: बांधवगढ़ नेशनल पार्क के आस-पास बसे बैगा जनजाति के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की नई पहल : नई दिल्ली । एच आई डेस्टिनेशन मैनेजमेंट प्रा. लि., जिसने दिल्ली में काम करते हुए पर्यटन एवं यात्रियों के आवागमन के लिए सुविधा मुहैया कराने के क्षेत्र में पर्यटन एवं गंतव्य प्रबंधन कंपनी के रूप में एक महत्त्वपूर्ण पहचान बनाई है, ने बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के गांवों में रहने वाले बैगा जनजाति के उत्थान के लिए सामाजिक जिम्मेदारी के बतौर पहल की है। उल्लेखनीय है कि एच आई डेस्टिनेशन मैनेजमेंट प्रा. लि. वर्ष 2006 एवं 2007 में लगातार दो बार ‘‘नेशनल टूरिज्म एवं हॉस्पिटैलिटी एक्सीलेंस अवार्ड’’ हासिल कर चुका है।
एच आई डेस्टिनेशन मैनेजमेंट बाघेसुर यानी टाइगर, ट्राइबल और टूरिज्म कार्यशाला एवं महोत्सव का आयोजन करने जा रहा है, जिसे ‘‘बाघ देवता’’ की वंदना के रूप में देखा जा सकता है। यह आयोजन बैगा जनजाति के पारंपरिक कला, शिल्प एवं संस्कृति के पुनरोद्धार एवं मुख्यधारा में उसकी पहचान स्थापित करने के जरिये अर्थोपार्जन पर जोर देती है। यह आयोजन सुख्यात श्री माइक पांडे के मार्गदर्शन में किया जा रहा है, जो ‘‘अर्थ मैटर्स फाउंडेशन’’ के जरिये 30 साल से काम कर रहे हैं और अपना पूरा जीवन पर्यावरण-संरक्षण के लिए समर्पित किया हुआ है। ‘‘अर्थ मैटर्स फाउंडेशन’’ इस महोत्सव एवं कार्यक्रम के आयोजन एवं प्रोत्साहन के लिए एच आई डेस्टिनेशन मैनेजमेंट के साथ मिलकर काम कर रहा है। हम काफी शिद्दत से महसूस करते हैं कि यह कार्यशाला एवं पूरा आयोजन हजारों वर्षों से इस इलाके में बसे (जहाँ अब राष्ट्रीय उद्यान बन चुका है) बैगा आदिवासियों के सामुदायिक जीवन की आजीविका एवं आर्थिक स्थिति में सुधार एवं स्थायित्व लाने में मददगार साबित होगा। साथ ही, अर्थोपार्जन का यह रास्ता बैगा समूह के लोगों की सिर्फ जंगल पर निर्भरता एवं अस्तित्व-रक्षा के लिए बाघों के साथ संघर्ष को कम करने में सहायक सिद्ध होगा। जाहिरा तौर पर बाघों की एक स्वस्थ आबादी में बढ़ोत्तरी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेंगे और पर्यटन-क्षेत्र को बढ़ावा देने में सक्षम होंगे।
मीडिया कर्मियों को संबोधित करते हुए श्री माइक पांडे ने रणथंभौर अभयारण्य में बाघों की आबादी को बढ़ावा देने के लिए शुरू किये गये काम से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि किस तरह से अवैध शिकार के लिए कुख्यात मोगिया जनजाति को पर्यटक गाइडों के रूप में विकसित किया गया। उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदाय को शामिल करके हमने बाघों की आबादी बढ़ाने में कामयाबी हासिल की और अब तो मोगिया समुदाय के लोग गाइड बनकर वास्तव में बाघों के संरक्षण में मदद कर रहे है। उनके बच्चे अभयारण्य के निकट स्थापित एक स्कूल में पढ़ रहे हैं। निश्चय ही, इस मॉडल परियोजना के देश के अन्य क्षेत्रों में शुरू करने की जरूरत है।
