक साथ रहते हैं.
सुना है अब तो आपके आईआईएमसी में हाकिमों ने लिफ्ट भी लगा दी है. वातानुकूलित कक्षाएं, पुस्तकालय, लैब और 10 करोड़ी मंच सभागार तो पहले से ही था. आप लोग तो 20 रुपया का कूपन कटाते हैं और बदले में 40 रूपये का भोजन कर लते हैं और इक्वागार्ड वाला शुद्ध पानी भी पीते हैं. हम जेएनयू में छात्रावास कैंटीन चलाते हैं और हम जानते हैं कि आप इतना भोजन क्यों करते हैं, क्योंकि आपको सुबह में जल्दी भूख न लगे. कभी-कभी कुछ मजबूरियां होती हैं, जिस वजह से हमलोग आईआईएमसी वालों को कूपन देने से मना कर देते हैं, लेकिन आप ठहरे जीवट छात्र. हों भी क्यों नहीं, क्योंकि आप भविष्य में बड़े पत्रकार बनेंगे. हम जेएनयू में कैंटीन चलाने वाले पिछले 25 वर्षों से आप जैसे हज़ारों आईआईएमसी के छात्रों को जेएनयू के छात्रों के साथ भोजन करते देखा है.
हम लोगों ने आपस में आप लोगों की बातें भी सुनी हैं- कभी क्रांति की, कभी ग़ैर-बराबरी की, तो कभी जनसरोकारी पत्रकारिता करने की. वैसे हम लोग तो ठहरे खाना बनाने वाले साधारण पढ़े लिखे आदमी. हमें आप लोगों की बड़ी बातें समझ में नहीं आती, लेकिन एक दिन हमारे सहयोगी धनपत ने कहा कि ताऊ एक बात बताओ ये आईआईएमसी के छात्र बातचीत से तो बड़े क्रांतिकारी और सुधारक लगते हैं और पत्रकार भी हैं, लेकिन पिछले 25 वर्षों से इनके यहां छात्रावास नहीं है और ये लोग अपनी शर्म-हया को हथेली पर रखकर हर साल जेएनयू में अवांछित तत्व की तरह भोजन करते हैं, पेट में अन्न जाते ही ये लोग रूस की क्रांति से बात शुरू करते हैं और उदारीकरण होते हुए एफडीआई और मोदी, आडवाणी पर बात ख़त्म करते हैं, लेकिन ये वीर पत्रकार छात्रावास के लिए अपने संस्थान के अधिकारियों से बात क्यों नहीं करते, कोई प्रदर्शन क्यों नहीं करते.
जब ये बैठे-बैठे रूसी क्रांति की पटकथा लिख सकते हैं, तो अपने यहां छात्रावास के लिए कम से कम 5 लाइनें भी क्यों नहीं लिखते. जबकि उनके आईआईएमसी में विदेशी छात्रों और छात्राओं के लिए छात्रावास है. इतना ही नहीं, आईआईएमसी के ढेंकनाल, अमरावती, कोट्टयम, आइजॉल और जम्मू कैंपस में भी छात्रावास है, लेकिन दिल्ली में नहीं है. इन्हीं वजहों से आईआईएमसी के वीर पत्रकार जेएनयू में खाना खाने चले आते हैं. खैर चलो बाद में बात करते हैं. धनपत देखो 8-10 लड़के आ रहे हैं, जेएनयू के छात्र तो लग नहीं रहे हैं, लगता है आईआईएमसी का नया खेप आ गया है, अरे बना दो 100 रोटी एक्सट्रा और 5 किलो चावल अलग से.
लेखक अभिषेक रंजन सिंह आईआईएमसी के पासआउट हैं और पत्रकार हैं.






