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बाजारू बन गए हैं आज के दौर के पत्रकार

: 9 अप्रैल – राजेन्द्र माथुर की पुण्यतिथि पर विशेष : जब राज्य सत्ता ने संसदीय राजनीति के जरिए लोकतंत्र की परिभाषा को बदल दिया। जब संसदीय राजनीति ने सत्ता के लिये आम आदमी से अपने सरोकार को बदल दिया। जब संविधान के जरिए संसद की व्याख्या के बदले संसद के जरिए संविधान हो ही संवारा जाने लगा। तो इस बदलते दौर में मीडिया क्‍यों अपने को नहीं बदल सका। बीते साठ बरस में हर राजनीतिक प्रयोग के साथ साथ मीडिया या कहें पत्रकारिता ने भी नायाब प्रयोग किये। लेकिन आर्थिक सुधार की हवा में जब बाजार और मुनाफा ही राजनीति के मापदंड तय करने लगे तब मीडिया भी अपने मापदंड बाजार से क्‍यों आंकने लगीं। और संसदीय राजनीति के भीतर समाया लोकतंत्र ही जब कारपोरेट और निजी कंपनियों की हथेलियों में समा गया तो फिर मीडिया ने झटके में खुद को कारपोरेट या निजी हथेली में तब्‍दील करना शुरू क्‍यों कर दिया। जाहिर है यह सवाल राजेन्द्र माथुर के दौर के नहीं हैं।

: 9 अप्रैल – राजेन्द्र माथुर की पुण्यतिथि पर विशेष : जब राज्य सत्ता ने संसदीय राजनीति के जरिए लोकतंत्र की परिभाषा को बदल दिया। जब संसदीय राजनीति ने सत्ता के लिये आम आदमी से अपने सरोकार को बदल दिया। जब संविधान के जरिए संसद की व्याख्या के बदले संसद के जरिए संविधान हो ही संवारा जाने लगा। तो इस बदलते दौर में मीडिया क्‍यों अपने को नहीं बदल सका। बीते साठ बरस में हर राजनीतिक प्रयोग के साथ साथ मीडिया या कहें पत्रकारिता ने भी नायाब प्रयोग किये। लेकिन आर्थिक सुधार की हवा में जब बाजार और मुनाफा ही राजनीति के मापदंड तय करने लगे तब मीडिया भी अपने मापदंड बाजार से क्‍यों आंकने लगीं। और संसदीय राजनीति के भीतर समाया लोकतंत्र ही जब कारपोरेट और निजी कंपनियों की हथेलियों में समा गया तो फिर मीडिया ने झटके में खुद को कारपोरेट या निजी हथेली में तब्‍दील करना शुरू क्‍यों कर दिया। जाहिर है यह सवाल राजेन्द्र माथुर के दौर के नहीं हैं।

लेकिन संयोग से राजेन्द्र माथुर जी का निधन उसी बरस हुआ जिस बरस से राजनीति सत्ता ने बाजार के लिये रास्ता खोलना शुरू किया या कहें आर्थिक सुधार की लकीर खींचनी शुरू की। 9 अप्रैल 1991 को राजेन्द्र माथुर का निधन हुआ और 1991 के बाद से मीडिया बदला। पत्रकारिता बदली। या कहे देश के मुद्दे ही बदलते चले गये और मीडिया एक ऐसे मुहाने पर आ खड़ा हुआ जब राष्ट्रवाद का मतलब दुनिया के बाजार में खुद को बेचने के लिये तैयार करना हो गया। राजनीतिक सत्ता का मतलब उपभोक्ताओं के लिये नीतियों को बनाना हो गया। सरोकार का मतलब हाशिये पर पड़े तबकों को और दरिद्र बनाते हुये सत्ता के आर्थिक पैकेज पर निर्भर करना हो गया।