श्री पांडे ने जहाँ खास तौर पर बैगा जनजातीय समुदाय की बेहतरी एवं बाघों के संरक्षण, दोनों के लिए समुचित अवसर पैदा करने के समग्र दृष्टिकोण पर अपनी बातें रखीं, वहीं श्री सचिन शर्मा ने ऐसे तमाम इलाकों में समुदायों के प्रति सामाजिक दायित्व निभाने एवं समुदाय को लाभ पहुँचाने में एक महत्त्वपूर्ण भागीदार के रूप में शामिल पर्यटन-संचालकों की भूमिका पर विस्तार से बात की। उमरिया जिला पर्यटन संवर्धन परिषद के माध्यम से मध्य प्रदेश पर्यटन द्वारा मिलने वाले सहयोग की संभावनाओं का जिक्र एवं ऐसे किसी भी सकारात्मक प्रयास की सराहना करते हुए श्री शर्मा ने अन्य निजी एवं कॉरपोरेट घरानों को भी आगे आने के लिए कहा ताकि वर्तमान दौर में काफी पीछे छूट चुके इस उपेक्षित प्राथमिकता पर ध्यान दिया जा सके। कुछ मीडियाकर्मियों के सवालों के जवाब में उन्होंने बताया कि बागदरा गाँव में एक बड़ी जमीन की खरीद और उस पर होटल-निर्माण की मंजूरी के बाद भी उन्होंने होटल-निर्माण का विचार छोड़ दिया। इसके बजाय उन्होंने समुदाय के लोगों के लिए एक बहु-कार्यात्मक प्रशिक्षण सुविधा केंद्र के बतौर एक विरासत-संरक्षण प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने की बात की जो उनके लिए अस्थायी रूप से ही सही, पर सहायता का एक बड़ा आधार विकसित कर सकता है। इस केंद्र में सिखाये जाने वाले कार्यक्रमों के अंतर्गत एकीकृत जीवन व व्यावसायिक कौशल, सांस्कृतिक मूल्यों एवं इतिहास के साथ-साथ उद्यम के अवसर प्रदान करने वाले पारंपरिक कलाओं एवं शिल्पकारी को सीखने के अवसर भी शामिल होंगे। यह केन्द्र आदिवासी समुदाय को न केवल अपने सांस्कृतिक मूल्यों को आगे ले जाने व संरक्षित करने के तौर-तरीके मुहैया कराएगा, बल्कि जनजाति को समाज के मुख्तलिफ़ हिस्सों व समुदायों के साथ अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं को साझा करने के अवसर भी खोलेगा। इसके अलावे पर्यटकों को खान-पान एवं रहने की सुविधाएँ वाजिब कीमत पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं, जिससे कि केंद्र के परिचालन एवं रखरखाव संबंधी खर्चे निकाले जा सकते हैं और इस प्रकार इन केंद्रों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
प्रेसवार्ता के दौरान श्री फैसल रिजवी ने बताया कि 21 फरवरी से 24 फरवरी, 2014 को ताला, बांधवगढ़ नेशनल पार्क में आयोजित की जाने वाली कला, शिल्प और संस्कृति कार्यशाला एवं महोत्सव का मुख्य उद्देश्य लोगों के बीच यह जागरूकता पैदा करने के लिए है कि आदिवासी लोग बाघों को किस रूप में देखते हैं। इस संदर्भ में श्री रिजवी ने खास कर आशीष स्वामी एवं उत्साह से लबरेज उनकी आदिवासी टीम की सराहना की जो उपेक्षा के शिकार आदिवासी कला एवं शिल्प को मुख्यधारा में पहचान दिलाने के लिए उनके साथ अनथक कोशिशों में लगे हैं। उन्होंने कहा कि इस आयोजन के बाद एक ‘‘स्थानीय अभियान’’ शुरू करने पर जोर दिया जाएगा और अन्य पर्यटन-संचालकों (टूर ऑपरेटरों) एवं उस इलाके के होटलों एवं रिसॉर्टो को इस पहल से अवगत कराया जाएगा। उन्होंने बताया कि मानसून फॉरेस्ट एवं ताज सफारी लॉज जैसे होटल पहले से ही इसमें गहरी रुचि दिखा रहे हैं।
आयोजन के कुछ मुख्य आकर्षण होंगे –
आदिवासी कला कार्यशाला एवं जीवंत प्रदर्शन
लोक गीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम
आदिवासी खान-पान और जीवन शैली .
अंत में, श्री शर्मा ने संवाददाता सम्मेलन में शिरकत करने पहुँचे सभी मीडियाकर्मियों का शुक्रिया अदा किया और कहा कि लोगों में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए हम ऐसी छोटी-छोटी पहलकदमियों की भारी जरूरत महसूस करते हैं। बैगा जनजाति की तरफ से उन्होंने एक अहम सवाल पूछते हुए कहा कि ‘‘क्या इस दुनिया में हमारे लिए भी जगह है’’? और फिर जवाब देते हुए कहा कि हमें उन्हें भरोसा दिलाना होगा कि वास्तव में उनके लिए जगह है।
मीडिया सम्पर्क:
श्री फैजल अहमद रिज्वी
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