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बिना सिर वाली मुख्यमंत्री

कार्टूनिस्टों के साथ यही मुश्किल है। वे सीधी बात करते ही नहीं हैं। जो भी कहना है घुमा-फिराकर कहेंगे भले ही अर्थ का अनर्थ क्यों न हो जाए। इसीलिए वे कहते कुछ हैं और लोग समझते कुछ और हैं। जब देखो तब तमाम तरह के भ्रम पैदा करते रहते हैं मगर ऐसे बने रहते हैं जैसे कुछ किया ही न हो। कोई कार्रवाई करो तो लोकतंत्र और मीडिया की आज़ादी का झंडा उठा लेंगे।

कार्टूनिस्टों के साथ यही मुश्किल है। वे सीधी बात करते ही नहीं हैं। जो भी कहना है घुमा-फिराकर कहेंगे भले ही अर्थ का अनर्थ क्यों न हो जाए। इसीलिए वे कहते कुछ हैं और लोग समझते कुछ और हैं। जब देखो तब तमाम तरह के भ्रम पैदा करते रहते हैं मगर ऐसे बने रहते हैं जैसे कुछ किया ही न हो। कोई कार्रवाई करो तो लोकतंत्र और मीडिया की आज़ादी का झंडा उठा लेंगे।

अब कोई बताए कि इसमें मिदनापुर के डा. बिक्रम साहा की क्या ग़लती जो एक कार्टून को सही ढंग से समझ नहीं पाए और उन्होंने पुलिस में ग़लत रिपोर्ट लिखा दी। किसी भी समझदार आदमी के पास अगर वैसा कार्टून भेजा जाएगा जैसा उन्हें भेजा गया था तो वह तो वही समझेगा न जो डा. साहा ने समझा और वही करेगा जो उन्होंने किया। उन्होंने अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वाह करते हुए तत्काल ममता बैनर्जी का बिना सिर वाला कार्टून भेजने वाले दो सज्जनों के ख़िलाफ़ रपट लिखा दी।

इसमें बहस की कोई गुंज़ाइश ही नहीं है कि डा. साहा ने सही किया या ग़लत क्योंकि मामला ममता बैनर्जी के आईने की तरह बिल्कुल साफ है। डा. साहा ग़लत तरीके से बनाए गए कार्टून के संदेश को समझ नहीं पाए या ग़लत समझ गए और ग़लत रिपोर्ट भी लिखा बैठे। अगर कार्टूनिस्ट ने सीधे-सीधे ये बता दिया होता कि ममता बैनर्जी का सिर गायब है (ये बात वो मिलकर या फोन पर भी बता सकता था) तो डा. साहा ग़लत रिपोर्ट नहीं लिखाते। वैसी स्थिति में शायद वे ये रिपोर्ट लिखाते कि मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का सिर गायब है और उसकी तलाश फौरन की जानी चाहिए।

डा. साहा का ऐसा करना बिल्कुल दुरूस्त भी होता क्योंकि उनकी चिंता को हलके से नहीं लिया जा सकता। आख़िर बिना सिर वाला मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेश को कैसे चलाएगा? वह तो वैसे ही चलाएगा जैसा अभी चला रहा है। उसे सबसे ज़्यादा चिंता तो उस कुर्सी की ही होगी न जिस पर उसका बिना सिर वाला धड़ रखा जाता है। उस सिर की क्यों होगी जो माँ, माटी और मानुष के लिए परेशान करता रहता है। बहरहाल, घास-पत्ती पार्टी के नेताओं को अब तुरंत कार्रवाई करना चाहिए। तमाम पुलिस फोर्स और खुफिया एजंसियों को सिर की खोज में लगा देना चाहिए, क्योंकि जितने लंबे समय तक बिना सिर वाला मुख्यमंत्री काम करेगा उतना उनका और राज्य का नुकसान होगा।

सिर के बारे में कुछ सुराग हम भी दे सकते हैं। पहला सुराग तो ये है कि सीपीएम नेताओं के घरों और दफ्तरों में सिर की खोज की जानी चाहिए, क्योंकि इसके पीछे सीपीएम की साज़िश हो सकती है। सत्ता से हटने के बाद से उनके पास कोई काम तो है नहीं इसलिए वे यही सब करके ममता बैनर्जी को बदनाम करने में लग गए होंगे।

दूसरा सुराग ये है कि इसमें केंद्र की यूपीए सरकार का हाथ भी हो सकता है। ममता बैनर्जी का सिर बहुत शोर कर रहा था और उससे पूरी सरकार परेशान चल रही थी। ऐसे में प्रणब दा ने चिदंबरम के साथ मिलकर खेल कर दिया हो तो किं आश्चर्यम्। वैसे ममता के शुभचिंतक सिर की खोज  में उन किसानों के पास भी जा सकते हैं जिन्होंने उनके लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त था। वे उन बुद्धिजीवियों से भी सिर की पूछताछ कर सकते हैं जिन्होंने कोलकाता की सड़कों पर उनके पक्ष में विरोध प्रदर्शन किए थे।

कहा जाता है कि ढूँढ़ने पर भगवान भी मिल जाते हैं। इसलिए अगर पूरी ईमानदारी और मेहनत से सिर ढूँढ़ा गया तो ज़रूर मिल जाएगा। हालाँकि कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि वही चीज़ खोजी जा सकती है जो गुम हुई हो। अगर कोई चीज़ हो ही न तो उसे कैसे और कहाँ ढूँढ़ा जाएगा।

इस व्यंग्य के लेखक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार हैं जो इन दिनों न्यूज एक्सप्रेस चैनल के एडिटर इन चीफ हैं.

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