जाहिर है राजेन्द्र माथुर जी की पत्रकारीय लेखन के दौर में [1955-1991] मुद्दे चाहे कई रहे लेकिन मीडिया के भीतर हर मुद्दा सामाजिक-सांस्कृतिक और भौगोलिक तौर पर राष्ट्रवादी समझ लिये ही उभरा। इसलिये चीन से लेकर पाकिस्तान के साथ युद्ध की बात हो या फिर इमरजेन्सी से लेकर स्वर्ण मंदिर में सेना के घुसने का सवाल या मंडल-कंमडल की सियासी समझ। मीडिया का रुख कमोवेश हर मुद्दे के साथ देश को बनाने। फिर बचाने। और आखिर सत्ता के लिये सियासी संकीर्णता से ही टकराता रहा। राजेन्द्र माथुर ने अपने लेखन से इन तमाम मुद्दो को पैनापन भी दिया और राज्य सत्ता के सामने एक दृष्टि भी रखी। यानी नेहरु की सोशलिस्ट समझ से वीपी सिंह के सामाजिक न्याय के नारे और महात्मा गांधी की हत्या से लेकर हिंदुत्व में प्राण प्रतिष्ठा करने के अयोध्या मंत्र तले यह तथ्य कभी नहीं उभरा कि देश को खंडित किया जा रहा है या फिर देश बेचा जा रहा है। तो पत्रकारीय समझ भी देश के होने और उसे संवारने का एहसास ही कराती रही।

अगर राजेन्द्र माथुर जी के लेखन को ही परखे तो हर मुद्दे की ओट में उन्होंने भारत को एक रखने या कहे राष्ट्रीयता की समझ तले परिस्थियों को समझा। देश में आपातकाल लगा तो राजेन्द्र माथुर यह लिखने से नहीं हिचके इंदिरा गांधी देश की जड़ों में ही मठ्ठा डालने की भूल कर रही हैं। और जब स्वर्ण मंदिर में सेना घुसी तो नवभारत टाइम्स के मास्टहेड को नीचे कर सबसे उपर हेंडिंग "भारत का भारतावतार" लिखा। लेकिन 1991 के बाद से जो नये सवाल संसद से लेकर सड़क तक पर उठे, या कहें उठ रहे है और जिस तरह लोकतंत्र का पिरामिड बीते दो दशकों में पूरी तरह उलट गया उसमें क्या किसी भी मुद्दे को लेकर कोई संपादक "भारतावतार "लिख सकता है। बारीकी से परखे तो बच्चों की शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य सेवा और पीने के पानी से लेकर जीने के तरीके तक पर उस लोकतंत्र का हक नहीं रहा जिसे संसदीय राजनीति के जरिए आम वोटर मानता-समझता रहा। दरअसल संसदीय राजनीति के दायरे में लोकतंत्र की नयी परिभाषा जब पूंजी, मुनाफे और बाजार तले देश की सीमा को तोड़ रही है। कारपोरेट विकास की परिभाषा को कानून का जामा पहनाया जा रहा है।

राष्ट्रद्रोह का मतलब हाशिये पर पड़े किसान, आदिवासी और ग्रामीणों के सवालों को उठाना हो चुका है। संसदीय राजनीति का मतलब राजनीतिक रोजगार से लेकर मुनाफे का एक पूरा अर्थशास्त्र नेता, पार्टी और सत्ता के अनुकूल बनाते हुये विशेषाधिकार पाने या फिर खुद को कानून से उपर बैठाने का हो चला हो तो फिर पत्रकारीय समझ या मीडिया की भूमिका कौन का रास्ता चुनेगी। जाहिर है मीडिया को लेकर पहली बार यहीं से कुछ नये सवाल खड़े होते हैं क्‍योंकि मीडिया को अगर परिस्थियों का शिकार संस्थान या फिर सत्ता के अनुरुप बदलने का धंधा मान ले तो जाहिर है वह सारे सवाल वैसे ही खड़े होंगे जैसे संसदीय राजनीति के भीतर राजनीतिक दलों के सामने सवाल है। एक तरफ सत्ता का रोना है कि उदारवादी अर्थव्यवस्था को अपनाते-अपनाते वह इतना आगे निकल चुकी है कि लौटे कैसे उसे नहीं पता।

