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बिहार जाकर हर्षा गए थानवी दम्पती

Om Thanvi : बिहार जाकर हर्षा गए थानवी दम्पती। बिहार की मिट्टी की महक अलग है, जैसे हर जगह की होती है। लेकिन इस बार हम दोनों ने इस बात पर गौर किया कि बिहार के लोगों में आत्मीयता का रूप जुदा और गहरा है। वह चेहरे पर यों नुमायाँ नहीं होता कि धोखा होने का खतरा पैदा हो जाय। लेकिन जैसे ही बात शुरू हो, अनजान व्यक्ति के चेहरे पर कभी ईमानदारी, कभी जिम्मेवारी, कभी सहकार, यहाँ तक कि खातिरदारी के भाव भी आप दम-दम पर पढ़ सकते हैं।

Om Thanvi : बिहार जाकर हर्षा गए थानवी दम्पती। बिहार की मिट्टी की महक अलग है, जैसे हर जगह की होती है। लेकिन इस बार हम दोनों ने इस बात पर गौर किया कि बिहार के लोगों में आत्मीयता का रूप जुदा और गहरा है। वह चेहरे पर यों नुमायाँ नहीं होता कि धोखा होने का खतरा पैदा हो जाय। लेकिन जैसे ही बात शुरू हो, अनजान व्यक्ति के चेहरे पर कभी ईमानदारी, कभी जिम्मेवारी, कभी सहकार, यहाँ तक कि खातिरदारी के भाव भी आप दम-दम पर पढ़ सकते हैं।

प्रेमाजी को कतरनी (चिवड़ा) चाहिए थी, जो भागलपुर से एक मित्र ले आए थे। फिर चाहिएसत्तू। फ़्रेजर रोड पर खादी भंडार में पूछा। उनके पास नहीं था, पर एक दुकान का पता हमें यों बताया गया जैसे हमसे बरसों की रिश्तेदारी हो। उस ठिकाने को 'श्रेष्ठ दुकान' कहा तो आवाज से ही लगता था कि यह सिफारिश नहीं, जिम्मेवार सूचना की अदायगी भर है। स्टेशन जाइए, हनुमान मंदिर को मुड़िये, पश्चिम को बढ़िए, पहली सड़क पर स्टेशन की तरफ हो लीजिए, बाईं तरफ बनारसी भूंजा वाले को पाइएगा … आवाज के आवेगपूर्ण उतार-चढ़ाव और भागिमाओं का ब्योरा नहीं दे रहा हूँ। उन्हें जैसे लगा कि हमें ठेठ दुकान तक छोड़ आए हैं, तभी तसल्ली हुई।

बेल का शरबत पिया, सड़क किनारे। लगा हमें ग्राहक नहीं, मेहमान समझ कर खातिर कर रहे हों। भरोसा न हो तो अपूर्वानन्द जी से बुझा लीजिए, वे तो वहीँ के न हैं! यह जानकर कि हमें बेल की समझ है, एक केसर-सा नया तोड़कर कच्चा खाने की मनुहार भी ठेले पर हुई। जब तक खाया, हमारे चेहरे को निहारा गया कि बेल जैसा कहा वैसा निकला कि नहीं। रिक्शे वाला। कोई जल्दी नहीं, जितनी देर बात कीजिए, जाइए-न जाइए, वाजिब भाड़े पर बतिया लीजिए, मगर स्वर में कोई तल्खी नहीं, न चिड़चिड़ापन। इत्मीनान। खैनी खैने का मतलब बैठिए। चलेंगे। हिंदी के मूर्धन्य आलोचक डॉ नंदकिशोर नवल से मिलना हुआ, उनके घर। इतनी साफगोई और बेबाकी कि दूसरी मिसाल फ़ौरन याद नहीं आती। ढेर अनुभव हैं। ज्यादा नहीं बोलूँगा, आप कहीं यह न समझने लगें कि क्या पर्यटक की तरह देखा हूँ बिहार को!!

फिर बिहार साहित्य समारोह था, जिसमें हम गए थे। गौर से देखा कि कैसे एक साहित्य-कलाप्रेमी परिवार पूरे समारोह को खड़ा और सफलतापूर्वक संचालित कर सकता है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वरदहस्त के बगैर। और अंत में नीतीश कुमार। समारोह का उद्घाटन उन्हीं ने किया। उन्होंने प्रदेश में काम किया है, अच्छी छवि है। पर डॉ अजीत-अन्विता और आराधना प्रधान के इस परिश्रम में सरकार की भांजी क्यों! कुछ सहयोग भर से! तो मैं साहित्य मण्डली में एक राजनेता की शिरकत के नाम से बिदक कर इधर-उधर हो गया। मगर प्रेमा जी और अन्य का बयान था कि नीतीश कुमार का स्वतःस्फूर्त भाषण जो था सो था, वे एक कवि पर बोले भी। उन वयोवृद्ध शायर — कलीम आजिज़ साहब — के कलाम पर भरपूर दाद दी और एक शेर पर मुकर्रर इरशाद भी फरमाया। सो मैं बिहार के नाम पर उनकी भी तारीफ करता हूँ, अब आप जो समझें सो समझें।

पर वह शेर क्या था, जो दुबारा सुना गया? प्रभात रंजन बताते हैं, यह वह शेर था जिसे कभी लाल किले के मुशायरे में आजिज़ साहब के मुंह से सुनकर इंदिरा गांधी बिदक गई थीं! शेर यों है:

दामन पर कोई छींट न ख़ंजर पर कोई दाग़
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो!

जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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