आगामी एक-दो माह में बिहार विधान परिषद की रिक्त पड़ी 15 सीटों का भरा जाना है। इसके लिए कवायद भी तेज हो गई है। इसमें 12 राज्यपाल कोटे की सीटें हैं, जबकि तीन विधान सभा कोटे की सीटें हैं। ये सभी सीटे जदयू -भाजपा के खाते में ही जाएंगी। सवाल है कि क्या इनमें से एकाध सीट पत्रकारों को भी नसीब होगी। इसको लेकर पटना के राजनीतिक व मीडिया के गलियारे में चर्चा हो रही है। नामों को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा चर्चा राजपूज जाति के एक पत्रकार को लेकर हो रही है। इसके अलावा भी कुछ पत्रकार हैं, जो चर्चा में हैं।
हालांकि गया के एक वरीय पत्रकार इन संभावनाओं को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि नीतीश कुमार ने तीन कसमें खार्इं हैं। पहली कसम है कि भूमिहारों को नहीं छेड़ना है। दूसरी कसम है कि नौकरशाहों की मनमानी पर कोई अंकुश नहीं लगाना है और तीसरी कसम है कि अब किसी पत्रकार या बुद्धिजीवी को राज्यसभा या विधान परिषद में नहीं भेजना है। अब देखना है कि अखबारों को विज्ञापन का चासनी देने वाले नीतीश कुमार क्या पत्रकारों को सत्ता की मलाई भी देंगे।