दूसरी तरफ राजनीतिक दलों के सामने सवाल है कि सत्ता के बगैर उनका योगदान शून्य है तो और सत्ता में आने के लिये पूंजी बनाने, कारपोरेट के मुनाफे में सहयोग और लूट के लिये बाजार खोलने के रास्ते के अलावा कोई थ्योरी है नहीं क्‍योंकि विकास का आधुनिक मतलब यही है। तो फिर मीडिया भी किसी अलग ग्रह से तो टपकी नहीं तो वह भी मुनाफे के आसरे ही प्रचार-प्रसार कर जीवित रह सकती है। इसलिये उसे सत्ता से विज्ञापन का सहयोग भी चाहिये। कारपोरेट की पूंजी का गठजोड़ भी चाहिये। और प्रचार प्रसार के लिये राजनीतिक दलालों से लेकर मध्यस्थतों का सहयोग भी चाहिये। जिनके पास बाजार में पैठ जमाने का मंत्र है। यानी राजनीति का अर्थशास्त्र बीते 20 बरस में बदल गया और सरोकार की राजनीति खत्म कर उपभोग के साधन को न्यूनतम जरूरत में बदलते हुये देश का पर्यावरण, खेती, पानी और खनिज संसाधन सब कुछ बेचकर उसे नष्ट करने की दिशा में देश बढ़ा, लेकिन मीडिया का अर्थशास्त्र नहीं बदला। पत्रकारीय समझ और मीडिया संस्थानों का विकास भी सत्ता के अर्थशास्त्र पर ही टिका रहा।

अगर बारीकी से अब के दौर में संसदीय चुनाव से लेकर संसद की कार्यवाही और केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों की नीतियों को परखें तो दो सवाल सीधे उठते हैं। पहला बिना बजट [पूंजी] कोई नीति नीति नहीं है। और बिना नीति भी मुनाफा का रास्ता नीतियों को बना देता है। यानी पूंजी हर मर्ज की दवा उस देश में बना दी गई है जहां 80 करोड़ लोगों से कोई सीधा वास्ता पूंजी, मुनाफा या बाजार का अभी तक है ही नहीं। देश उस मुहाने पर आ खड़ा है जहा खेती के 80 फीसदी किसानों को सरकार कोई इन्फ्रस्ट्रक्चर नहीं दे पाती। लेकिन खाद और बीज के लिये कारपोरेट पर निर्भर जरुर कर देती है। और किसान चाह कर भी इस देश में राजनीतिक विकल्‍प तो दूर राजनीतिक मुद्दा भी नहीं बन पाता। ध्यान दें तो यही हालात मीडिया के भी हैं। सत्ता यहां भी पत्रकार के हाथ में मीडिया की डोर थमाना चाहती नहीं है लेकिन मीडिया के जरिए पत्रकार का बाजारू रास्ता जरूर खोलती है। यहां पत्रकार भी अपने लिये कोई वैकल्पिक अर्थशास्त्र खड़ा नहीं कर पाता जो मीडिया को चला सके और मीडिया को मुनाफे में तब्‍दील करने के सारे रास्ते सत्ता के उसी अर्थशास्त्र पर जा टिकते हैं जहां पत्रकारीय समझ दम तोड दें।

