जाने-अनजाने राहुल गांधी ने ‘बिग बॉस’ के किरदार में अपने रुतबे की एक झलक दिखा दी है। उन्होंने चर्चित अध्यादेश के विरोध में हुंकार भरी थी। मनमोहन सरकार के कैबिनेट फैसले को डंके की चोट पर ‘बकवास’ करार कर दिया था। इसी के बाद लगने लगा था कि यह अध्यादेश अब कभी कानूनी शक्ल नहीं ले पाएगा। वही हो भी गया। जिस कैबिनेट ने ‘जनहित’ में अध्यादेश लाने का फैसला किया था, उसी ने अब ‘जनभावनाओं’ की दुहाई देकर ‘यू-टर्न’ ले लिया है। इसी के साथ कैबिनेट ने यह भी तय किया है कि दागी माननीयों को कानूनी ‘कवच’ देने वाला लंबित विधेयक भी वापस ले लिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि यह विधेयक राज्यसभा में सरकार पास करा चुकी है। इस लंबित विधेयक को समीक्षा के लिए संसदीय समिति के पास भेजा गया था। लेकिन, इस मुद्दे का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है।
दरअसल, 24 सितंबर को केंद्रीय कैबिनेट ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन के लिए एक अध्यादेश को मंजूरी दी थी। इसे उसी दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति भवन भेज दिया गया था। इस अध्यादेश पर कैबिनेट की मुहर लगवाने के बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में हिस्सेदारी के लिए अमेरिका चले गए थे। उनके अमेरिका प्रवास के दौरान ही इस अध्यादेश को लेकर दिल्ली में काफी राजनीतिक गुल-गपाड़ा होता रहा। जब दो-तीन दिनों तक राष्ट्रपति ने इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, तो राजनीतिक हल्कों में यह कयासबाजी शुरू होने लगी थी कि प्रणब दा इससे खुश नहीं हैं। इस बीच मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इस अध्यादेश को लेकर विरोध के स्वर तेज किए। इस पार्टी के दिग्गजों ने यह कहना शुरू किया कि सरकार यह अध्यादेश अपने कुछ चहेते दागी नेताओं को संरक्षण देने के लिए लाई है। ऐसे में, यह अनैतिक भी है और असंवैधानिक भी।
भाजपा के शीर्ष नेताओं ने राष्ट्रपति से मुलाकात करके अपील की थी कि वे इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करें। राष्ट्रपति ने भाजपा का ज्ञापन मिलने के बाद कुछ घंटों के अंदर ही अपनी पहल तेज कर दी। उन्होंने उसी शाम सरकार के तीन आला मंत्रियों को तलब कर लिया था। उनसे सवाल किया था कि आखिर सरकार को इस अध्यादेश लाने की ‘इमरजेंसी’ क्या हो गई? कोई नहीं जानता कि मंत्रियों के जवाब से राष्ट्रपति कितने संतुष्ट हुए? लेकिन, इतना जरूर है कि मंत्रियों की साफ-सफाई के बाद भी राष्ट्रपति ने विवादित हो चले इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर नहीं किए तो नहीं किए। समझा जाता है कि राष्ट्रपति की नाराजगी के कुछ संकेत पाकर कांग्रेस की एक लॉबी में भी इस अध्यादेश के औचित्य को लेकर बहस शुरू हुई। इसकी औपचारिक शुरुआत कांग्रेस के चर्चित महासचिव दिग्विजय सिंह ने की थी। उन्होंने इसको लेकर अपनी नाराजगी दर्ज कराई। दिग्गी आगे बढ़े, तो अगले दिन केंद्रीय राज्यमंत्री मिलिंद देवड़ा ने भी इसमें अपने सुर मिला दिए।
मिलिंद देवड़ा ने जब अध्यादेश के खिलाफ अपनी तान तेज की, तो कांग्रेस के हल्कों में ये फुसफुसाहटें बढ़ी थीं कि आखिर राहुल गांधी के खास सखा मिलिंद क्या अपने दम पर ही विरोध करने की हिम्मत जुटा पाए होंगे? जाहिर है कि लोगों का इशारा राहुल गांधी की तरफ था। अगले दिन शुक्रवार (27 सितंबर) को पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस अध्यादेश के खिलाफ खुलकर धमाका कर दिया। वे नाटकीय अंदाज में पार्टी प्रवक्ता अजय माकन की उस प्रेसवार्ता में पहुंचे थे, जिसमें माकन अध्यादेश के पक्ष में स्पष्टीकरण दे रहे थे। लेकिन, राहुल ने जाकर कह दिया कि उनका विचार एकदम अलग है। वे मानते हैं कि इस अध्यादेश का गलत संदेश जाने वाला है। ऐसे में, यह पूरी तरह से बकवास है। उनकी समझ से तो इस अध्यादेश को फाड़कर फेंक देना चाहिए। अपना यह ‘वाणी बम’ फोड़कर राहुल चलते बने।
