नवभारत टाइम्स, दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण एक भयानक सड़क हादसे में बुरी तरह जख्मी होने के बाद कई महीनों तक बिस्तर पर पड़े रहे. इस दौरान न लिख पाने, न चल पाने की दिक्कतों से जूझते हुए वे लगातार सोचते-गुनते और विचारते रहे. जब वे थोड़ा बहुत लिखने-टाइप करने लायक हुए तो अपने मन की बात को अपने ब्लाग 'पहलू' पर उतार डाला.
एक संवेदनशील नागरिक जिसका सरोकारी अतीत रहा हो, आज के दौर के समय व समाज को किस तरह देखता-महसूस करता है, उनके इस छिटपुट 'तुक्के' के जरिए जाना जा सकता है. 'हाल के कुछ तुक्के' शीर्षक से पिछले महीने उनके ब्लाग पर प्रकाशित उनकी पोस्ट को यहां साभार प्रकाशित कर रहे हैं. -यशवंत, भड़ास4मीडिया
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सड़क चलता कोई व्यक्ति एक्सिडेंट का शिकार हो जाए, इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं होती। लेकिन इस दुर्घटना का चौतरफा असर जब उसके जीवन पर पड़ना शुरू होता है तो वह इसे एक अलग-थलग घटना मानकर आगे नहीं बढ़ पाता। उसे इसके पीछे कोई तर्क चाहिए होता है, ताकि जीवन में आए इस आकस्मिक व्यवधान को वह सिरे से खारिज कर सके। यहां परंपरा उसकी मदद के लिए आगे आती है। जीवन का कोई विशेष घटनाक्रम मनुष्य के कर्म का नतीजा है या भाग्य का, इस पर अपने यहां हजारों साल से वाद-विवाद होता आया है। मामले को और जटिल बनाने के लिए प्रारब्ध, नियति या पूर्वजन्मों के कर्मफल जैसी कुछ और गुत्थियां भी इसमें डाल दी गई हैं। लेकिन ये सारी चीजें मिलकर भी किसी के जीवन को उसकी मनचाही दिशा में मोड़ नहीं पातीं और इनकी कुल भूमिका ज्योतिषियों का भला करने तक ही सिमट कर रह जाती है। क्या हम जीवन को एक तयशुदा रास्ते के बजाय आकस्मिक घटनाओं का ही एक प्रवाह मानकर संतुष्ट नहीं रह सकते? ऐसा करके हम ज्यादा सुखी भले न हो पाएं लेकिन दुख की संभावना को कुछ कम जरूर कर लेंगे।
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अपनी रोज की रोटी की तरह हर रोज हमें अपने लिए थोड़ी आशा भी जुटानी पड़ती है। यह न हो तो रोटी कमाते नहीं बनता। कमा भी लो तो वह तन को नहीं लगती। सामान्य स्थितियों में आशा कोई दुर्लभ वस्तु नहीं जान पड़ती। जिस बाजारवादी समाज में हम जी रहे हैं, उसमें निराशा के लिए कोई जगह ही नहीं है। वहां चारों तरफ सफलता की कहानियां बिखरी हुई हैं। प्रायः प्रायोजित सफलता की कहानियां। आशावाद की तो जैसे हर तरफ बाढ़ आई हुई है। लेकिन आप यह देखकर चकित हो सकते हैं कि नाकामी का एक धक्का भी किस तरह आपको समूची भीड़ से छांटकर अलग कर देता है। हित-मित्र, कुल-कुटुंब सभी अचानक आपको दूर से देखने लगते हैं। उनकी सांत्वनाएं और बाहर उमड़ रहा सारा का सारा आशावाद तब आपके लिए किसी काम का नहीं रहता। ऐसे में हमें हर रोज अपने भीतर न सिर्फ आशा की फसल उगानी होती है, बल्कि हमलावर निराशाओं से उसकी रक्षा भी करनी होती है।
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बचपन…जवानी…बुढ़ापा …मौत। समय का तीर हमारे भौतिक अस्तित्व को सीधे वेधता हुआ निकल जाता है। लेकिन हमारे मानसिक या आत्मिक अस्तित्व के सामने उसकी धार कुछ कुंद सी हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे शरीर की उम्र लगातार बढ़ती जाती है, लेकिन मन की उम्र भंवर में फंसे पानी की तरह कभी आगे कभी पीछे होती रहती है। एक झटके में यह कभी बुजुर्गियत के करीब पहुंच जाता है तो कभी बिल्कुल बच्चा बन जाता है। फारसी के महाकवि रूमी अपने एक शेर में कहते हैं- घास-फूस की तरह मैं सूख-सूख कर फिर हरा हो जाता हूं। मी चू सब्ज़ा बारहा रूईद: एम। जिन लोगों को अपने जीवन के शुरुआती दौर में ही बड़े झटकों से गुजरना पड़ा होता है वे रूमी की उक्ति की तस्दीक ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकते हैं। मानवीय प्रकृति की इस दुर्लभ विशेषता के बिना उनके जीवन का निराशा के गर्त से उबरकर दोबारा पटरी पर आना शायद संभव न हो पाता।
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