सवाल है राजेन्द्र माथुर की पत्रकारीय समझ का आंकलन इस नयी परिस्थिति में कैसे करें। कैसे मीडिया के दायरे में राष्ट्रीय सवालों के जरिए संसदीय राजनीति को पत्रकार मठ्ठा डालने से रोके और कैसे सत्ता के कार्य में भारतावतार की कल्पना करें जब सत्ता की कीमत चुनावी तंत्र के पीछे खड़े कारपोरेट लगा रहे हों। जब सांसद और विधायक के लिये सत्ता में आने के बाद पहली प्राथमिकता उनकी जीत के पीछे लगे पूंजी को मुनाफे के साथ लौटाने का हो। और चुनावी जीत हार में खबर की कीमत भी लगने लगी हो। क्या खबरों की खरीद-फरोख्त के जरिए पत्रकारीय मूल्य देश के किसी मुद्दे पर बहस की गुंजाईश भी पैदा करते है। फिर संपादक से आगे मीडिया हाउस चलाने या अखबार निकालने वाले ही जब खुद को पहले पत्रकार माने और फिर पत्रकार की सफलता का मतलब उसका मालिक बनना हो जाये तो क्या पत्रकारीय मूल्यों पर बहस की गुंजाईश बचती है। जो गुंजाईश होती भी है तो वह राजसत्ता के अर्थशास्त्र तले नतमस्तक होने पर आमादा रहती है।

राजेन्द्र माथुर के दौर में न्यूज चैनल नहीं थे लेकिन राजेन्द्र माथुर जो पत्रकारीय चितंन 1965 में नई दुनिया के अपने कालम "पिछला सप्ताह" के जरिए पाठकों को पढ़ने के लिये ठहराया वह ठहराव हर क्षण बदलते खबरों की भागमदौड़ में भी न्यूज चैनल दर्शकों को ठहरा नहीं पाते हैं। लेकिन 1991 के बाद से आर्थिक सुधार ने जिस तरह सामाजिक सरोकार को भी लाभ-घाटे में तौला और जिस तरह मीडिया की सत्ता पर निगरानी की जगह मीडिया पर निगरानी के लिये एक स्वतंत्र सस्था का सवाल 2012 में उठने लगा, उसमें कैसे राजेन्द्र माथुर के दौर की पत्रकारिता को अब के हालात से जोड़े। चीन और पाकिस्तान पर लिखते वक्त अक्सर राजेन्द्र माथुर उनसे जुड़े हर हालात की व्याख्या करने से नहीं चूके। लेकिन अब की समझ अगर व्यापार और विकास के लिये सीमाओं पर सेना के बदले बीजिंग और इस्लामाबाद से आर्थिक संबंध पर जा टिके तो फिर देश का मतलब पत्रकारीय समझ के जरिए क्या लगाया जाये। यह उल्टे हो चुके राजनीतिक आर्थिक पिरामिड को सीधा किये बगैर समझना वाकई नामुमकिन है।

1955 से लेकर 1991 तक जब तक राजेन्द्र माथुर की कलम चलती रही तब तक देश में देश की एकजुटता के साथ मीडिया को लड़ने के लिये राजेन्द्र माथुर सरीखा पत्रकार चाहिये था, लेकिन 2012 में तो देश बेचने के लिये निकले बहुराष्ट्रीय कारपोरेट के चंगुल में फंसते जा रहे मीडिया से लड़ने वाला पत्रकार चाहिये। जिसके खिलाफ सत्ता बाद में खड़ी होती है पहले मीडिया ही सत्ता बनकर मठ्ठा डाल देती है। और सत्ता भारत में विकास के भारतावतार होने का जश्न मनाती है। तो क्या मालवा से निकल कर देश को पत्रकारीय दृष्टि से राह दिखाने वाले राजेन्द्र माथुर को अब याद करने का कोई मतलब नहीं है या फिर राजेन्द्र माथुर से आगे की लकीर खींचने की जरूरत अब आ चुकी है।

लेखक पुण्‍य प्रसून बाजपेयी पत्रकार हैं. कई संस्‍थानों में काम करने के बाद इन दिनों जी न्‍यूज से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग से साभार लिया गया है.

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