हैरानी की बात तो यह है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री माकन ने अध्यादेश को लेकर राहुल के बोलने के बाद एकदम ‘यू-टर्न’ लेने में दो मिनट का समय भी नहीं गंवाया था। जब उनसे यह सवाल किया गया कि अध्यादेश पर अब पार्टी की लाइन क्या है? तो माकन ने झट से कह दिया था कि अब पार्टी की भी वही लाइन समझी जाए, जो कांग्रेस उपाध्यक्ष का नजरिया है। देखते ही देखते मनमोहन सरकार के कई दिग्गज मंत्रियों ने भी कहना शुरू कर दिया कि इस अध्यादेश पर अब पुनर्विचार की जरूरत है। क्योंकि, देश की जनभावनाएं इसके खिलाफ हो गई हैं। जो लोग कांग्रेस की संस्कृति का जरा भी ज्ञान रखते हैं, उन्हें शायद इस ‘बदली हवा’ से ज्यादा हैरानी नहीं हुई होगी। क्योंकि, कांग्रेस में ‘प्रथम परिवार’ की इच्छा ही पार्टी की आधिकारिक लाइन मानी जाती है। वैसे भी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी को पार्टी में भावी बॉस के रूप में देखा जा रहा है।
लंबे समय से पार्टी के अंदर यह चर्चा रही है कि लोकसभा के अगले चुनाव में इस बार बुजुर्ग हो चले मनमोहन सिंह की बजाए युवा राहुल ही प्रधानमंत्री पद के चेहरे होंगे। हालांकि, रणनीतिक कारणों से राहुल के नाम का औपचारिक ऐलान नहीं हुआ। जबकि, भाजपा ने तमाम विवादों को दरकिनार करते हुए नरेंद्र मोदी को अपना ‘पीएम इन वेटिंग’ घोषित कर दिया है। कहीं मोदी के मुकाबले राहुल को रखने से कोई रणनीतिक जोखिम न हो, ऐसे में कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोलने का ही फैसला किया है। लेकिन, पार्टी के सभी लोग जान रहे हैं कि देर-सवेर राहुल ही उनके ‘बिग बॉस’ बनने वाले हैं। सो, पार्टी के कुछ चतुर सुजानों ने पहले से ही उन्हें ‘सुपर बॉस’ जैसा मानना शुरू कर दिया है। शायद, ऐसा न होता तो अध्यादेश के मुद्दे पर राहुल की जुबान खुलते ही दिग्गजों के सुर एकदम न बदल गए होते।
उल्लेखनीय है कि प्रस्तावित अध्यादेश के जरिए सरकार सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले को पलटने की तैयारी में थी, जिससे दागी जनप्रतिनिधियों की कुर्सी पर खतरा बढ़ गया है। हुआ यह था कि 10 जुलाई को सर्वोच्च न्यायलय की एक पीठ ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-8 की उपधारा-4 को रद्द कर दिया था, जिसके जरिए दागियों को कानूनी कवच मिल जाता था। फैसला हुआ था कि आपराधिक मामले में किसी सांसद या विधायक को दो साल या उससे ज्यादा की सजा किसी भी अदालत से मिलेगी, तो तुरंत प्रभाव से उसकी कुर्सी चली जाएगी। जबकि, उपधारा-4 के चलते दागी ‘माननीयों’ को ऊपरी अदालतों में अपील के आधार पर राहत मिलती रही है। इसी को पलटने के लिए संसद के मानसून सत्र में एक विधेयक लाया गया था। जो कि राज्यसभा में पास होने के बाद भी लोकसभा में अटक गया। ऐसे में, सरकार ने अध्यादेश को मंजूरी दी थी। ताकि, संकट में फंसने वाले ‘माननीयों’ को पहले की तरह राहत मिलती रहे।
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के बहुचर्चित मामले में दोषी करार किया गया है। रांची की अदालत उन्हें आज इस आपराधिक मामले में सजा सुनाने जा रही है। जिन धाराओं में वे दोषी ठहराए गए हैं, इसके आधार पर उन्हें तीन से सात साल के बीच सजा सुनाई जा सकती है। ऐसे में, उनकी लोकसभा की सदस्यता तुरंत छिन जाने वाली है। कांग्रेसी सांसद रसीद मसूद भी एक फर्जीवाड़े मामले में फंस गए हैं। उन्हें चार साल की सजा हो गई है। उनकी संसद सदस्यता छिनने की प्रक्रिया शुरू कर हो गई है। जाहिर है दागी ‘माननीयों’ पर यह गाज अध्यादेश पास न हो पाने के कारण ही गिर रही है। फिलहाल, राजनीतिक हल्कों में लोकतंत्र बनाम परिवारवाद की बहस भले बढ़े, लेकिन राहुल तो ‘बिग बॉस’ साबित ही हो गए।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।






